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Monday, 22 December 2014

पेशावर



एक बाढ़ सी आ गयी। कही आंसुओं की तो कही नफरत की.… कही मौत की… तो कही खून की … कही धर्म पे सवाल की तो कही धर्म के नुमाइंदों के नियत पे सवाल। बाढ़ आ गयी थी उस रोज़ जब खबर आई पडोसी देस से की कई नन्हे बिलख रहे है आस पास मौत को नाचता देख। रोना तो जैसे कम पड़ रहा था।  गुस्सा नामर्दी का सुबूत।  फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, न्यूज़ चैनल्स, मीडिया कोई भी हर जगह रो रही थी आवाज़े।  क्या उन तक नहीं जाती ये चीख? ये हम सोचते उससे पहले जवाब हाज़िर था.... जाती है उन तक ये चीख।  है उनमे दिल।  खौलता है उनका खून अपनों का दर्द देख।  रोते है वो भी।  बिलखते  है जब उनका अपना कोई छूट जाता है उनसे।  इसिलए तो संदेसा भेजा की ये बदला है हमारे खून का। वो अपने खून का बदला किसी के अपनों के खून से कर गए।  तकलीफ हुई की ये वो धर्म के नाम पे करते है।  बहुत बुराई हुई।  हर तरफ कौतुहल सन्नाटा और उस सन्नाटे में एक गाला फाड़ के चिल्लाती हवा जो कह रही थी क्या मैं सांस ले सकती हूँ?  कि कही कभी रोते  रोते माँ अपने बच्चे का हाथ पकड़ उसे गले से लगा ये तसल्ली करती की उसकी औलाद ज़िंदा बच गयी आज। फिर डर जाती क्या कल बच पायेगी?

तो कही ठन्डे पड़े हाथो को पकडे खुद यकीं दिलाता वालिद कि शायद सुबह की तरह ये फिर थिरक उठे एक बार।  क्यों आखिर क्यों हम ऐसी भावनाओ को याद कर के रोते रहे। क्या करें, जो बच गए है और जो अपने छूट गए.…उनके लिए हम भी बन्दूक उठाये? कैसे तसल्ली दे खुद को कि अपनी औलादो को इंसाफ दिला सकेगे, जो बेक़सूर थे।  जिन्हे तो शायद ये भी न पता हो ये खूनी नाच हुआ क्यों था? मलाला, ये एक ही नाम जानती हूँ मैं, और उसके जैसे न जाने कितने बच्चो ने अपनी मासूमियत खो इसके खिलाफ अहिंसा शांति का रास्ता चुना। हिम्मत दिखाई और बढ़ाई भी। पर क्या करे? किसे दोष दे? एक तरफ बड़े लोगो की इजात की हुई नोबेल प्राइज, उसका सन्देश और दूसरी तरफ कुछ और बड़े लोगो की उपज..य़े संगठन, जो आज खुद में ही ब्रांड बने है। जो अपना फन निकाले डसने को तैयार है…मज़े की बात तो ये कि डसने के बाद ये आपको कारण भी बताते है और ज़िम्मेदारी  भी लेते है अपने ज़हर की।  ये अपना मौलिक कर्त्तव्य पूरा निभाते है।
 जब से ये हुआ है…मैं रोज़ सोचती थी क्या लिखू और क्यों? क्युकी लिखने से अपने मन का बोझ कम हो जायेगा। पर इससे क्या फायदा ? पर इसका जवाब सिडनी में हुई घटना के बाद लोगो का यही कहना और बोलना मुझे दे गया। वो सोशल मीडिया से अपने देशवासियों के साथ होने का एहसास दे रहे थे।  यही तो हम तब भी करते है जब हमारे पडोसी या रिश्तेदार के यहाँ कोई दुर्घटना घट जाती है। अपनों का साथ थोड़ी हिम्मत देता है और सहारा भी।
  पर इस सवाल का क्या? इसका क्या अंत है? जिन्होंने बनाया उन्हें कोसते रहना या जो हम कर रहे है।  हम कुछ कर रहे है तो हर बार बार बार ये सफल कैसे हो जाते है? क्या इनके अपनों का खून बहना जायज़ था ? और हमारे अपनों का? किस्से पूछे और क्या? सब रो रहे है। मारने वाला भी और मरने वाला भी। हम मर रहे है और मार रहा है हमे हमारा धर्म। जो ये धर्म का रॉंग कनेक्शन लग गया है उनसे, क्या ये राइट जगह नहीं लग सकता। इनका मैनेजर इनकी फिरकी ले रहा है.... ये इन्हे नहीं समझाया जा सकता ? किसी PK से कुछ काम बन सके या कोई बाबा ही सही जो राइट कनेक्शन लगवा सके। कुछ तो हो सकता होगा। राजनीति के बड़े बड़े महारथी कुछ तो करिये।  जो बन पड़ता है, करिये।


मेरे नखरे और मेरा प्यार 
प्यार में मेरे नखरे 
और उन नखरों में मेरा प्यार 
सच यार 
बहुत भारी पड़ गया 
आज तो हमें भूखे पेट ही सोना पड़ गया 

उनकी आदतें थी हमसे जुदा 
हम शब्दों के खेल के शौक़ीन 
वो चुप रह कर करते थे 
हमे अपना बनाने का हिसाब 
इस चुप्पी में आज हमें रोना पड़ गया 

'वो है मेरा मालिक' 
ये उसे गवारा नहीं 
मैं करू उसकी इज़्ज़त 
इससे कोई शिकायत नहीं 
कि उसके अंदाज़ मेरे हो जाये 
मेरी कमियां छुप के कही खो जाये 
वो भी करता है कई बार ऐसा 
हम कुछ ज़्यादा 
वो थोड़ा काम कर जाए 
इन नखरों से उन नज़रो से फिर बेइज़्ज़त होना पड़ गया 
क्युकी हर कोशिश में 
नखरा भारी पड़ गया। 

ये चाह थी 
कि हमारे दरमियाँ भी कुछ संभव हो पाये 
तो हम अपनी बुराई से खूब लड़े 
पर हम भी ठहरे हठी और दुष्ट दिल 
अपना बदलना न भाये हमे 
तभी तो ये नखरे आ जाते थे 
हमे रोकने 
और देखिये ना, 
ये कमबख्त नखरा भारी पड़ गया 
आज भूखे पेट ही सोना पड़ गया। 

आज समझा इस हुनर का फायदा 
जब तुम न हो मुझे झेलने वास्ते 
ऐसे भूखे ही कुछ लिख सोना 
बड़ा सस्ता पड़ गया 
पर सच, ये नखरा बड़ा भारी पड़  गया। 

हुज़ूर, इन नखरों को समझना पड़ेगा 
अभी ये भूत हमसे उतरा नहीं है 
दुबारा खाने के वक़्त नखरा न करेंगे 
तुम्हे कहीं और इस्तेमाल करने से डरेंगे 
यार, तुम भी थोड़ा समझो 
ये ज़िदगी भर का मामला है 
ऐसे भूखे न रखो 
ये नखरे हार मान जायेगे एक दिन 
हमे अपनी वही 'गम्मो ' ही समझो 
हमे अपनी वही 'गम्मो ' ही समझो। 






Thursday, 11 December 2014

हर दिन सुबह सुबह, खैर, मेरे लिए तो शाम या दिन का कोई भी वक़्त होता है, अख़बार के पेज पर काले और रंग बिरंगे छपे अक्षरो के जोड़ तोड़ से बने कुछ शब्द जो हमें एक परफेक्ट जगह दे जाते है जिससे और जहा से हम अपनी भावनाओ को, घटनाओ को दुसरो तक पंहुचा देते है. वैसे तो आज मैंने अखबार उठाया था सिर्फ पढ़ने के लिए, पर कब ये विचारो के घोड़े फिर से दौड़ने लगे और मैं एक पाठक के चरित्र से निकल कर दूसरे आवेश में आ गयी, ये बताना कठिन ही है मेरे लिए. अक्षर, कितना मैजिकल है ये इनके permutation और combination से हमे न जाने कितने शब्द और वाक्य मिल जाते है जिनसे हम दुनिया जहाँ की बकैती करने के अधिकारी हो जाते है. बस जरुरत होती है वाक् पटुता की।  शब्द जैसे संविधान,प्रशासन, राजनीति, नेता,, समाज, नियम, कानून, अनुशासन, धर्म, भक्ति, भाव, शांति, विश्वास, धोखा, आडम्बर, तर्क, वितर्क, मित्र, शत्रु, जन्म, मरण, निर्वाण, परिनिर्वाण, इच्छा आदि आदि।  इन शब्दों के प्रयोग से हम अपने भाव विश्वास को एक नाम देते है।  एक संस्था के तहत खुद को जोड़ते है और उसका प्रचार प्रसार करते है जीवन पर्यन्त। फिर कही और से किसी के द्वारा इन्ही शब्दों के नए खेले से प्रभावित हो कुछ नया ढूंढ लेते है खुद के लिए। पर क्या आप सोचते है अगर इनका मतलब इनके आज के मलतब से उल्टा होता तो. तो क्या शायद हम उन्हें वैसे ही समझते।  मसलन कानून का मतलब दाल होता और नेता का मतलब नमक. तो हम शायद बोतले, भैया कानून में नेता की मात्र ज़्यादा हो गयी है, इसका पूरा अस्तित्व ही खतरे में है, न खाने लायक न फेकने लायक। फेंके भी तो कैसे कानून और नेता दोनों ही गाढ़ी मेहनत की कमाई है। नेता का ऐसे बर्बाद होना अपने धर्म में अच्छा नही मानते। या फिर कुछ ऐसे कि लड़की को लड़का और लड़का को लड़की। तो माहौल में खबर होती कि आज लड़कियों की हरकतों की वजह से लड़को का जीना मुश्किल हो गया है. अभी हाल ही में एक लड़की कैब ड्राइवर ने MNC में काम करने वाले एक लड़के का RAPE कर दिया। अब तो ये हालत हो गयी है कि  ऐसी जगहे भी सेफ नहीं है. इन लड़कियों की वजह से लड़को का जीना दूभर हो गया है. आज जहाँ लड़के अपने पैर पर खड़े हो काबिल बन रहे है वही दूसरी ओर लड़कियों की इन हरकतों और हैवानियत की वजह से लड़के अपनी ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे है। भला इसमें लड़को की क्या गलती? कहाँ जाये ये बेचारे लड़के। इस समाज में लड़को को बराबरी का दर्ज मिलना ही चाहिए।
          शब्दों के अर्थ के इस अदला बदली के खेल में यह भी बात गौर तलब है कि हमारी भावनाओ को एक नाम देते है ये शब्द।  मुर्दा पड़ी किसी चीज़ को एक नाम दे उसमे उससे जुडी तमाम भावनाए जोड़ देते है, जो हमने अपने अनुभव से उस शब्द के लिए इजात की हुई है।  मसलन 'माँ ' .... ये भी आलू चाकू  डिब्बा कचरा गन्दा आना जाना ऐसे ही तमाम शब्दो जैसा ही है पर इससे जुडी भावनाये इसे एक स्पेशल दर्ज देती है।  जिससे ये एक भावनात्मक, ममता, बलिदान, प्यार, कोमलता और न जाने कितने ऐसे भाव वाले शब्दों का घर बन जाता है और बन जाता है एक ऐसा शब्द कि जब किसी को गंध बोलना हो तो उसकी माँ को गली दे दो। उसको जरूर तकलीफ पहुँचेगी. यहां दिल्ली में और ऐसे बड़े शहरो में अब इन गालियों को SLANG कहते है। चलो कम से कम इनसे होने वाले झगडे कम हो गए, नहीं तो आये दिन इन लड़कियों( बदला हुआ मतलब) में इसी बात पर मार पीट हो जाया करती थी।  अब तो यार दोस्त हर बात पर एक दूसरे की माँ बहन करते रहते है. 
     शब्द जैसे क्लाइमेट, ग्रीन क्लाइमेट फण्ड, कार्बन बजटिंग और कई नवजात शब्द अपनी नयी परिभाषा के साथ लोगों से मुख़ातिब होने और अपना मक़सद समझने के लिए बैठे है।  शब्दों के इस जाल में तो मैं सुखद आश्चर्य में पड़ गयी कि  बचपन से जिस नाम से मैंने एक चीज़ को पहचानना सीखा... अ से अनार ग से गमला वो एक खोज मात्र है जिसमे संशोधन तो नही पर हाँ इस परिवार में नए मेंबर ज़रूर जुड़ते रहे है और शायद कुछ छूटते भी रहे हो. 

Saturday, 29 November 2014

कि मेरे अंदर ईगो बहुत है, मुझे गुस्सा बहुत आता है, मुझे नहीं पसंद कि कोई मुझे मना करे किसी बात पर, बेशक बेतुकी बात पर ना ही मिलनी चाहिए. अपनी सफाई में कह दूँ कि मैं बेतुकी ज़िद कम ही करती हूँ। अपनी कमियों पर डर जाती हूँ अब।  और ये डर बड़ा अजीब लगता है  क्युकी ये डर किसी के दूर चले जाने का है कि वो मेरी आदतों से परेशान हो मुझसे दूर चला जायेगा।  अजीब है न ये डर। मैं इन दिनों अक्सर लोगो में ये डर  देखती हूँ। और तब तसल्ली होती है कि कुछ रिश्ते है जो आपके साथ हमेशा रहेंगे भले ही पास न हो। वो रिश्ता है माता पिता का।  वो कहीं नहीं जायेंगे हमे आपको छोड़कर। मैं आप हम सभी कभी न कभी अपने बनाये रिश्तो को खो देने का डर  लिए सहमे होते है।  आज किसी ऐसे ही डर को सामने देखा तो माँ याद आ गयी। कि कभी ये डर उनके साथ नहीं लगा, उनके लिए नहीं लगा।  और यही सोचते सोचते चेहरे पर एक तसल्ली के साथ हसी दौड़ पड़ी और मैं बीते दिनों में खो गयी।

 मेरा बचपन, जो मुझे ज़्यादा याद नहीं पर जो कुछ याद है वो बेहद शांत था. आज कुछ कहते है नीरस था. न शैतानी और न ही कुछ तोड़ फोड़।  एक शांत दिमाग जो सारी बातें मान जाता था जो कुछ उसे कही जाती थी।  दादा जी के साथ उनकी बातें सुन मैं बड़ी हुई।  पापा अब उन्हें पिता जी कह कर सम्बोधित करने का दिल करता है।  मेरी ज़िंदगी के पहले मेल पर्सन।  जो मुझे बेहद पसंद है और बहुत अच्छे लगते है।अच्छा लगना और बेहद पसंद होना दोनों अलग भाव है। उनकी बातें, उनका ज़िन्दगी को देखने, समझने का तरीका मुझे पसंद है।  मैं उनके साथ रहना चाहती हूँ।  मजबूरी सिर्फ मेरे गाँव में सोर्सेज की कमी ही नहीं है बल्कि एक हद तक मेरा और मेरे पिता जी के विचार में मतभेद भी है।  मैं आज खुद को एक इंसान मानती हूँ एक स्त्री होने के पहले।  पर वो आज भी मुझे एक लड़की, जिसकी जिम्मेदारियां है उन पर और जिनको वो भली भाति पूरा करना चाहते है।  वो गलत भी नहीं है।  यह हमारे समाज की ही बताई रीति है जिन्हे वो फॉलो कर के एक अच्छा पिता बनना चाहते है।  कि मेरे लालन पालन पर कोई सवाल न उठा सके। और इसी वजह से वो मुझे खुद से दूर भेजे है।  ये लिखते लिखते भी मेरे मन में डर आ रहा है कि ये कोई मेरे परिवार का पढ़ न ले , वरना वो यही सोचेगा और कहेगा कि फला की बेटी पता नही क्या ही कर रही है शहर में।  खैर, जो मुझे ज़्यादा परेशान नहीं करती उन बातों से दूरी बनाते हुए उन बातों पर आते है, जिसके बारे में मैं कह रही थी. क्या मेरा बचपन, ना वो तो कुछ  ख़ास याद ही नहीं है और जो याद है वो मेरे भाई बहनो के बारे में है। मैं बात कर थी डर के बारे में किसी अपने का हमे छोड़ जाने का डर।  मैंने कारण बताया मेरी कमियां। क्या ये डर लाज़मी है।  ये तसल्ली वाली बात है कि माँ बाप हमे छोड़ कर नहीं जायेंगे पर वो इंसान जो आपके साथ रहता हैं आपकी खूबियों से रूबरू हो आपको हर दिन मिलने वाले चेहरे में से एक अच्छा इंसान समझ आपके साथ चलने का निर्णय लेता है. तो वो कुछ बेहतर ही चाहेगा अपने लिए।  ईगो गुस्सा या कोई ऐसी आदत जो आपके अंदर हो आपके नेचर का हिस्सा हो पर बुरी हो उसे खत्म करना या कुरंबान करना कोई गलत कदम तो नहीं।  इसके लिए हमारे माता पिता भी कोशिश करते हैं। उस इंसान के लिए इन कमियों को हटाना एक बेहतर उपाय है जिसमे हमारा आपका ही फायदा है. आपकी तबियत भी खुश और सीरत भी।  और अपने लोग अपने पास।  गलत वो है जब हम अपनी कमियां नहीं अपनी कुछ तरीकों को कुर्बान करते है इन रिश्तों के नाम, वो भी इस तर्ज पर कि  वो किसी को मंज़ूर नहीं पसंद नहीं।

 मैं तो प्रवचन सा देने लगी। वैसे भी आज कल बाबा लोगो के दिन अच्छे नहीं चल रहे अपने देश में। हाल की खबर से तो यही लगता है।  खैर, जब मैंने ये पेज लिखना शुरू किया था तो डर था मन में पर आखिरी पड़ाव तक डर जा चुका है। अब सुधार ज़्यादा भा रहा है।  हाँ, थोड़ा मुश्किल है पर सौदेबाजियां होने लगती है तो उस अपने को अपने साथ और पास रखने के लिए कुछ मोहलते खुद को दे देनी चाहिए इससे पहले की किसी बहस में उससे मांगनी पड़े।  जैसी मैं अपने माँ पापा से आये दिन मांगती रहती हूँ  अपनी ज़िन्दगी थोड़ी उनके हिसाब से और ज़्यादा मेरे हिसाब से चलते रहने के लिए।  क्युकी जीना आखिर मुझे ही है तो वही रहे मेरे आस पास जो मुझे और जिन्हे मैं भाती  हूँ।



Monday, 20 October 2014

रूबरू : अपने दिल से (पार्ट २)

तुम्हारे बिना किसी और के साथ टाइम पास नहीं होता . वो तो बस टाइम पास ही होता है. तुम्हारे बिना मैं अकेली ज़्यादा ज़िन्दगी में होती हुँ. बिना तुम्हारे किसी और के साथ ये बिना ख़ुशी के मुस्कराहट सी जीनी पड़ती है. तुम्हारे बिना जब मैं चलती हूँ तो तुम्हारे सिखाये सीख साथ होते है. बिना तुम्हारे कोई और एक मजबूर हाथ लगता है.  तुम्हारे बिना मैं खुल के हसती भी हूँ रोती भी। बिना तुम्हारे कोई और झूठी ज़िन्दगी की तख्ती सा लगता है।  तुम्हारे बिना मैं डरना छोड़ लड़ने की हिम्मत से चलती हूँ। बिना तुम्हारे कोई और मुझे कमजोर और बीमार समझता है। मैं एक लड़की हूँ इसका फक्र है मुझे। तेरी गैर मौजूदगी में कोई और लाख पहल करे बराबरी की... पर तेरे साथ ज़िन्दगी न बिता पाना मेरी नकारी का सबूत दिखता है।  मेरे लड़की होने को मलिन करता है।
 हैं न जाने कितने ही ऐसे ख्याल जो तेरी अहमियत बताते है..... और तेरे होने की। और ना होने की खला भी बताई है मैंने। ये तो उन एहसासों से जुडी कुछ बूंदे है. मेरी दरख्वास्त है अब मुझे बिन तुम्हारे जीने का संदेसा दे दो पर कोई और रहे बिना तुम्हारे, ये फैसला ना तुम करना और ना ही ये हौसला बंधने देना। तुम बिन ये दुनिया मेरी है. मैं अपनी दुनिया में किसी का आना और रहना, इसका दस्तूर ही खत्म करती हूँ.
  अब मैं बस अपनी ज़िन्दगी तुम्हारे नाम बसर करती हूँ।  पता है ज़िन्दगी भर दोनों को आप कर के पुकारा, आज तुम और तेरे सम्बोधन से मैं खुद को और सूफी दुनिया में महफूज़  करती हूँ।

गरिमा मिश्रा


Wednesday, 1 October 2014

Kismat se...


आँखें बंद कीजिये.... और सुनिए

A. R. Rahman, Kapil Sibal, Lata Mangeshkar – Laadli

enjoy kijiye kisi bhi haisiyat se....
chahe ek feminist... ya ek insaan... baap.. maa...bhai....ya ek ladka jo aate jate ladkiyon ko chedne me khud ko mard samajhta hai.... ek sensitive insaan ki haisiyat se.... ya fir ek music lover ki haaisiyat se,,,ya fir Lata ji k chahne wale ki haisiyat se.. ya A.R. Rahmaan k diwaane ki hisiyat se..ya isk sath sath Kapil sibal ki is nayi peshkas jo unki rajnitik vicharo ki tarah aapko baateingi nahi....

aap ko pasang zarur aayega...chahe fr iska video hi ho...pr ummeed hai usse kuch upar uth k in sab par dhyaan de...zarurat hai iski..sach me



Saturday, 27 September 2014

क्या सौदेबाज़ी है !!


ये करो तो वो मिलेगा… अरे, हम तुम्हारे लिए ये सब कर रहे हैं और तुम इतना नहीं कर सकते !… हमने तुम्हे सब कुछ करने की आज़ादी दी, तुम ये भी नहीं सुनोगे?… तुम्हे इतना पढ़ाया लिखाया इसी दिन के लिए? कि तुम हमे जवाब दो… वो भी इस तरह ? तुम्हे कभी बेटी नहीं समझा… एक लड़के की तरह पाला पोषा हमने… और अब तुम कहती हो कि हमारी मर्ज़ी से शादी नहीं करोगी!!… गलती की तुम्हे पढ़ा कर , सर पे चढ़ाकर। …… 
अरे शुक्ला साहब के  बच्चो को देखो , कोई व्यवस्था नहीं, फिर भी उनके बच्चे आज कहाँ कहाँ है… तुम लोगो को क्या कमी की, सारी सुविधाएँ दी..कोचिंग, फीस, गाडी, मोबाइल, लैपटॉप सब कुछ। कहाँ कमी की?…पर तुम गधे के गधे ही रह गए'… 

ऐसी बहुत सी बातें हम सबने सुनी हैं अपने घर में।  अपनी अपनी उम्र और तजुर्बे के हिसाब से किसी ने सुनी होगी तो किसी ने सुनाई होगी। 

मैं उसके साथ अच्छे से BAHAVE करती/करता हूँ, पर वो क्यों नहीं करती/करता ? मैंने उससे प्यार किया, वो क्यों नहीं करता/करती? सर झुका के रहो, मैं हमेशा सरल रहूँगा/रहूंगी। …तुम मुझसे अच्छे से बात करोगे तो मैं भी अच्छे से बात करूँगा/करूंगी। तू अच्छा तो मैं भी अच्छा। … ऐसी भी कई बड़बोलियाँ लोग सुनाते रहते हैं. ज़रा कोई उनसे पूछे यही बात सामने वाला आपसे कहे तो? अरे भाई वही पहले क्यों झुके, वही पहले अच्छा क्यों रहे? तुम्हे ये पहले याद आया तो तुम रहो पहले। पर ना जी, ऐसा तो कही होता ही नहीं।  हर जगह सौदेबाजी। मैं करवाचौथ का व्रत रहूंगी तो मुझे क्या मिलेगा? मैं तुमसे प्यार करूँ तो मुझे क्या मिलेगा? 

कुछ की सौदेबाजी चलती है की हम तुम्हे पढ़ने देंगे, पर तुम शादी अपनी मर्ज़ी से नहीं कर सकती। हम तुम्हे बाहर भेजेंगे अपने शहर से, पर तुम अपनी हमारी संस्कृति नहीं भूलोगी। कुछ गलत* नही करोगी। वगैरह वगैरह। 

कही पैसों की सौदेबाजी तो कही भावनाओं की। पैसे तो चलिए सौदे के लिए ही बने हैं पर भावनाओं का क्या?  हम हर दिन इन्हे खरीदते और बेचते रहते है।  कितनी दफे वो मरते और जीते हैं।  कितनी बार वो आंसुओं संग बह कही सूख जाते हैं और कई मर्तबा वो जुबां पे कड़वाहट बन सौदों को खराब कर देते हैं।  हम अपने फायदे नुक्सान के मुताबिक इन सौदेबाजी का हिस्सा बनते हैं।  इन सौदों को कभी प्यार का नाम दे हम चुप करा दिए जाते हैं तो कभी ज़िम्मेदारी तो कभी हमारा कर्त्तव्य।  कभी रो के सौदा कर लेते हैं अपनी ज़िन्दगी का कि यही PRACTICALITY हैऔर कभी हस के कि किसी को मेरी हसी पसंद है शायद।  

वो कहते सर झुका के चल 
शर्म दिखती है झुकी पलकों में 
पर हम क्या करे 
जो हमे दिन में भी तारे ढूढ़ने का शौक चढ़ा 

वो कहते थोड़ा थम के कदम रख 
मर्यादा झलकती है सादगी में 
पर हम क्या करे 
जो हमें मर्दानी बनने का शौक चढ़ा 

वो कहते मन्दम् मुस्कराहट ही सही 
शालीनता झलकती है उसमे तेरी  
पर हम क्या करे 
जो हमें खुल कर हसने का शौक चढ़ा 

वो कहते तो बहुत कुछ 
हमें सँभालने का बोझ जो उन पर है 
पर हम क्या करे 
जो हमें सौदेबाजी का शौक न रहा 

आज ये लिखते लिखते मैं भी अपनी ज़िन्दगी में हुए कुछ सौदों को सोच, उन्हें अच्छा या बुरा में तौलने लगी।  खैर, अब विदा लेना चाहूंगी।  आज कुछ सौदे मैंने भी किये है उम्मीद है इन सौदों को मैं उनके उद्देश्य की आड़ में इंसाफ दे पाऊँ।  

PS-  बस कभी खुद के दिल से सौदा मत कीजियेगा और न ही उन दिलों से जिन्हे आप अच्छे लगते है। 
 और तो सौदेबाजियां चलती रहनी चाहिए। तभी तो बाजार गर्म रहेगा ,शोर मचता रहेगा।  

शुक्रिया !!
खुश रहिये ! मुस्कुराते रहिये !!




Monday, 22 September 2014

Sajjad Ali, Tum Naraaz Ho

कपड़ा मेरी पहचान कहता है
मैं कौन हूँ ये कहानी बयान करता है
सर ढक चल जाये जो एक औरत काला रंग क़ौम की पहचान कहता है
दूजी ओर रंगबिरंगी चूनर उनके मजहब की बात कहता है
दाढ़ी राखी है दोनों ने.… तरीका-ए-ख़ास उनका कबीला खुल-ऐ-आम करता है
चाँद दोनों ने देखा … मक़सद  अलग बस है
करवाचौथ हो या ईद की रात
ये अपने अपने मक़सद से चाँद को बाट रखता है
सजदा सब करे उसका,
दीवारें बनती एक ही औजार से है,
मन की मुरदे भी कुछ ख़ास अलग नहीं,
नक़्शा बनावट का दीवारों का मज़हब सरे आम  करता है
ये कपडे, बनावट, लिखावट मेरी पहचान कहता है
जो हूँ मैं वो छुपा, मुझे नए रंगो में गढ़ता है
मुझे इन्सान न हो के, किसी जात धरम का बंदा वो कहता है

आज शहरों में हटते भेद भाव से डर
धरम का सिपाही 'लव जेहाद' कहता है
लड़की हो बस, किसी भी धर्म की हो
उसकी इज़्ज़त लूट ये 'शिखंडी'
खुद को धर्म का ठेकेदार कहता है.
इनसे तो अच्छा है कि  ये कपडा मेरी पहचान कहता है.



Saturday, 13 September 2014

PANDIT JI...


wo kubri lekar chalte the
sb unko pandit ji khte the
dubla patla haand maas
pata nahi kyu sb unse  darte the
koi na bach paya unse
hr din daant lagate the
itni baaton k baad bhi
sb pandit ji k paas hi aate the
jeevan bhr kya kamaye the
ye kheto me dikhta tha
ghr to chota tha unka
kamai khushi aangan me hasta tha
bade chote master brijesh unse chote mahesh sarvesh
inse ghr aksar ghbrata tha
badi bahin bacchi teen hatheli pe ghr chalta tha
apni patni ko bana bahuo ki saas
pandit ji ka ghr kuch yun hi chalta rhta tha
khet kachahri zindagi beeti
akhir waqt padhne me katata tha
wo buddhjivi...gyan batate...
waqt unse sambhal k chalta tha
apne jeevan me aam purush
hum sb k dada ji..
waqt ki tabiyat bi samjhe the
hr maas 10 tarikh se drte the
wo din aya..tha wo somwar
pariwa pitrapaksh ka tha
december ki thanthi me suraj bi shaant shithil sa tha
thanthe pad gye.. akele hi
khna unka sach ho gya
usi 10 tarikh ko...bin baccho k akele unka jana ho gya
hum sab ke bachapan ki kahani ka raja kho gaya
'desi' subak subak k royi thi
aapke dur jane ko asweekar kiye
bina samjh hi soyi thi
dada ji ab jb chale gaye
kaun hume samjhayega
duniya ki in riti riwajo se kaun hume milwayega
unki baaton ko yaad kr
kitne nirdaya hum lete hai
sach dada ji...tabhi safal hum hote hai
in akhir panktiyo me...koi jod tod na ban payega
itna hi khna hai 'gammu' ko
aap humesha hote hai...
dada ji...aapko yaad kr hum ab bhi roya karte hai
ab bhi roya krte hai

Monday, 25 August 2014

रूबरू : अपने दिल से (पार्ट १)

गर मैंने माना तुझे अपना 
दोनों के लिए क्या ये मुश्किल है
रहना जैसे हम दोनों हैं
मेरी कमियों से न तू नाराज़ 
तेरी कमियों को कर मैं नज़रअंदाज़
क्या नहीं कर सकते एक दूजे से प्यार

अगर नहीं ....
तो मैं क्यों हूँ
तुम क्यूँ हो मेरे अभिमान
मेरी कमियों पे गिरा देते हो गंदे शब्दों का भण्डार
दब जाती हैं उसमे मेरी सारी अच्छाई
हो जाती खुद ही प्रश्न चिन्ह
बन कर हम दो की नज़रें
तब तुम भी नहीं  होते संग मेरे
क्यों की तुम चिढ़  जाते मेरे ढंग से

कितनी दफे मैं समझना चाहूँ
न समझ सकी
आज यही सोच फिर सोयी हूँ
की तुम मेरे
मैं तेरी
आगे न कुछ जानू  मैं
बस तुझको अपना मानू मैं
बस तू भी ऐसे सोता हो
ये सोच रोज मैं सोती हूँ
हर दिन तेरे चिढ़ने से.… सच, मैं डर के सोयी हूँ

किसी रोज तू अनबन को जामा पहना दे अलग होने का
मेरा ढंग बने कारण  वो
मैं और तू भाजक न बन जाये
मैं सच में डर  जाती हूँ
तुझसे और लिपट सो जाती हूँ
तुझसे और लिपट सो जाती हूँ।

मैं सच में तुझे समझती हूँ
हर दिन यही सोच के जीती हूँ।
मैं आधी तुझसे खुद को पूरा करती हूँ
मैं ऐसे ही कुछ जीती हूँ
इसीलिए तो कहती हूँ
कि वो तू ही है
जो मुझसे प्यार करता है
और  मैं तुमसे प्यार करती हूँ।




Saturday, 23 August 2014

One is not born, but rather becomes, a woman.
- Simon de Beauvoir

माँ की क्षमता  मत आंको
बापू की दुविधा तुम समझो
हो लड़की तुम, कोई सहारा नहीं
बेटो सी बराबरी मत मांगो
क्या करना पढ़ लिखकर गुड़िया
जाना एक दिन दूजे गाँव तुझे
क्या करना जान समझ के ये दुनिया
चलना है दबे पाँव तुझे

कौन सा राकेट बनाएगी
ताउम्र रोटी ही तो तू बनाएगी
तो करने दे बेटों को आगे
जीवन भर तू उनको ही तो सजाएगी
देख माँ को अपनी
बापू की छाया दुनिया उसकी
तू भी ऐसा ज्ञान सीख
रोशन करने का काम सीख

रोती वो बेटी आज सुबक
ले बापू भाई की थमी ठंडी अकड़न
माँ की गर्म आहों को
पिछली सूखे की आंधी में
हमे आंसू के समंदर में डुबो गए
धीरता नहीं बचा पायी
ये दुनिया की बातें नहीं हँसा पायी
जिसे सुन मैं बड़ी हुई
जिसे जान मैं लड़की बनी
इस उधारी की ज़िन्दगी में…
वो बतियाँ नहीं समझ आई.

अब सब बेमानी लगता है
ये थक कर खुद को सुला गए
मुझ माँ बेटी को
फिर से झुलसा गए
पढ़ने मुझको भी दे देते 
आज माँ संग रो के सोती नहीं 
बापू जैसी उठती सुबह में 
काम खरच को ले आती  
बना दिया अपाहिज अब 
सब कुछ हो कर बेकार हुई 
रोटी जुगाड़ हो जाता है 
इन्सानी ज़िन्दगी दूजो के नाम हुई 
पढ़ने दो हमको 
जानने दो.... दुनिया की समझ पहचाने दो 
किसे क्या पता 
तुम कब गिर जाओ 
ऐ स्वार्थी मानुस .... अपने लिए ही सही 
हमे भी जीने दो 

हमे अपनी ज़िन्दगी जीने दो।

Your daughter does not have to bound by fate 
she needs to be allowed the power to create her own fate - Urmi Basu

  photo courtesy: google

इसे पढ़ कर मेरे बहुत से मित्र इस बात से इत्तफाक नहीं रखेंगे।  उनका मानना है की अब लड़कियों की स्थिति में काफी हद तक सुधर आ गया है. आपकी इस पॉजिटिव सोच और तथ्यों का मैं स्वागत करती हूँ और ख़ुशी प्रकट करती हूँ।  ये बात भी avoid नहीं की जा सकती की ये तबका अभी भी कुछ नंबर में सिमटा हुआ है.                                                                                                                                           

हमें इस सवाल को ही ख़त्म कर देना है कि.... लड़की अपने हक़ के लिए लड़े।  ये उसका है और उसे मिल रहा है. 



Friday, 27 June 2014

माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!


  

Friday, 17 January 2014

Kehna Chahti Hu...: गूंगे के बोल

Kehna Chahti Hu...: गूंगे के बोल: क्यों उसकी अस्मत लुटने से ही, तेरा गुस्सा जलने लगता है।  गूंगे की फ़ड़फ़ड़ाहट से क्यू, तुझे एहसास होने लगता है. कही वो भूले चेहरे उसे य...

Tuesday, 14 January 2014

आप बस इर्शाद इर्शाद फरमा 
हमे ज़िंदा रखे,
वाह वाह से ताकत थोड़ी नसीब होती रहे,
इस बेज़ुबां का वादा रहा,
नज़्म की वादा ख़िलाफ़ी 
औ अल्फ़ाज़ों का मुकरना जैसा 
दुबारा न होगा। 

वो दरख़्त ओ दीवार भुला दे आप
जिसपे बयान थी कहानी                   
मेरी बेवफ़ाई की 
मैं बिना साजो सामान रह गया 
बोले थे अल्फ़ाज़ कुछ सच्चे कड़वे 
पर उसे वादा ख़िलाफ़ी लगी
हम हो गए बेज़ुबान। 

पर याद है हमे, आपका इन्तज़ार 
बस थोड़ी ताकत की गुज़ारिश है  
इर्शाद सुनते तो नम पड़ा शायर 
नज़्म पढ़ जाये 
तो हम तो बस जुबां से महरूम है। 

गूंगे के बोल

क्यों उसकी अस्मत लुटने से ही,
तेरा गुस्सा जलने लगता है। 
गूंगे की फ़ड़फ़ड़ाहट से क्यू,
तुझे एहसास होने लगता है.
कही वो भूले चेहरे उसे याद ना आ गए हो,
कि हाँ, आज तो ये गूंगा भी बोल सकता है। 

नाजुक सी कलाई मोड़ी न जाये 
चूड़ी की खनक सच्चाई बताये,
बना दी उसे ही जकड़न 
ये टूटी तो, टुकड़ा चीर सकता है। 
सजा के रखा, सुन्दर बना के रखा,
कि लाल रंग खून का भी तो हो सकता है। 

समय ने निकाला उसे बाहर 
थपेड़ो ने सम्भाला उसे बाहर 
झूमती मस्ती जो तुम्हे लगी 
वो मस्ताना थकावट का सबब भी तो हो सकता है। 

नक़ाब बदलता गया, वो लाल से सतरंगी होता गया 
निखरता गया, महकता गया ,
सराहा भी, सहारा भी,
फिर भी आज उसकी कहानी दुपट्टा बोल सकता है। 

मंदिर- मस्जिद सुकूं से है , अल्लाह-राम इत्मीनान से,
काफ़िर अपनी डगर बदनाम है 
ये ढेकेदार की दुकान न चली तो,
लाशो का ढेर लग सकता है.
उसके पीछे की दास्तां, 
लहू के रंग का किस्म,
मुर्दा है या ज़िंदा है,
वो मलबा बोल सकता है। 

फिर लुटी जब उसकी अस्मत,
इत्मीनानन, ये पर्दा बोल सकता है।