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Tuesday, 26 November 2013

वीर गति

२६ नवंबर २००८ .... उससे पहले और उससे बाद हुए तमाम बाहरी, भीतरी  तथा प्रकृतिक दुर्घटनाओ में वीर गति को प्राप्त जवानों को सलाम  ....


एक क्रंद उठा दिल की पुकार सुन
काल का चक्र भी तेज़ हुआ
धरती का सीना चीर गया
थमती साँसों कि ठंठी आहें
शिथिल पढ़ते ये तेज़ कदम
माँ की छाती में समा गया

कोई वीर गया, सपूत गया
कोई काल के चक्र का आहार बना.



वो समा गया उन क्रंदन में
क्रोध की तेज़ अग्नि ज्वाल बना
वो चला गया पर छोड़ गया
अनगिनत सपने बंद आँखों के
माँ की हरी समृद्धि का
देश की शांति, उन्नति का
वो आतंक का साया हटा गया
हमे लड़ने का रास्ता दिखा गया।

वो तेज़ कदम रुक जो गए
सौ तेज़ कदम अब दौड़ेंगे
उन आँखों के सपनो को
अब हर आँखों में बोएंगे।
वो क्रंदन था, भीषण ज्वाला थी
सब तहस-नहस कर देने को
नेताओं  से विद्रोह जगा
भ्रस्टाचार पतन कर देने को।

वो  ज्वाला को भड़का गया
क्रंद को दहाड़ में बदल गया
बुझती आशा और अँधेरे को
साहस की किरण दिखा गया
देश कि शांति उन्नति को
वो माँ की छाती में समां गया।

कोई वीर गया, सपूत गया
कोई काल के चक्र का आहार बना।

अब  वक़्त आ गया उठने का
अब सब छोड़ो और दम जोड़ो
वक़्त है सूद चुकाने का
ज़िम्मेदारी उठाने का
माँ का कर्ज चुकाने का।
न कोई जात, न कोई पात,
न हिन्दू , न मुस्लिम है,
वतन के नाम तो हम यारों
हिंदी हैं, बस हिंदी हैं।





Saturday, 23 November 2013

डेमोक्रेटिक नागरिक

बड़ा करने के लिए सोच बड़ी रखते है 
क्यों हम 'क्या सोचे' इसी में खोये रहते है 
आज हर कोई परेशान है 
बड़ा बनता हर इंसान है 
माइक्रो काम और मैक्रो रिजल्ट 
हर किसी की पहचान है। 

मंगल चाँद पे कदम पड़े नहीं कि 
वहां घर बसाने के प्लान है 
देश इकॉनमी हर कोई जाने 
रुपया डॉलर हर कोई पहचाने 
चाय की चुस्की में बनाते देश का परिणाम है 
ये जनता विचारो का भण्डार है। 

ग्लोबल लोकल अब ग्लोकल बना 
हिंदी गानो पे अंग्रेजी तान है। 
नए नियमो पे रखते है निगाहें
ये आज के यूथ की पहचान है 
सब फेसबुक और गूगल की कारिस्तान है। 

स्कीम वर्ल्ड  फेमस कितनी इंडिया में 
गिनाते नेता आज हर भाषण में 
इलेक्शन का बुखार है भैया 
जनता भी साजो हथियार है। 
करप्शन से है बेहाल 
साथ हो रहे मालामाल 
रोज़ हो रहे आज कल अदालत में नए विचार 
सेक्शन 8(4), आर पी एक्ट बदलने से 
उम्मीद फिर इस बार है। 
थक गया ये नागरिक 
कितना बतलायेगा
अब तो NOTA भी इसका औजार है। 

नहीं चाहिए पार्टी 
ना कोई नेता 
अब तो भारत के लाल की पुकार है 
अब तो भारत के लाल की पुकार है। 

एक कहानी

एक पन्ना बयां करता  मेरी कहानी
चली मैं राजा के पलकों से
जीने दुनिया की रवानी
रानी थी उदास
कि मैं ना थी समझदार
थी उनकी गुड़िया
एकलौती और शैतान
पर दुनिया से बे खबर
हर डर से अनजान।
जिस रोज़ मैं चली
रानी रोती रही और कहती रही
कैसे कहूं इस जहाँ की कहानी
धूप-छाँव सी है ये ज़िंदगानी
मैंने हंस के कहा
राजा संग लिपट के कहा
ठंड में धूप और तपन में छाव संग
बना लूंगी अपनी कहानी।

राजा  हंसा और दिया अपना ख्याल
तू भरोसा मेरा
ना डरना बेकार, हर पग मैं तेरे ही हाल
रखना अपना ख्याल
ना अलफ़ाज़, न जुबां, इशारों में छुपा सब ज्ञान
आँखों से पढ़ना दुनिया का हर विज्ञान
प्रकृति भी करे इशारों का संवाद
आंसू तेरे दोस्त, हंसी दूजो का साथ
परिपक्वता तेरी पहचान, अभिलाषा मेरा अभिमान
चरित्र सदैव धैर्यवान, साख दूसरों का ज्ञान
पथ अग्रसर रहो , देवी तुम दुर्गा बनो
राजकुमारी हमारी अब तुम आगे बढ़ो
सबकी हंसी
लाखो सवालों का जवाब बनो
ज़िन्दगी के धूप की छाँव
और छाँव में शालीन बनो
हर स्वरुप, हर विषय
इंसान बनो
दिव्य करो।

शुक्रिया दोस्तो,  यह सफ़र आप जैसे हमराही जुड़ने से ही तो खूबसूरत सफ़र कहलाता है। 

डर-एक जिन्न

मुझे मिला एक जिन्न
हमेशा की तरह निकली थी घर से
कुछ सोचते अजीब ओ ग़रीब
पर मेरी पसंद
कभी गुस्सा तो कभी होंठ दाँतों तले
और न जाने उनमें हंसी कब होंठो को
दांतो से रिहा कर जाती,
आँखों, होठो, दांतो की रस्साकसी में
मुझे मिला एक जिन्न।

टकराया था मुझसे
कुछ बरस पहले, पहली दफे
ना मुराद बे काम समझ कोसा था उसको
फिर वो टकराता ही रहा
ये मुलाकात तो नहीं
टकराव ही कहूँगी
कि हर बार मैं ही बिखरती थी
इस मुलाकात में
जिसमे ना मर्ज़ी थी, ना कोशिश थी मेरी।
ये बिखरना  भी ग़जब,
हर बार फैलती गयी
सिमटती गयी और
मजबूत सुढृण बनती गयी मैं।

इस दफे जब मिला वोz
बे झिझक बे अदब मसल डाला उसे
रौंदा उसे
पता चल चुका था मुझे
कि ये एक जिन्न है
कई दफे का हिसाब जो चुकाना था
ढेर सारी मुराद जो बाकी थी
इच्छा नहीं कहूँगी
कि इसमें न मर्जी थी, न कोशिश थी उसकी।

रगड़ा नहीं रौंदा है मैंने उसे
फिर भी मैं बिखर  गयी
सिमट उठ खड़ी हुई
तो देखा
कठोर थी मैं अब
वो मासूमियत छुप गयी थी उसी में कही
कि कही फिर से ये टकराव
जख्मी न कर दे उसे।

सब डर उठे
कोई  टकराता नहीं अब
जिन्न से फैला दी वो बात
कि रौंदना सीख लिया है मैंने
वादा करके गया वो
फिर आएगा नया तूफ़ान ले कर  
इस बार देखो कौन जिन्न बनता है
मैं उसे या वो मुझे
कौन किसे रौंदता है।



Friday, 1 November 2013

KALAM SE EK AUR VICHAAR...

सच अटल है,ये रुकता नहीं, झुकता नहीं, टूटता नहीं, मिटता नहीं ,,,,और न जाने क्या क्या सच की ताकत का एहसास कराने के लिए सच की तारीफ में कहा जाता है.और हमे उसके साथ रहने के लिए उसकी ये अच्छाई स्वरुप रिश्वत दी जाती है. जिससे हम मानव जो हमेशा जीतना चाहते है, हारने के डर से सच का साथ न छोड़े. जैसे जैसे बड़े होते गए सच की कई कमियाँ कमजोरियां जैसे सच का टूटना, गिरना, घुटना, उसकी हार और दूसरों की जीत दिखने लगी, अब ये सच का प्यासा इंसान क्या करे? जिस लाठी को पकड़ वो जीत हासिल करने चला था आज वही उसे हर मोड़, हर नुक्कड़ पर, अखबार के हर पेज पर हारती दिखाई देती है. कुछ अपनी पार्टी बदल लेते है क्यूकि वो किसी भी कीमत पर ज़िन्दगी में हारना नहीं चाहते. और शायद वो गलत भी न हो. क्यूकि इसी समाज के कई विद्वानों ने बताया की सही गलत कुछ नहीं सब दिमाग का फेर है…. सब मोहमाया है. स्तिथि के हिसाब से react करे और खुद पर भरोसा। और इसी ज्ञान के भरोसे हम में से ना जाने कितने युवक और युवती कॉलेज एडमिशन में GD और पर्सनल इंटरव्यू से लेकर अपनी प्रोफेशनल ज़िन्दगी में अधिकतर एक्साम्स पास कर ले जाते है. जिसने सही को सही और गलत को गलत या फिर इसकी अदला बदली अपने हिसाब से की हो, ना की सच्चाई और झूठ के बिनाह पर और वो सफल भी रहा है,वो इन बातो को क्यों सुनेगा?

    वो सुनेगा...सुनेगा ही नही समझेगा भी.… अरे भाई,आपका क्यू, क्या,कैसे सब पूछना बनता है. हम सच और झूठ की नाव से कब सही गलत कि नाव पर चढ़ गए, ये हमे पता तो चलता है थोडा लेकिन देर से. यही भूल हम अपनी प्रैक्टिकल लाइफ में भी करते है. हम सच और झूठ को आये दिन सही और गलत के तराजू में तौलने लगते हैं और फिर confusion…
    सच या फिर झूठ एक परिस्थिति में घटी हुई घटना होती है जिसे अगर बिना छेड़-छाड़ के बताया जाए तो सच अन्यथा वो झूठ कहलाता है. बस इतनी सी ही कहानी है, इसके बाद शुरू होता है सही गलत का सिलसिला, कि उस घटना पर चिंतन,उसका आप पर और अन्य बातों पर साइड-इफ़ेक्ट और उसके मुताबिक़ बात का सही और गलत होना। ये दोनों बातें एक दूसरे से काफी हद तक जुडी हुई है कि हम कब बाउंड्री क्रॉस कर दूसरे पाले में गिर जाते है हमे कभी पता ही नहीं चलता और चलता भी है तो खुद को सही साबित करने के लिए अपने सही गलत के रूल्स बनाते लगते है जो दूसरे के सही गलत पर काट हो सके. 

 उदहारण के लिए, जैसे कि हमारे दोस्त, उनकी आदतें, एक्साम्स में हमारे मार्क्स,सिर्फ हमारे ही नहीं हमारे दोस्तों के मार्क्स, उनके साथ घूमना, जूनियर कॉलेज में आते के साथ दोस्त के साथ साथ गर्ल-फ्रेंड और बॉय-फ्रेंड की टेंशन, कैरियर चॉइस, ज़िन्दगी में एक्स्प्लोर करने का बेस्ट टाइम और उसमे कैरियर के लिए डेडिकेशन, फिर जॉब, शादी, उसके बीच में कई सारे इन्वेंशन्स, अपनी लिमिट्स जानने के लिए लिमिट्स क्रॉस करने में हुई नादानी और बहुत कुछ..इन सब में सच एक ही रहता है पर सही और गलत के मायने परिवार के हर सदस्य के लिए अलग अलग होते है. इसी सही गलत को समझने में,समझाने में हम सच को झूठ और झूठ को सच बनाना शुरू कर देते है.

  मैं इसमें कुछ नया नहीं बता रही हूँ, मैं बस अपनी बात रख रही हूँ और शायद आप भी इससे इत्तफ़ाक़ रखते हैं की जिस बात का अस्तित्व सार्वजनिक तौर पर स्वीकार न हो मतलब यूनिवर्सली एक्सेप्टेड न हो, वो सही या गलत के तराजू में किस पैरामीटर पर तौली जायेगी। इसीलिए कहा जाता है develop your sense. Don't become football of other's views.

   मैं अब भी कई बार कंफ्यूज हो जाती हूँ और शायद आप भी.… मुझे पता है मैंने जो कुछ भी लिखा है वो इन्कम्प्लीट सा है. विचारों की कमी है. क्या मैं आपके विचारों का उपयोग कर सकती हूँ इसे कम्पलीट करने में.… 

धन्यवाद




In major reform, SC orders fixed tenure for bureaucrats - The Hindu


WELCOME!! WELCOME!! WELCOME!!

In major reform, SC orders fixed tenure for bureaucrats - The Hindu
                                            The Hindu