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Sunday, 1 December 2013

पॉजिटिव

छू सकते हो मुझे, मैं अछूत नहीं,
चल सकते हो मेरे साथ
एक साथी मिल जायेगा
तन्हा सफ़र जल्द ही कट जायेगा
दो पल साथ बिताने से
ख़ुशी मिलेगी, दोस्ती मिलेगी
दिल मिलेंगे जब दो बातें बढ़ेगी।

कल तक इन हाथों में हाथ डाले घूमते थे
आज क्या हुआ तुम्हें
छूने से डरते हो
साथ से कतराते हो
कल तक तुम्हारी ज़िन्दगी थी मैं
आज मौत से बदतर हु
सुर्ख लाल गुलाब थी मैं
आज सिर्फ कांटे नज़र आते है तुम्हें
बढ़कर देखो खुशबू अब भी बाकी है।

तुम शाहजहाँ, मैं मुमताज थी
ख्वाब देखा था ताज जैसे आशियाने का
 सब ढह गया
बस नज़र आती है कब्र मेरे इंतज़ार में
कब्र की तरफ बढ़ते कदम,धड़कने
अब कहना चाहती है अलविदा।
पर चाहती है कुछ पल का साथ
थोडा प्यार, थोडा दुलार।

आज मेरे लिए पूरा देश खड़ा है
पर तुम नहीं, तुम्हारा साथ नहीं
ये धड़कने चाहती है
एक पॉजिटिव स्पर्श, पॉजिटिव एहसास
एक पॉजिटिव पल… एक HIV पॉजिटिव ज़िन्दगी के लिए।








Tuesday, 26 November 2013

वीर गति

२६ नवंबर २००८ .... उससे पहले और उससे बाद हुए तमाम बाहरी, भीतरी  तथा प्रकृतिक दुर्घटनाओ में वीर गति को प्राप्त जवानों को सलाम  ....


एक क्रंद उठा दिल की पुकार सुन
काल का चक्र भी तेज़ हुआ
धरती का सीना चीर गया
थमती साँसों कि ठंठी आहें
शिथिल पढ़ते ये तेज़ कदम
माँ की छाती में समा गया

कोई वीर गया, सपूत गया
कोई काल के चक्र का आहार बना.



वो समा गया उन क्रंदन में
क्रोध की तेज़ अग्नि ज्वाल बना
वो चला गया पर छोड़ गया
अनगिनत सपने बंद आँखों के
माँ की हरी समृद्धि का
देश की शांति, उन्नति का
वो आतंक का साया हटा गया
हमे लड़ने का रास्ता दिखा गया।

वो तेज़ कदम रुक जो गए
सौ तेज़ कदम अब दौड़ेंगे
उन आँखों के सपनो को
अब हर आँखों में बोएंगे।
वो क्रंदन था, भीषण ज्वाला थी
सब तहस-नहस कर देने को
नेताओं  से विद्रोह जगा
भ्रस्टाचार पतन कर देने को।

वो  ज्वाला को भड़का गया
क्रंद को दहाड़ में बदल गया
बुझती आशा और अँधेरे को
साहस की किरण दिखा गया
देश कि शांति उन्नति को
वो माँ की छाती में समां गया।

कोई वीर गया, सपूत गया
कोई काल के चक्र का आहार बना।

अब  वक़्त आ गया उठने का
अब सब छोड़ो और दम जोड़ो
वक़्त है सूद चुकाने का
ज़िम्मेदारी उठाने का
माँ का कर्ज चुकाने का।
न कोई जात, न कोई पात,
न हिन्दू , न मुस्लिम है,
वतन के नाम तो हम यारों
हिंदी हैं, बस हिंदी हैं।





Saturday, 23 November 2013

डेमोक्रेटिक नागरिक

बड़ा करने के लिए सोच बड़ी रखते है 
क्यों हम 'क्या सोचे' इसी में खोये रहते है 
आज हर कोई परेशान है 
बड़ा बनता हर इंसान है 
माइक्रो काम और मैक्रो रिजल्ट 
हर किसी की पहचान है। 

मंगल चाँद पे कदम पड़े नहीं कि 
वहां घर बसाने के प्लान है 
देश इकॉनमी हर कोई जाने 
रुपया डॉलर हर कोई पहचाने 
चाय की चुस्की में बनाते देश का परिणाम है 
ये जनता विचारो का भण्डार है। 

ग्लोबल लोकल अब ग्लोकल बना 
हिंदी गानो पे अंग्रेजी तान है। 
नए नियमो पे रखते है निगाहें
ये आज के यूथ की पहचान है 
सब फेसबुक और गूगल की कारिस्तान है। 

स्कीम वर्ल्ड  फेमस कितनी इंडिया में 
गिनाते नेता आज हर भाषण में 
इलेक्शन का बुखार है भैया 
जनता भी साजो हथियार है। 
करप्शन से है बेहाल 
साथ हो रहे मालामाल 
रोज़ हो रहे आज कल अदालत में नए विचार 
सेक्शन 8(4), आर पी एक्ट बदलने से 
उम्मीद फिर इस बार है। 
थक गया ये नागरिक 
कितना बतलायेगा
अब तो NOTA भी इसका औजार है। 

नहीं चाहिए पार्टी 
ना कोई नेता 
अब तो भारत के लाल की पुकार है 
अब तो भारत के लाल की पुकार है। 

एक कहानी

एक पन्ना बयां करता  मेरी कहानी
चली मैं राजा के पलकों से
जीने दुनिया की रवानी
रानी थी उदास
कि मैं ना थी समझदार
थी उनकी गुड़िया
एकलौती और शैतान
पर दुनिया से बे खबर
हर डर से अनजान।
जिस रोज़ मैं चली
रानी रोती रही और कहती रही
कैसे कहूं इस जहाँ की कहानी
धूप-छाँव सी है ये ज़िंदगानी
मैंने हंस के कहा
राजा संग लिपट के कहा
ठंड में धूप और तपन में छाव संग
बना लूंगी अपनी कहानी।

राजा  हंसा और दिया अपना ख्याल
तू भरोसा मेरा
ना डरना बेकार, हर पग मैं तेरे ही हाल
रखना अपना ख्याल
ना अलफ़ाज़, न जुबां, इशारों में छुपा सब ज्ञान
आँखों से पढ़ना दुनिया का हर विज्ञान
प्रकृति भी करे इशारों का संवाद
आंसू तेरे दोस्त, हंसी दूजो का साथ
परिपक्वता तेरी पहचान, अभिलाषा मेरा अभिमान
चरित्र सदैव धैर्यवान, साख दूसरों का ज्ञान
पथ अग्रसर रहो , देवी तुम दुर्गा बनो
राजकुमारी हमारी अब तुम आगे बढ़ो
सबकी हंसी
लाखो सवालों का जवाब बनो
ज़िन्दगी के धूप की छाँव
और छाँव में शालीन बनो
हर स्वरुप, हर विषय
इंसान बनो
दिव्य करो।

शुक्रिया दोस्तो,  यह सफ़र आप जैसे हमराही जुड़ने से ही तो खूबसूरत सफ़र कहलाता है। 

डर-एक जिन्न

मुझे मिला एक जिन्न
हमेशा की तरह निकली थी घर से
कुछ सोचते अजीब ओ ग़रीब
पर मेरी पसंद
कभी गुस्सा तो कभी होंठ दाँतों तले
और न जाने उनमें हंसी कब होंठो को
दांतो से रिहा कर जाती,
आँखों, होठो, दांतो की रस्साकसी में
मुझे मिला एक जिन्न।

टकराया था मुझसे
कुछ बरस पहले, पहली दफे
ना मुराद बे काम समझ कोसा था उसको
फिर वो टकराता ही रहा
ये मुलाकात तो नहीं
टकराव ही कहूँगी
कि हर बार मैं ही बिखरती थी
इस मुलाकात में
जिसमे ना मर्ज़ी थी, ना कोशिश थी मेरी।
ये बिखरना  भी ग़जब,
हर बार फैलती गयी
सिमटती गयी और
मजबूत सुढृण बनती गयी मैं।

इस दफे जब मिला वोz
बे झिझक बे अदब मसल डाला उसे
रौंदा उसे
पता चल चुका था मुझे
कि ये एक जिन्न है
कई दफे का हिसाब जो चुकाना था
ढेर सारी मुराद जो बाकी थी
इच्छा नहीं कहूँगी
कि इसमें न मर्जी थी, न कोशिश थी उसकी।

रगड़ा नहीं रौंदा है मैंने उसे
फिर भी मैं बिखर  गयी
सिमट उठ खड़ी हुई
तो देखा
कठोर थी मैं अब
वो मासूमियत छुप गयी थी उसी में कही
कि कही फिर से ये टकराव
जख्मी न कर दे उसे।

सब डर उठे
कोई  टकराता नहीं अब
जिन्न से फैला दी वो बात
कि रौंदना सीख लिया है मैंने
वादा करके गया वो
फिर आएगा नया तूफ़ान ले कर  
इस बार देखो कौन जिन्न बनता है
मैं उसे या वो मुझे
कौन किसे रौंदता है।



Friday, 1 November 2013

KALAM SE EK AUR VICHAAR...

सच अटल है,ये रुकता नहीं, झुकता नहीं, टूटता नहीं, मिटता नहीं ,,,,और न जाने क्या क्या सच की ताकत का एहसास कराने के लिए सच की तारीफ में कहा जाता है.और हमे उसके साथ रहने के लिए उसकी ये अच्छाई स्वरुप रिश्वत दी जाती है. जिससे हम मानव जो हमेशा जीतना चाहते है, हारने के डर से सच का साथ न छोड़े. जैसे जैसे बड़े होते गए सच की कई कमियाँ कमजोरियां जैसे सच का टूटना, गिरना, घुटना, उसकी हार और दूसरों की जीत दिखने लगी, अब ये सच का प्यासा इंसान क्या करे? जिस लाठी को पकड़ वो जीत हासिल करने चला था आज वही उसे हर मोड़, हर नुक्कड़ पर, अखबार के हर पेज पर हारती दिखाई देती है. कुछ अपनी पार्टी बदल लेते है क्यूकि वो किसी भी कीमत पर ज़िन्दगी में हारना नहीं चाहते. और शायद वो गलत भी न हो. क्यूकि इसी समाज के कई विद्वानों ने बताया की सही गलत कुछ नहीं सब दिमाग का फेर है…. सब मोहमाया है. स्तिथि के हिसाब से react करे और खुद पर भरोसा। और इसी ज्ञान के भरोसे हम में से ना जाने कितने युवक और युवती कॉलेज एडमिशन में GD और पर्सनल इंटरव्यू से लेकर अपनी प्रोफेशनल ज़िन्दगी में अधिकतर एक्साम्स पास कर ले जाते है. जिसने सही को सही और गलत को गलत या फिर इसकी अदला बदली अपने हिसाब से की हो, ना की सच्चाई और झूठ के बिनाह पर और वो सफल भी रहा है,वो इन बातो को क्यों सुनेगा?

    वो सुनेगा...सुनेगा ही नही समझेगा भी.… अरे भाई,आपका क्यू, क्या,कैसे सब पूछना बनता है. हम सच और झूठ की नाव से कब सही गलत कि नाव पर चढ़ गए, ये हमे पता तो चलता है थोडा लेकिन देर से. यही भूल हम अपनी प्रैक्टिकल लाइफ में भी करते है. हम सच और झूठ को आये दिन सही और गलत के तराजू में तौलने लगते हैं और फिर confusion…
    सच या फिर झूठ एक परिस्थिति में घटी हुई घटना होती है जिसे अगर बिना छेड़-छाड़ के बताया जाए तो सच अन्यथा वो झूठ कहलाता है. बस इतनी सी ही कहानी है, इसके बाद शुरू होता है सही गलत का सिलसिला, कि उस घटना पर चिंतन,उसका आप पर और अन्य बातों पर साइड-इफ़ेक्ट और उसके मुताबिक़ बात का सही और गलत होना। ये दोनों बातें एक दूसरे से काफी हद तक जुडी हुई है कि हम कब बाउंड्री क्रॉस कर दूसरे पाले में गिर जाते है हमे कभी पता ही नहीं चलता और चलता भी है तो खुद को सही साबित करने के लिए अपने सही गलत के रूल्स बनाते लगते है जो दूसरे के सही गलत पर काट हो सके. 

 उदहारण के लिए, जैसे कि हमारे दोस्त, उनकी आदतें, एक्साम्स में हमारे मार्क्स,सिर्फ हमारे ही नहीं हमारे दोस्तों के मार्क्स, उनके साथ घूमना, जूनियर कॉलेज में आते के साथ दोस्त के साथ साथ गर्ल-फ्रेंड और बॉय-फ्रेंड की टेंशन, कैरियर चॉइस, ज़िन्दगी में एक्स्प्लोर करने का बेस्ट टाइम और उसमे कैरियर के लिए डेडिकेशन, फिर जॉब, शादी, उसके बीच में कई सारे इन्वेंशन्स, अपनी लिमिट्स जानने के लिए लिमिट्स क्रॉस करने में हुई नादानी और बहुत कुछ..इन सब में सच एक ही रहता है पर सही और गलत के मायने परिवार के हर सदस्य के लिए अलग अलग होते है. इसी सही गलत को समझने में,समझाने में हम सच को झूठ और झूठ को सच बनाना शुरू कर देते है.

  मैं इसमें कुछ नया नहीं बता रही हूँ, मैं बस अपनी बात रख रही हूँ और शायद आप भी इससे इत्तफ़ाक़ रखते हैं की जिस बात का अस्तित्व सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न हो मतलब यूनिवर्सली एक्सेप्टेड न हो, वो सही या गलत के तराजू में किस पैरामीटर पर तौली जायेगी। इसीलिए कहा जाता है develop your sense. Don't become football of other's views.

   मैं अब भी कई बार कंफ्यूज हो जाती हूँ और शायद आप भी.… मुझे पता है मैंने जो कुछ भी लिखा है वो इन्कम्प्लीट सा है. विचारों की कमी है. क्या मैं आपके विचारों का उपयोग कर सकती हूँ इसे कम्पलीट करने में.… 

धन्यवाद




In major reform, SC orders fixed tenure for bureaucrats - The Hindu


WELCOME!! WELCOME!! WELCOME!!

In major reform, SC orders fixed tenure for bureaucrats - The Hindu
                                            The Hindu

                             


Saturday, 26 October 2013

Kehna Chahti Hu...: waqt k nishaan

Kehna Chahti Hu...: वक़्त की हर चाल समझते रहे और हम भी बाजी चलते रहे ...: वक़्त की हर चाल समझते रहे और हम भी बाजी चलते रहे , कभी हम जीते तो कभी मात दे गया वो हमे.… पर वो कभी न रुका और ना ही हारा, जब हम जीते तो...

Friday, 25 October 2013


वक़्त की हर चाल समझते रहे और हम भी बाजी चलते रहे ,
कभी हम जीते तो कभी मात दे गया वो हमे.…
पर वो कभी न रुका और ना ही हारा,
जब हम जीते तो ख़ुशी बन ना रुका वो मेरे संग,
और जब हारे तब भी वो न रोया मेरे संग,
वो तो चलता रहा..  ग़ुजरता रहा..बेफिक्री का जामा ओढ़े,
और एक हम कि हर कदम उस वक़्त की दुहाई दे हसते और रोते रहते है…

Thursday, 24 October 2013



जैसे चाँद का मजहब नहीं पूछा तूने 
कि वो है किसका
दोनों ही इंतज़ार करे.…ईद हो या करवाचौथ की रात
तो क्यों बाटें हमे इन जंजीरो में 
जीने दो हम जैसे जीना चाहे...जिसके हो कर जीना चाहे...

Tuesday, 3 September 2013

अन्तर्द्वंध

घर की टेढ़ी खाट
टूटा चूल्हा और मीठा भात  
दादी की चोटी दादा का डंडा  
माँ के हाथों की रोटी
बापू का खेतों में बसा धंधा    
आम की छैया में गिल्ली डंडा 
मेरी तख्ती मास्टर का डंडा 
टेड़े मेढे रास्तों से मैं आ गयी 
इन चौड़ी सडकों में खड़ी न जानू कहा है मेरा घरौंदा 
सकरी गलियों में नहीं फसी 
चौड़े रास्तों पे रोज़ गिरी 
मद्धम रोशनी में सपना देखा 
इन उजालो में अंधी क्यों हुई मैं 
अब फिर याद आये टेढ़ी गलियां सीधा रास्ता 
अँधा मोड़ और मोड़ पे बांस का अड्डा 
न रुकने वाली बैलगाड़ी 
और उनके गले में बंधा वो घंटा 
बापू के हाथ की पकड़ 
और माँ का परदा 
उनका करतब बाबा का धंधा 
दादी की सुर्ती 
काका का हुक्का 
चाची का मरना 
हमारा बढ़ना 
फिर फ़र्क क्या है उस देस और इस शहर में 
यहाँ चलता वही धंधा खुल्लमखुल्ला
यहाँ परदा नहीं 
मन अब भी वही सोचता 
माँ-चाची यहाँ भी मरती 
बचपन तेजी से बढ़ता 
दादा दादी घर की शान 
देते ये भी वही ज्ञान 
रास्ते यहाँ बस चौड़े है,
जो कई गलियों को जोड़े है 
ये गलियां भी टेडी है,
कई कहानियों को मोड़ी है.
फिर डर कैसा, मैं क्यूँ परेशान?
है वही समाज वही इंसान 
सिद्धांतों और कानूनों पे टिका,
हर दिन टूटता, जुड़ता, बनता, बिखरता 
इनका वजूद और पहचान। 



वो मेरा मदारी

ज़िन्दगी जोडती रही कहानियाँ,
हम सड़क किनारे बैठ पन्ने सिलते रहे

लिखती कहानियों को पन्ने कम न पड़ जाए
कभी उधार लिया तो कभी खुद की चमड़ी उधेड़ी
कभी रंग भरे तो कभी लहू से सींचा
कि कभी उन रंगों में कमी न पड़ जाए

अपने अश्को को रोक के रखा
कि जैसी सतरंगी बनाई है ज़िन्दगी उसने
वो फीकी ना पड़ जाए
चाँद की रोशनी दिखाई,
अमावस में खुद को जलाया
कि कहीं उसकी लौ फीकी ना पड़ जाए

वो खेल खेलता रहा
और मैं उसके इशारों पे घूमती रही
कि कहीं बनानेवाले की फितरत में फर्क न पड़ जाए

पर आज रुक गयी मैं,
जी करता है इन पन्नो को फाड़ दूँ
उसके तार तोड़ दूं
उन रंगों पर अमावस की रात डाल दूं
क्यूंकि आज वो मुझे कहता है,
कि बंद कर ले आँखे,तमाशा ख़त्म हो गया.…

…और मैं मोहलत मांगती रही
कुछ गाड़ा रंग और दे दे इन पन्नों को.... 

Wednesday, 28 August 2013

मैं तेरा हिस्सा हूँ...

आज हलचल थी, तू कुछ घबरायी सी थी
ऐसा पहली दफा हुआ क्या,
मुझसे झूठ न बोल,
क्यों तू मुझे सुनकर कुछ शरमाई सी थी
वो भी खुश न थे,
क्या हुआ तू कुछ घबरायी सी थी,
मैं तेरा हिस्सा हूँ 
तेरे खून  से बना तेरा एक हिस्सा हूँ। 

आज उन्होंने मुझे देखा था, है ना.… 
पर क्यों उदासी छाई सी थी,
बोल ना माँ… तू क्यूँ  घबरायी सी थी,
जिसे तूने माँ कहा, वो मुझे देख खुश ना थी 
था उनके गोद में एक बच्चा 
उसे देख वो भरमाई सी थी,

वो जो तेरे साथ थे हरदम 
कल तक मुस्कुराकर  तुझे पुचकारते थे 
आज मुझे देख उन्होंने नज़रे कुछ चुराई सी थी 
वो भी खुश न थे, किस्मत से उन्हें कुछ रुसवाई सी थी।  

आज तू रो क्यूँ रही ?
अच्छा नहीं पूछती, पर सुन ना माँ,
रो ले जितना है रोना, 
मैं तेरी  खुशियाँ बन के आऊँगी, बड़ा नाम कमाऊंगी। 

फिर डाक्टरनी जी आई है.… 
माँ, बोल न तू क्यूँ रो रही ?
क्यूँ तू इतनी घबरायी सी है ?
ये हलचल कैसी है ?
माँ ये दर्द क्यूँ उठा?
ये घुटन कैसी है?
माँ ये मुझे खींच क्यूँ रहा?
तू घबरायी सी क्यूँ है?

माँ,  ऐसे कैसे तेरी दुनिया में आ जाऊ ?
अभी तो मैं कम बनायीं सी हूँ। 

इनको बोल ज़रा, मुझे दर्द  हो रहा 
मुझे छोड़, तुझे दर्द हो रहा,
बोल ना अपने घरवालो से 
ऐसे गुमसुम सी सताई क्यूँ है?
बोल कि मैं तेरा हिस्सा हूँ 
माँ दुखता है जब तू रोती है 
आज तेरी आँखे कुम्हलाई क्यूँ है ?

मैं घुट रही हूँ, रोक न इन्हें 
मैं सिर्फ तेरा हिस्सा ही नहीं,
इन जैसे विकसित का आधार हूँ मैं। 
मैं एक खून का लोथड़ा ही नहीं,
तेरी इस सृष्टि का आधार हूँ मैं। 
बार-बार दर्द की आजमाइश का, 
लोगो की बेफिक्री का, 
अँधेरे में ज्योति जलाने वाला चिराग हूँ। 

चुप न रह, बोल दे आज,
वर्ना हर दिन तू रुलाई जाएगी 
औरत हो औरत को जनने पर सताई जाएगी। 


Friday, 23 August 2013

बिना नियम-कायदे का खेल


मुझे  आपसे रूबरू होने का समय नहीं पता ,इसलिए अपना कुछ अनुभव इस पेज के  जरिये           आपके लिए  छोड़े जा रही हू।  यह अनुभव आपका थोडा समय लेगा इसीलिए वीकेंड का टाइम चुना कि शायद शाम  की चाय की चुस्की के साथ हम भी रूबरू हो पाए .…मेरी डायरी के कुछ पन्ने आपके हाथो में.…. 

         ज़िन्दगी उलझी हुई डोर सी लगने लगी थी और मैं उसमे फंसी हुई पर आहिस्ता-आहिस्ता उसके धागे को खोलने की कोशिश में लगी थी।  कभी धागे का एक सिरा खीचने से  गांठे खुद-ब-खुद सुलझ जाती तो तसल्ली मिलती  और कभी कभी लाख जतन के बाद  भी हल्का सा खिछाव कुछ नयी गांठे दे जाता, जो देखने में  बड़ी ही मामूली  जान पड़ती पर  उस डोर से जुडी हर एक डोर को खुद में उलझाने या फिर अटकाने की सारी खुबिया रखती । बस इन्ही उलझनों को सुलझाने में मेरा समय कट रहा था। कभी  जोश से भरी हुई पतंग की तरह हवा में उड़कर आसमान के पार जाना चाहती , तो कभी परेशानियों में खुद को उलझा  पाकर  अकेला और हारा हुआ महसूस करती  इन परेशानियों और उलझनों को अपनी परीक्षा की घडी का मापदंड मानकर इस भरसक प्रयास में लगी हुई थी कि  बस कुछ भी हो जाए हारना नहीं है, और गर हार गए तो रुकना नहीं है।   एक दिन शाम में घर की बालकनी में पड़ी कुर्सी को अपनी तरह अकेला पाया तो चाय के एक कप  और रेडियो के साथ उसका साथ देने बालकनी पर चली गयी। मौसम भी अच्छा था, हवाएं तेज़ थी, पुराने गाने गुनगुनाते गुनगुनाते बहुत दिन बाद  मौका देख दिल ने एक बात कही और मैं बिना किसी न नुकुर के झट से तैयार हो गयी और निकल गयी अपनी मनपसंद जगह 'इंडिया गेट' के लिए। 

Thursday, 22 August 2013

सब कहते है वो मेरा भाई था

सब कहते है वो मेरा भाई था ,
तन गोरा मन भी गोरा ,
किलकारियों से उसकी खिलखिलाहट  थी सबकी ,
न जाना था मैंने, न थी मन में शंका,
होता क्या है भाई, क्या उसका प्यार,
भाई भी है  मेरे, प्यार परिवार भी है,
चंद लम्हे में उसने कर दिया उन्हें पराया
बन कर मेरा सगा,
न साथ, न ही खेल पाई,
सब कुछ छोड़ो उसे छु भी नहीं पाई
फिर कैसी ममता कैसा सगापन
जो साथ है अब  तक
उनसे कैसी ये  दूरी,
क्यों लोग राखी पे मुझे है देखते
क्यों इंतज़ार करती मैं   राखी पर उसका,
रखु कैसी उम्मीद,
वो गर न आया तो कोई क्यों आये
 जगा  गया एक टीस मन में,
की वो भाई था मेरा
मेरा सगा  मेरी माँ का दुलारा
नौ महीने उसने उसको है पाला
पर नहीं रास  आई उसे दुनिया हमारी
गया वो रोता छोड़कर हमको
वापस न आने की कसम जैसी खायी
गर वो सगा है मेरा,
है वो भाई और बेटा किसी का,
खून है मेरा उसकी रगों में
तो क्यों मेरे आंसू नहीं रुलाते है उसको,
क्यों वो मजबूर हो दौड़ आता नहीं है,
गर इतना मैं रोउ उनके सामने
जिसे तुमने पराया कहा है
यह उम्मीद नहीं, विश्वास है मेरा,
वो दुनिया छोड़
थाम ले मेरा दामन
भर के बाहों में मुझको
प्यार दे वो इतना
जिसके दशांश की उम्मीद है इस सगे  से,
फिर भी लोग कहते है
वो भाई था मेरा
सगा था वो मेरा
क्यों नहीं उसको दर्द
पिता के जख्मो से
न रोये वो देख माँ की  छटपटाहट
 या वो देव ही बन गया निर्दयी
कि  आशा की जगा  किरण
भूल गया हमको
उसे  हम अपने आंसू से बुझाये
अब भी कहोगे कि
सगा था वो मेरा
तो तुम  दुनिया वालो
नहीं  जान पाए, नहीं सोच पाए,
कि होता क्या है सगा और पराया।

- गरिमा मिश्र

आज फिर मुलाकात हुई उस सच से
जिसे बरसो पहले छोड़ आई थी कही
कि साथ उसके रहने की हिम्मत न थी।

चल पड़ी थी ज़िन्दगी के सफ़र पर
कि मंजिल मिलते ही सच को पहचान मिल जाएगी
पर बीती रात के पलटते पन्नो से
कब वो उठ सामने आ  गया
कि मैं चलते हुए थम सी गयी।

आज फिर वैसी ही उदासी छाई  है मुझमे
उतने ही आँसू
और हिम्मत भी उतनी
बस तब जज़्बात साथ देने को थे
बाजुओ  में थी ताकत, हिम्मत को भी गुमां था
पर आज सच्चाई को  सामने  पाकर
मेरुदंड भी कमजोर सी लगती है।

अब बस हवाला दिए घुमती हु
कि मैं बीती  बातों में  नहीं जीती,
और ये झुकाव मेरे बढ़ने का इशारा समझो ….

  -गरिमा मिश्रा