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Friday, 28 July 2017

ओ मोदी जी

ओ मोदी जी, मेरे गांव भी आओ जल्दी।
बच्चन भेजो, अनुष्का भेजो
बोलो मेरे यहाँ भी जल्दी आये
बच्चे लाये आदमी लाये
माताएं और बहनें लाये
दरवाज़ा बंद तो बीमारी बंद वाला 
नारा इन्हें भी समझाये। 
आज सुबह फिर ट्रेन सफर था
बाहर का नज़ारा भी वही था  
अध नंगे चाचा ताऊ भैया
खुले में दिख जा रहे थे
इस बार न वो हमसे
न हम उनसे शर्मा रहे थे
हम मोदी बच्चन को याद किये 
बस उनको घूरे जा रहे थे। 
औरतें नही दिखी 
इसका मतलब ये नही कि
दरवाज़ा बंद हो गया
बस भोर में निपटने का स्लॉट बंध गया।
वो अंधियारे में जाती है
काम खत्म कर दुरुस्त हो के आती है। 

ओ मोदी जी, मेरी शादी को लड़का मिल गया।
कुंडली मिल गयी,
शौक मिल गया,
शौचालय न मिला, 
मामला गड़बड़ हो गया।
मैं भी प्रियंका बन भूचाल हो गयी
कुंडली से मैच लड़का छोड़ बदनाम हो गयी
सब बोले ये तो बन जायेगा
लड़का तहसीलदार हो गया,
ये तो बन ही जाएगा।
हम डर गए शौचालय से सोच जोड़ कर
एकांत में अकेलेपन का घूंट पी कर।
हमारे यहां भी अनुष्का भेजो।
लड़के जल्दी मानेंगे
गांव में बच्चन के नाम पर कुछ नेता 
जल्दी शौचालय बनवाएंगे।
बच्चन संग अपने आला कमान भेजना
पता चला बिग बी पे ही मुकदमा चल जाएगा
कई लोग है जिन्हें न घर मिला
न शौचालय
उनका गुस्सा किसी से अब न डर के रह पायेगा।
ओ मोदी जी तुम ही आ जाओ
उत्तर का गांव है मेरा
चुनाव बिगुल बजा जाओ।
कोई एक नई शुरुआत 
हमारे यहां से भी कर जाओ।
तुम तो जादूगर हो
नया नया कुछ लाते हो
एक नया प्रसारण 
यहां से भी फैला जाओ।
अच्छा, तब तक के लिए
सब लोग खड़े हो के,
जन गण मन बजने वाला है,
उसको सुन के भारत माता की जय नारा लगाओ। 

Wednesday, 19 July 2017

मैंने देखा है

वो पीछे वाले कस्बे में आग लगी है
मैंने आज आसमान में उठते बादल देखा है।
आज माँ को सफेद विधवा साड़ी में
लाल सिंदूर अपनी मांग भरते देखा है।
वो खनक खनक कर जाती थी जो
उस पगली को संवर के बेरंग कजरी गाते देखा है।
झूले पे झूली वो आसमाँ को ताके
उसने भी उस धुएं से बादल को उठते देखा है।
पाश को सुन के सोई 'देसी'
आखिर में थी रोई 'देसी'
मैंने कई कौतूहल को भीड़ में सन्नाटा होते देखा है।
उस सांय सांय टिक टुक झुर मुट में
एक नई सांस को टूटते देखा है।
शोर हुआ है, बातें घूम घूम कर शोर मचाये
दाएं बाएं ऊपर नीचे जगह मिलते ही घुस जाए
मैंने इस जाल बवंडर में सुबह के कपोल को
झर झर सूखे पत्ते सा बूंदों संग माटी माटी होते देखा है।
वो पगली जो झूल रही थी
जो बेरंग कजरी बोल रही थी
उसको बारिश में बचते देखा है।
उस कस्बे की आग बुझ गयी
इस खुशी में मैंने उसकी आग को कसमसाते देखा है।
पत्तो की सर सर में उसके सीने की अनगिनत साँसों को हिलते देखा है।
मैंने आज अपनी माँ को सफेद साड़ी में लाल सिंदूर लगाते देखा है।

Tuesday, 20 June 2017

कौन है ये 'मैं'?

वो एक लड़की की बात करते है,
कोई खिड़की खुलने की बात करते है,
कोई दंगो में मरने वालों की गिनती करते है,
तो वो ज़िंदा लाशों की बात करते है।
वो शाम में टी वी पे ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते है,
कोई उस चिल्लाने को सख्ती से नकारते है,
वो इसका विरोध करता है।
वो उसको सहमी आवाज़ से भड़काते है
कोई चिल्ला के भी जान लगाता है,
वो अकेला शाम को रोज़ बस्ता खोल
कुछ नया लेकर आता है
और वही पुराना बोल जाता है।
कोई अच्छी कविता लिखता है,
कोई कामुक तस्वीरों से लाड लड़ाता है,
वो उनका भी विरोध करता है।
वो जवानों के छालों पे रोते है
इंडिया हार जाये तो पी के सोते है,
हॉकी में जीते तो भी क्रिकेट का शोक मनाते है,
ये भारत के नही केवल फेसबुक ट्विटर के भी रखवाले है।
कोई पान वाला ग्वालियर से राष्ट्रपति बनेगा,
ये सोच चायवाला हँसता है,
कितना हारोगे ये उससे कहता है,
वो उसपे भी विश्वास जताते है,
ये तो गाय को चीते से बदलवाते है,
वो उसका भी विरोध करता है।
रोज़ सांझ कुछ नया लेकर आता है
वही पुराना बोल के चला जाता है।
मैं लिखने की शौकीन
अनपढ़ पर लिखने की शौक़ीन
जब जब खोलूं ये छोटा पिटारा
तकिया पकड़ देखूं दिन का नज़ारा
बह जाने का डर है सताये
'वो' क्या कहते 'ये' क्या सुनते
'कोई' क्या नया खेल रचाता
ये देख दिमाग बौरा सा जाए
फिर कुछ अच्छे गीत जो देखूं
अपनी लेखनी पे शर्म आ जाये
मैं थोड़ी पगलेट
फिर भी लिखने का जी मन भर के आये
पर इन सैकड़ो कहानी में
मै खो जाती हूँ।
इस रंगमंच के फंग मंच का जोकर
बिना पहचाने रसीली कविता
एक विलेन से सुन के सो जाती हूँ।
ठहराव बेचैनी मुर्दा अकड़ शिथिलता
अस्थिर गंभीर नासमझी
इन सब मे कही न कही खुद को
भीड़ का हिस्सा पा
खुद को समाज का रखवाला समझ
मुस्कुराती हूँ।
मैं फिर कभी गांधी कभी मोदी
कभी कन्हैया कभी पटेल
अब तो अम्बेडकर वाली भी बन जाती हूँ।
बड़े रखवाले आ गए है।
वो ये सब बोलने वाले आ गए है
मैं भी कभी हास्य की
तो कभी वीर रस कविता बन जाती हूँ।
श्रृंगार तो वैध है शायद
मैं कभी कभी रूपक में गालियों की शोभा बन जाती हूँ।
मैं मैं कब रहती हूं
इसका एहसास अब दूसरे कराते है
कभी कभी मैं अपने अस्तवित्व का भी आईना दिखलाई जाती हूँ।
मैं ऐसे ही इनसे उनसे मिल के
इस समाज का
बरसो उलझी कहानी से जनी
नई जमात का नया हिस्सा बन जाती हूँ।
मैं बड़ी बड़ी होर्डिंग का मुस्काता चेहरा बन जाती हूँ
किसी के गुस्से का हिसाब बन जाती हूँ
मैं यूँ ही सुबह चाय और रात में बियर बन जाती हूँ।


Sunday, 4 June 2017

कोई तो होगा जो ये बताएगा
ये चार चांद कब हुस्न चढ़ायेगा
कोई तो होगा जो ये बताएगा
चकोर की चाकरी से पर्दा उठाएगा
कोई तो होगा जो ये बताएगा
ये रात आधी क्यों मेरे संग आयी है
जा के उसको समझयेगा
आधी उसके गलियारे में टांगी है
कोई तो होगा जो ये बताएगा
इश्क़ दुआ हो या दवा
उसे खाने के बाद रोज़ खिलायेगा
कोई तो होगा जो ये बताएगा
रात चांदी से सोना कर के जाएगा
कोई तो होगा....
मेरी बहती हँसी को रास्ता दिखायेगा
कोई तो होगा जो बताएगा
मेरी चाहतों पे मरना सिखाएगा
कोई तो होगा जो ये बताएगा
सुबह की लुका छुपी वाला प्यार दिखायेगा
कोई तो होगा जो ये बताएगा
में यहां वो वहां...इस सूरज का फर्क समझायेगा
कोई तो होगा जिससे में ये पूछुंगी
बिना जवाब खिलखिला के मैं हसुंगी
वो पगली बोल के यूँ चला जायेगा
में जर्मनी में बैठी रात 10 बजे दिन को जाना सिखाऊंगी
कोई तो होगा फिर जो बताएगा
रात घड़ी से नही सूरज के जाने से है, वो ये सब समझयेगा
कोई तो होगा....
जो मेरी गुड़िया को बचपना खिलायेगा
उसको सवालों के कपड़े पहनायेगा
उसकी खुशियों को चाभी बना के
घर की मोटर से पानी खिचायेगा।
कोई तो होगा....

Monday, 22 May 2017

गिर के तू उठे वही
जब हार की भी हार हो।
नभ तलक पुकार हो
जब तेरी सिंह दहाड़ हो।
अश्रु बन भीगा दे लब
बहा तू अशांत नीर को
जो रोकने का साज छेड़े
हटा दे उस ज़मीर को।
तू बना नही जो गिर के
उठने को तैयार नहीं।
नभ तेरा आसमां नहीं
क्षितिज तेरा किनार नहीं।
बाधायें लाख हो मगर
तू उठ खड़ा हो रुद्र बन
विष भी उग्र हो उठे
ऐसी एक कंठ रख।
कमी तुझे झुकायेगी
विनम्रता से दबायेगी
मस्तिष्क चाल खेलेगा
दुर्योधन सा मन,
शकुनि सा हठ निचोड़ेगा।
तू कृष्ण की पुकार सुन
अर्जुन सा धैर्यवान बन
लगे कि घात तीव्र है
तो, भीम सा प्रहार कर।
कठिन गर कठिन लगे
तो, विश्राम से जुगाड़ कर
उसके रुष्ट होते ही
विश्राम मिल पुनः तू प्रहार कर।
है बड़ा वियोग ये
मातृ पितृ भाई मित्र
बना इन्ही को वजीर तू
फिर सह पे मात जीत कर।
इस लगा लगी के खेल में
एक वीरता का मान हो।
एक मुट्ठी हँसी की हो
चुटकी भरा विश्वास हो
साथ हो गुरु का जो
पथ नया प्रशस्त हो।
 तू चले तो बने अनेक
ऐसी एक अस्त्र हो।
चल उठ सजा ये देश
जिसमे हिन्दुस्तां का अर्थ हो।
जहां मानवता प्रवृत्ति हो।



Monday, 8 May 2017

कश्मकश

शराब की महक और
उसके बदन की खुशबू
कुछ चुरा लायी थी
वहां से आते आते
शाम को मेरी चादर से
वो महक रही थी।
मेरी सांसो में
सच, कोई किस्सा नही है ये,
महक रही थी सुबहो में।
मैंने भी गुलज़ार की नज़्मों के बाद
आज महसूस किया
जब उसके पास से वापस आयी थी।

वापस आयी थी
उससे रूस कर
उससे शिकवा किया
तो 'चली जा' कह कर
चला गया वो।
न, मै शिकायत नही कर रही।
या शायद कर रही हूं।
पर इन शिकायत से
वो मोहब्बत की जान निकाल कर
मुझे बेजान छोड़ देता है।

ना माप रही उसकी मोहब्बत
 गुस्सा आंसूं में बहा
शाम चादर से खुशबू ओढ़
यूँ ही बेकाम बितायी है मैंने।
और मान रही हूं तज़ुर्बे से,
कि उसकी मोहब्बत
नए जमाने की कामपरस्ती
और समाज की रवायतों
से डर के बना प्यार है।
जब तक बंद कमरे का है
चले जाने की बाबत
कई दफे आवाज़ उठती रहेगी।

अक्सर कश्मकश में पड़ जाती है जान
इश्क़ है तो चले जाने की बात
तैयार क्यों रहती है लफ्ज़ बन कर
उसे होठों पे
मुझे मार गिराने को
हम नासमझ है
ये मान चुपचाप हट जाएंगे रास्तों से
हमे तो शायद इमरोज़ सा आशिक़ चाहिए
पर अमृता सी हिम्मत और आबरू भी नही है।
न मिलेगा इमरोज़ न अमृता सी उदासी
न वो इश्क़ लुधियानवी
तो चलो गम्मू लिखे कुछ नई मोहब्बत
जहां तू इश्क़ भी करे
और पाप भी करे।
गलतियां भी करे
और इश्क़ भी।


Monday, 24 April 2017

शून्य

शून्य...
जहां शुरू फिर घूम घाम के वही ख़त्म
बस यही कहलाता है शून्य
जो खाली हो
निराकारी हो
सब समेटे हो
सब से छुपा 
कई रंग ढंग संजोये हो
बस यही कहलाता है शून्य।

ज़ीरो बन के नथिंगनेस
शून्य बन के शुरु से पहले ही खतम
रिश्तों में खालीपन का नाम
गणित में आगे पीछे हो के 
करे धमाल
वैज्ञानिक की खोज नई
बिना मूल्य के मूल्यवान
बस यही कहलाता है शून्य।

कैसे करे इसे परिभाषित 
जिसमे निजता का मान न हो
जिसकी भाषा से पहचान न हो
जो निर्गुण से भी बंधे नही
जो जल जितना बेरंग भी हो 
जो सूरज की लाली में लाल
गगन की नीलिमा में नील
जिसका पानी सा औचित्य जो हो
जो शुरू खत्म का भेद न दे
प्रकृति की एक पहचान जो हो
कुछ ऐसा कहलाता है शून्य।

जो परिभाषा की भाषा का मोहताज़ न हो
समझ मे आने वाला हो 
पर समझाने का प्रयास न हो
जो बंधे न इस माया में
में लिखती और समझती हूं
जो इससे भी अनिभिज्ञ सा हो
ऐसा कुछ कहलाये शून्य।

गर शून्य है मेरे रिश्तों में
मैं सतत प्रेम में रम जाऊं
तेरे मेरे होने के वजूद को
शून्यता में डूबा जाऊं
ये अंत नही शुरुआत नही
न बंधन है ना जुगत कोई
ये निजता का एहसास नही
ये तुझसे है और तुझमें है
ये एक अथाह परिश्रम है
इसका मानक एक व्यर्थ सफलता है
शून्य नही कहलाता कुछ
ये आज़ादी है
शब्दों से, बंधन से, 
कुछ होने और न होने से,
ये समागम है और विस्तारित है,
ये शब्द से परे, 
हर वस्तु से परे,
शून्य अपनी शून्यता का अधिकारी है।
जैसे भी तुम देखोगे,
जानोगे, समझोगे
ये उसी दशा- दिशा का दरबारी है।
तभी मित्र, बिना बैर 
एक से लेकर नौ तक
सभी के साथ इसकी
एक तरह की साझेदारी है।