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Saturday, 27 September 2014

क्या सौदेबाज़ी है !!


ये करो तो वो मिलेगा… अरे, हम तुम्हारे लिए ये सब कर रहे हैं और तुम इतना नहीं कर सकते !… हमने तुम्हे सब कुछ करने की आज़ादी दी, तुम ये भी नहीं सुनोगे?… तुम्हे इतना पढ़ाया लिखाया इसी दिन के लिए? कि तुम हमे जवाब दो… वो भी इस तरह ? तुम्हे कभी बेटी नहीं समझा… एक लड़के की तरह पाला पोषा हमने… और अब तुम कहती हो कि हमारी मर्ज़ी से शादी नहीं करोगी!!… गलती की तुम्हे पढ़ा कर , सर पे चढ़ाकर। …… 
अरे शुक्ला साहब के  बच्चो को देखो , कोई व्यवस्था नहीं, फिर भी उनके बच्चे आज कहाँ कहाँ है… तुम लोगो को क्या कमी की, सारी सुविधाएँ दी..कोचिंग, फीस, गाडी, मोबाइल, लैपटॉप सब कुछ। कहाँ कमी की?…पर तुम गधे के गधे ही रह गए'… 

ऐसी बहुत सी बातें हम सबने सुनी हैं अपने घर में।  अपनी अपनी उम्र और तजुर्बे के हिसाब से किसी ने सुनी होगी तो किसी ने सुनाई होगी। 

मैं उसके साथ अच्छे से BAHAVE करती/करता हूँ, पर वो क्यों नहीं करती/करता ? मैंने उससे प्यार किया, वो क्यों नहीं करता/करती? सर झुका के रहो, मैं हमेशा सरल रहूँगा/रहूंगी। …तुम मुझसे अच्छे से बात करोगे तो मैं भी अच्छे से बात करूँगा/करूंगी। तू अच्छा तो मैं भी अच्छा। … ऐसी भी कई बड़बोलियाँ लोग सुनाते रहते हैं. ज़रा कोई उनसे पूछे यही बात सामने वाला आपसे कहे तो? अरे भाई वही पहले क्यों झुके, वही पहले अच्छा क्यों रहे? तुम्हे ये पहले याद आया तो तुम रहो पहले। पर ना जी, ऐसा तो कही होता ही नहीं।  हर जगह सौदेबाजी। मैं करवाचौथ का व्रत रहूंगी तो मुझे क्या मिलेगा? मैं तुमसे प्यार करूँ तो मुझे क्या मिलेगा? 

कुछ की सौदेबाजी चलती है की हम तुम्हे पढ़ने देंगे, पर तुम शादी अपनी मर्ज़ी से नहीं कर सकती। हम तुम्हे बाहर भेजेंगे अपने शहर से, पर तुम अपनी हमारी संस्कृति नहीं भूलोगी। कुछ गलत* नही करोगी। वगैरह वगैरह। 

कही पैसों की सौदेबाजी तो कही भावनाओं की। पैसे तो चलिए सौदे के लिए ही बने हैं पर भावनाओं का क्या?  हम हर दिन इन्हे खरीदते और बेचते रहते है।  कितनी दफे वो मरते और जीते हैं।  कितनी बार वो आंसुओं संग बह कही सूख जाते हैं और कई मर्तबा वो जुबां पे कड़वाहट बन सौदों को खराब कर देते हैं।  हम अपने फायदे नुक्सान के मुताबिक इन सौदेबाजी का हिस्सा बनते हैं।  इन सौदों को कभी प्यार का नाम दे हम चुप करा दिए जाते हैं तो कभी ज़िम्मेदारी तो कभी हमारा कर्त्तव्य।  कभी रो के सौदा कर लेते हैं अपनी ज़िन्दगी का कि यही PRACTICALITY हैऔर कभी हस के कि किसी को मेरी हसी पसंद है शायद।  

वो कहते सर झुका के चल 
शर्म दिखती है झुकी पलकों में 
पर हम क्या करे 
जो हमे दिन में भी तारे ढूढ़ने का शौक चढ़ा 

वो कहते थोड़ा थम के कदम रख 
मर्यादा झलकती है सादगी में 
पर हम क्या करे 
जो हमें मर्दानी बनने का शौक चढ़ा 

वो कहते मन्दम् मुस्कराहट ही सही 
शालीनता झलकती है उसमे तेरी  
पर हम क्या करे 
जो हमें खुल कर हसने का शौक चढ़ा 

वो कहते तो बहुत कुछ 
हमें सँभालने का बोझ जो उन पर है 
पर हम क्या करे 
जो हमें सौदेबाजी का शौक न रहा 

आज ये लिखते लिखते मैं भी अपनी ज़िन्दगी में हुए कुछ सौदों को सोच, उन्हें अच्छा या बुरा में तौलने लगी।  खैर, अब विदा लेना चाहूंगी।  आज कुछ सौदे मैंने भी किये है उम्मीद है इन सौदों को मैं उनके उद्देश्य की आड़ में इंसाफ दे पाऊँ।  

PS-  बस कभी खुद के दिल से सौदा मत कीजियेगा और न ही उन दिलों से जिन्हे आप अच्छे लगते है। 
 और तो सौदेबाजियां चलती रहनी चाहिए। तभी तो बाजार गर्म रहेगा ,शोर मचता रहेगा।  

शुक्रिया !!
खुश रहिये ! मुस्कुराते रहिये !!




Monday, 22 September 2014

Sajjad Ali, Tum Naraaz Ho

कपड़ा मेरी पहचान कहता है
मैं कौन हूँ ये कहानी बयान करता है
सर ढक चल जाये जो एक औरत काला रंग क़ौम की पहचान कहता है
दूजी ओर रंगबिरंगी चूनर उनके मजहब की बात कहता है
दाढ़ी राखी है दोनों ने.… तरीका-ए-ख़ास उनका कबीला खुल-ऐ-आम करता है
चाँद दोनों ने देखा … मक़सद  अलग बस है
करवाचौथ हो या ईद की रात
ये अपने अपने मक़सद से चाँद को बाट रखता है
सजदा सब करे उसका,
दीवारें बनती एक ही औजार से है,
मन की मुरदे भी कुछ ख़ास अलग नहीं,
नक़्शा बनावट का दीवारों का मज़हब सरे आम  करता है
ये कपडे, बनावट, लिखावट मेरी पहचान कहता है
जो हूँ मैं वो छुपा, मुझे नए रंगो में गढ़ता है
मुझे इन्सान न हो के, किसी जात धरम का बंदा वो कहता है

आज शहरों में हटते भेद भाव से डर
धरम का सिपाही 'लव जेहाद' कहता है
लड़की हो बस, किसी भी धर्म की हो
उसकी इज़्ज़त लूट ये 'शिखंडी'
खुद को धर्म का ठेकेदार कहता है.
इनसे तो अच्छा है कि  ये कपडा मेरी पहचान कहता है.



Saturday, 13 September 2014

PANDIT JI...


wo kubri lekar chalte the
sb unko pandit ji khte the
dubla patla haand maas
pata nahi kyu sb unse  darte the
koi na bach paya unse
hr din daant lagate the
itni baaton k baad bhi
sb pandit ji k paas hi aate the
jeevan bhr kya kamaye the
ye kheto me dikhta tha
ghr to chota tha unka
kamai khushi aangan me hasta tha
bade chote master brijesh unse chote mahesh sarvesh
inse ghr aksar ghbrata tha
badi bahin bacchi teen hatheli pe ghr chalta tha
apni patni ko bana bahuo ki saas
pandit ji ka ghr kuch yun hi chalta rhta tha
khet kachahri zindagi beeti
akhir waqt padhne me katata tha
wo buddhjivi...gyan batate...
waqt unse sambhal k chalta tha
apne jeevan me aam purush
hum sb k dada ji..
waqt ki tabiyat bi samjhe the
hr maas 10 tarikh se drte the
wo din aya..tha wo somwar
pariwa pitrapaksh ka tha
december ki thanthi me suraj bi shaant shithil sa tha
thanthe pad gye.. akele hi
khna unka sach ho gya
usi 10 tarikh ko...bin baccho k akele unka jana ho gya
hum sab ke bachapan ki kahani ka raja kho gaya
'desi' subak subak k royi thi
aapke dur jane ko asweekar kiye
bina samjh hi soyi thi
dada ji ab jb chale gaye
kaun hume samjhayega
duniya ki in riti riwajo se kaun hume milwayega
unki baaton ko yaad kr
kitne nirdaya hum lete hai
sach dada ji...tabhi safal hum hote hai
in akhir panktiyo me...koi jod tod na ban payega
itna hi khna hai 'gammu' ko
aap humesha hote hai...
dada ji...aapko yaad kr hum ab bhi roya karte hai
ab bhi roya krte hai