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Wednesday, 28 August 2013

मैं तेरा हिस्सा हूँ...

आज हलचल थी, तू कुछ घबरायी सी थी
ऐसा पहली दफा हुआ क्या,
मुझसे झूठ न बोल,
क्यों तू मुझे सुनकर कुछ शरमाई सी थी
वो भी खुश न थे,
क्या हुआ तू कुछ घबरायी सी थी,
मैं तेरा हिस्सा हूँ 
तेरे खून  से बना तेरा एक हिस्सा हूँ। 

आज उन्होंने मुझे देखा था, है ना.… 
पर क्यों उदासी छाई सी थी,
बोल ना माँ… तू क्यूँ  घबरायी सी थी,
जिसे तूने माँ कहा, वो मुझे देख खुश ना थी 
था उनके गोद में एक बच्चा 
उसे देख वो भरमाई सी थी,

वो जो तेरे साथ थे हरदम 
कल तक मुस्कुराकर  तुझे पुचकारते थे 
आज मुझे देख उन्होंने नज़रे कुछ चुराई सी थी 
वो भी खुश न थे, किस्मत से उन्हें कुछ रुसवाई सी थी।  

आज तू रो क्यूँ रही ?
अच्छा नहीं पूछती, पर सुन ना माँ,
रो ले जितना है रोना, 
मैं तेरी  खुशियाँ बन के आऊँगी, बड़ा नाम कमाऊंगी। 

फिर डाक्टरनी जी आई है.… 
माँ, बोल न तू क्यूँ रो रही ?
क्यूँ तू इतनी घबरायी सी है ?
ये हलचल कैसी है ?
माँ ये दर्द क्यूँ उठा?
ये घुटन कैसी है?
माँ ये मुझे खींच क्यूँ रहा?
तू घबरायी सी क्यूँ है?

माँ,  ऐसे कैसे तेरी दुनिया में आ जाऊ ?
अभी तो मैं कम बनायीं सी हूँ। 

इनको बोल ज़रा, मुझे दर्द  हो रहा 
मुझे छोड़, तुझे दर्द हो रहा,
बोल ना अपने घरवालो से 
ऐसे गुमसुम सी सताई क्यूँ है?
बोल कि मैं तेरा हिस्सा हूँ 
माँ दुखता है जब तू रोती है 
आज तेरी आँखे कुम्हलाई क्यूँ है ?

मैं घुट रही हूँ, रोक न इन्हें 
मैं सिर्फ तेरा हिस्सा ही नहीं,
इन जैसे विकसित का आधार हूँ मैं। 
मैं एक खून का लोथड़ा ही नहीं,
तेरी इस सृष्टि का आधार हूँ मैं। 
बार-बार दर्द की आजमाइश का, 
लोगो की बेफिक्री का, 
अँधेरे में ज्योति जलाने वाला चिराग हूँ। 

चुप न रह, बोल दे आज,
वर्ना हर दिन तू रुलाई जाएगी 
औरत हो औरत को जनने पर सताई जाएगी। 


Friday, 23 August 2013

बिना नियम-कायदे का खेल


मुझे  आपसे रूबरू होने का समय नहीं पता ,इसलिए अपना कुछ अनुभव इस पेज के  जरिये           आपके लिए  छोड़े जा रही हू।  यह अनुभव आपका थोडा समय लेगा इसीलिए वीकेंड का टाइम चुना कि शायद शाम  की चाय की चुस्की के साथ हम भी रूबरू हो पाए .…मेरी डायरी के कुछ पन्ने आपके हाथो में.…. 

         ज़िन्दगी उलझी हुई डोर सी लगने लगी थी और मैं उसमे फंसी हुई पर आहिस्ता-आहिस्ता उसके धागे को खोलने की कोशिश में लगी थी।  कभी धागे का एक सिरा खीचने से  गांठे खुद-ब-खुद सुलझ जाती तो तसल्ली मिलती  और कभी कभी लाख जतन के बाद  भी हल्का सा खिछाव कुछ नयी गांठे दे जाता, जो देखने में  बड़ी ही मामूली  जान पड़ती पर  उस डोर से जुडी हर एक डोर को खुद में उलझाने या फिर अटकाने की सारी खुबिया रखती । बस इन्ही उलझनों को सुलझाने में मेरा समय कट रहा था। कभी  जोश से भरी हुई पतंग की तरह हवा में उड़कर आसमान के पार जाना चाहती , तो कभी परेशानियों में खुद को उलझा  पाकर  अकेला और हारा हुआ महसूस करती  इन परेशानियों और उलझनों को अपनी परीक्षा की घडी का मापदंड मानकर इस भरसक प्रयास में लगी हुई थी कि  बस कुछ भी हो जाए हारना नहीं है, और गर हार गए तो रुकना नहीं है।   एक दिन शाम में घर की बालकनी में पड़ी कुर्सी को अपनी तरह अकेला पाया तो चाय के एक कप  और रेडियो के साथ उसका साथ देने बालकनी पर चली गयी। मौसम भी अच्छा था, हवाएं तेज़ थी, पुराने गाने गुनगुनाते गुनगुनाते बहुत दिन बाद  मौका देख दिल ने एक बात कही और मैं बिना किसी न नुकुर के झट से तैयार हो गयी और निकल गयी अपनी मनपसंद जगह 'इंडिया गेट' के लिए। 

Thursday, 22 August 2013

सब कहते है वो मेरा भाई था

सब कहते है वो मेरा भाई था ,
तन गोरा मन भी गोरा ,
किलकारियों से उसकी खिलखिलाहट  थी सबकी ,
न जाना था मैंने, न थी मन में शंका,
होता क्या है भाई, क्या उसका प्यार,
भाई भी है  मेरे, प्यार परिवार भी है,
चंद लम्हे में उसने कर दिया उन्हें पराया
बन कर मेरा सगा,
न साथ, न ही खेल पाई,
सब कुछ छोड़ो उसे छु भी नहीं पाई
फिर कैसी ममता कैसा सगापन
जो साथ है अब  तक
उनसे कैसी ये  दूरी,
क्यों लोग राखी पे मुझे है देखते
क्यों इंतज़ार करती मैं   राखी पर उसका,
रखु कैसी उम्मीद,
वो गर न आया तो कोई क्यों आये
 जगा  गया एक टीस मन में,
की वो भाई था मेरा
मेरा सगा  मेरी माँ का दुलारा
नौ महीने उसने उसको है पाला
पर नहीं रास  आई उसे दुनिया हमारी
गया वो रोता छोड़कर हमको
वापस न आने की कसम जैसी खायी
गर वो सगा है मेरा,
है वो भाई और बेटा किसी का,
खून है मेरा उसकी रगों में
तो क्यों मेरे आंसू नहीं रुलाते है उसको,
क्यों वो मजबूर हो दौड़ आता नहीं है,
गर इतना मैं रोउ उनके सामने
जिसे तुमने पराया कहा है
यह उम्मीद नहीं, विश्वास है मेरा,
वो दुनिया छोड़
थाम ले मेरा दामन
भर के बाहों में मुझको
प्यार दे वो इतना
जिसके दशांश की उम्मीद है इस सगे  से,
फिर भी लोग कहते है
वो भाई था मेरा
सगा था वो मेरा
क्यों नहीं उसको दर्द
पिता के जख्मो से
न रोये वो देख माँ की  छटपटाहट
 या वो देव ही बन गया निर्दयी
कि  आशा की जगा  किरण
भूल गया हमको
उसे  हम अपने आंसू से बुझाये
अब भी कहोगे कि
सगा था वो मेरा
तो तुम  दुनिया वालो
नहीं  जान पाए, नहीं सोच पाए,
कि होता क्या है सगा और पराया।

- गरिमा मिश्र

आज फिर मुलाकात हुई उस सच से
जिसे बरसो पहले छोड़ आई थी कही
कि साथ उसके रहने की हिम्मत न थी।

चल पड़ी थी ज़िन्दगी के सफ़र पर
कि मंजिल मिलते ही सच को पहचान मिल जाएगी
पर बीती रात के पलटते पन्नो से
कब वो उठ सामने आ  गया
कि मैं चलते हुए थम सी गयी।

आज फिर वैसी ही उदासी छाई  है मुझमे
उतने ही आँसू
और हिम्मत भी उतनी
बस तब जज़्बात साथ देने को थे
बाजुओ  में थी ताकत, हिम्मत को भी गुमां था
पर आज सच्चाई को  सामने  पाकर
मेरुदंड भी कमजोर सी लगती है।

अब बस हवाला दिए घुमती हु
कि मैं बीती  बातों में  नहीं जीती,
और ये झुकाव मेरे बढ़ने का इशारा समझो ….

  -गरिमा मिश्रा