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Tuesday, 3 September 2013

अन्तर्द्वंध

घर की टेढ़ी खाट
टूटा चूल्हा और मीठा भात  
दादी की चोटी दादा का डंडा  
माँ के हाथों की रोटी
बापू का खेतों में बसा धंधा    
आम की छैया में गिल्ली डंडा 
मेरी तख्ती मास्टर का डंडा 
टेड़े मेढे रास्तों से मैं आ गयी 
इन चौड़ी सडकों में खड़ी न जानू कहा है मेरा घरौंदा 
सकरी गलियों में नहीं फसी 
चौड़े रास्तों पे रोज़ गिरी 
मद्धम रोशनी में सपना देखा 
इन उजालो में अंधी क्यों हुई मैं 
अब फिर याद आये टेढ़ी गलियां सीधा रास्ता 
अँधा मोड़ और मोड़ पे बांस का अड्डा 
न रुकने वाली बैलगाड़ी 
और उनके गले में बंधा वो घंटा 
बापू के हाथ की पकड़ 
और माँ का परदा 
उनका करतब बाबा का धंधा 
दादी की सुर्ती 
काका का हुक्का 
चाची का मरना 
हमारा बढ़ना 
फिर फ़र्क क्या है उस देस और इस शहर में 
यहाँ चलता वही धंधा खुल्लमखुल्ला
यहाँ परदा नहीं 
मन अब भी वही सोचता 
माँ-चाची यहाँ भी मरती 
बचपन तेजी से बढ़ता 
दादा दादी घर की शान 
देते ये भी वही ज्ञान 
रास्ते यहाँ बस चौड़े है,
जो कई गलियों को जोड़े है 
ये गलियां भी टेडी है,
कई कहानियों को मोड़ी है.
फिर डर कैसा, मैं क्यूँ परेशान?
है वही समाज वही इंसान 
सिद्धांतों और कानूनों पे टिका,
हर दिन टूटता, जुड़ता, बनता, बिखरता 
इनका वजूद और पहचान। 



वो मेरा मदारी

ज़िन्दगी जोडती रही कहानियाँ,
हम सड़क किनारे बैठ पन्ने सिलते रहे

लिखती कहानियों को पन्ने कम न पड़ जाए
कभी उधार लिया तो कभी खुद की चमड़ी उधेड़ी
कभी रंग भरे तो कभी लहू से सींचा
कि कभी उन रंगों में कमी न पड़ जाए

अपने अश्को को रोक के रखा
कि जैसी सतरंगी बनाई है ज़िन्दगी उसने
वो फीकी ना पड़ जाए
चाँद की रोशनी दिखाई,
अमावस में खुद को जलाया
कि कहीं उसकी लौ फीकी ना पड़ जाए

वो खेल खेलता रहा
और मैं उसके इशारों पे घूमती रही
कि कहीं बनानेवाले की फितरत में फर्क न पड़ जाए

पर आज रुक गयी मैं,
जी करता है इन पन्नो को फाड़ दूँ
उसके तार तोड़ दूं
उन रंगों पर अमावस की रात डाल दूं
क्यूंकि आज वो मुझे कहता है,
कि बंद कर ले आँखे,तमाशा ख़त्म हो गया.…

…और मैं मोहलत मांगती रही
कुछ गाड़ा रंग और दे दे इन पन्नों को....