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Monday, 22 December 2014

पेशावर



एक बाढ़ सी आ गयी। कही आंसुओं की तो कही नफरत की.… कही मौत की… तो कही खून की … कही धर्म पे सवाल की तो कही धर्म के नुमाइंदों के नियत पे सवाल। बाढ़ आ गयी थी उस रोज़ जब खबर आई पडोसी देस से की कई नन्हे बिलख रहे है आस पास मौत को नाचता देख। रोना तो जैसे कम पड़ रहा था।  गुस्सा नामर्दी का सुबूत।  फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग, न्यूज़ चैनल्स, मीडिया कोई भी हर जगह रो रही थी आवाज़े।  क्या उन तक नहीं जाती ये चीख? ये हम सोचते उससे पहले जवाब हाज़िर था.... जाती है उन तक ये चीख।  है उनमे दिल।  खौलता है उनका खून अपनों का दर्द देख।  रोते है वो भी।  बिलखते  है जब उनका अपना कोई छूट जाता है उनसे।  इसिलए तो संदेसा भेजा की ये बदला है हमारे खून का। वो अपने खून का बदला किसी के अपनों के खून से कर गए।  तकलीफ हुई की ये वो धर्म के नाम पे करते है।  बहुत बुराई हुई।  हर तरफ कौतुहल सन्नाटा और उस सन्नाटे में एक गाला फाड़ के चिल्लाती हवा जो कह रही थी क्या मैं सांस ले सकती हूँ?  कि कही कभी रोते  रोते माँ अपने बच्चे का हाथ पकड़ उसे गले से लगा ये तसल्ली करती की उसकी औलाद ज़िंदा बच गयी आज। फिर डर जाती क्या कल बच पायेगी?

तो कही ठन्डे पड़े हाथो को पकडे खुद यकीं दिलाता वालिद कि शायद सुबह की तरह ये फिर थिरक उठे एक बार।  क्यों आखिर क्यों हम ऐसी भावनाओ को याद कर के रोते रहे। क्या करें, जो बच गए है और जो अपने छूट गए.…उनके लिए हम भी बन्दूक उठाये? कैसे तसल्ली दे खुद को कि अपनी औलादो को इंसाफ दिला सकेगे, जो बेक़सूर थे।  जिन्हे तो शायद ये भी न पता हो ये खूनी नाच हुआ क्यों था? मलाला, ये एक ही नाम जानती हूँ मैं, और उसके जैसे न जाने कितने बच्चो ने अपनी मासूमियत खो इसके खिलाफ अहिंसा शांति का रास्ता चुना। हिम्मत दिखाई और बढ़ाई भी। पर क्या करे? किसे दोष दे? एक तरफ बड़े लोगो की इजात की हुई नोबेल प्राइज, उसका सन्देश और दूसरी तरफ कुछ और बड़े लोगो की उपज..य़े संगठन, जो आज खुद में ही ब्रांड बने है। जो अपना फन निकाले डसने को तैयार है…मज़े की बात तो ये कि डसने के बाद ये आपको कारण भी बताते है और ज़िम्मेदारी  भी लेते है अपने ज़हर की।  ये अपना मौलिक कर्त्तव्य पूरा निभाते है।
 जब से ये हुआ है…मैं रोज़ सोचती थी क्या लिखू और क्यों? क्युकी लिखने से अपने मन का बोझ कम हो जायेगा। पर इससे क्या फायदा ? पर इसका जवाब सिडनी में हुई घटना के बाद लोगो का यही कहना और बोलना मुझे दे गया। वो सोशल मीडिया से अपने देशवासियों के साथ होने का एहसास दे रहे थे।  यही तो हम तब भी करते है जब हमारे पडोसी या रिश्तेदार के यहाँ कोई दुर्घटना घट जाती है। अपनों का साथ थोड़ी हिम्मत देता है और सहारा भी।
  पर इस सवाल का क्या? इसका क्या अंत है? जिन्होंने बनाया उन्हें कोसते रहना या जो हम कर रहे है।  हम कुछ कर रहे है तो हर बार बार बार ये सफल कैसे हो जाते है? क्या इनके अपनों का खून बहना जायज़ था ? और हमारे अपनों का? किस्से पूछे और क्या? सब रो रहे है। मारने वाला भी और मरने वाला भी। हम मर रहे है और मार रहा है हमे हमारा धर्म। जो ये धर्म का रॉंग कनेक्शन लग गया है उनसे, क्या ये राइट जगह नहीं लग सकता। इनका मैनेजर इनकी फिरकी ले रहा है.... ये इन्हे नहीं समझाया जा सकता ? किसी PK से कुछ काम बन सके या कोई बाबा ही सही जो राइट कनेक्शन लगवा सके। कुछ तो हो सकता होगा। राजनीति के बड़े बड़े महारथी कुछ तो करिये।  जो बन पड़ता है, करिये।


मेरे नखरे और मेरा प्यार 
प्यार में मेरे नखरे 
और उन नखरों में मेरा प्यार 
सच यार 
बहुत भारी पड़ गया 
आज तो हमें भूखे पेट ही सोना पड़ गया 

उनकी आदतें थी हमसे जुदा 
हम शब्दों के खेल के शौक़ीन 
वो चुप रह कर करते थे 
हमे अपना बनाने का हिसाब 
इस चुप्पी में आज हमें रोना पड़ गया 

'वो है मेरा मालिक' 
ये उसे गवारा नहीं 
मैं करू उसकी इज़्ज़त 
इससे कोई शिकायत नहीं 
कि उसके अंदाज़ मेरे हो जाये 
मेरी कमियां छुप के कही खो जाये 
वो भी करता है कई बार ऐसा 
हम कुछ ज़्यादा 
वो थोड़ा काम कर जाए 
इन नखरों से उन नज़रो से फिर बेइज़्ज़त होना पड़ गया 
क्युकी हर कोशिश में 
नखरा भारी पड़ गया। 

ये चाह थी 
कि हमारे दरमियाँ भी कुछ संभव हो पाये 
तो हम अपनी बुराई से खूब लड़े 
पर हम भी ठहरे हठी और दुष्ट दिल 
अपना बदलना न भाये हमे 
तभी तो ये नखरे आ जाते थे 
हमे रोकने 
और देखिये ना, 
ये कमबख्त नखरा भारी पड़ गया 
आज भूखे पेट ही सोना पड़ गया। 

आज समझा इस हुनर का फायदा 
जब तुम न हो मुझे झेलने वास्ते 
ऐसे भूखे ही कुछ लिख सोना 
बड़ा सस्ता पड़ गया 
पर सच, ये नखरा बड़ा भारी पड़  गया। 

हुज़ूर, इन नखरों को समझना पड़ेगा 
अभी ये भूत हमसे उतरा नहीं है 
दुबारा खाने के वक़्त नखरा न करेंगे 
तुम्हे कहीं और इस्तेमाल करने से डरेंगे 
यार, तुम भी थोड़ा समझो 
ये ज़िदगी भर का मामला है 
ऐसे भूखे न रखो 
ये नखरे हार मान जायेगे एक दिन 
हमे अपनी वही 'गम्मो ' ही समझो 
हमे अपनी वही 'गम्मो ' ही समझो। 






Thursday, 11 December 2014

हर दिन सुबह सुबह, खैर, मेरे लिए तो शाम या दिन का कोई भी वक़्त होता है, अख़बार के पेज पर काले और रंग बिरंगे छपे अक्षरो के जोड़ तोड़ से बने कुछ शब्द जो हमें एक परफेक्ट जगह दे जाते है जिससे और जहा से हम अपनी भावनाओ को, घटनाओ को दुसरो तक पंहुचा देते है. वैसे तो आज मैंने अखबार उठाया था सिर्फ पढ़ने के लिए, पर कब ये विचारो के घोड़े फिर से दौड़ने लगे और मैं एक पाठक के चरित्र से निकल कर दूसरे आवेश में आ गयी, ये बताना कठिन ही है मेरे लिए. अक्षर, कितना मैजिकल है ये इनके permutation और combination से हमे न जाने कितने शब्द और वाक्य मिल जाते है जिनसे हम दुनिया जहाँ की बकैती करने के अधिकारी हो जाते है. बस जरुरत होती है वाक् पटुता की।  शब्द जैसे संविधान,प्रशासन, राजनीति, नेता,, समाज, नियम, कानून, अनुशासन, धर्म, भक्ति, भाव, शांति, विश्वास, धोखा, आडम्बर, तर्क, वितर्क, मित्र, शत्रु, जन्म, मरण, निर्वाण, परिनिर्वाण, इच्छा आदि आदि।  इन शब्दों के प्रयोग से हम अपने भाव विश्वास को एक नाम देते है।  एक संस्था के तहत खुद को जोड़ते है और उसका प्रचार प्रसार करते है जीवन पर्यन्त। फिर कही और से किसी के द्वारा इन्ही शब्दों के नए खेले से प्रभावित हो कुछ नया ढूंढ लेते है खुद के लिए। पर क्या आप सोचते है अगर इनका मतलब इनके आज के मलतब से उल्टा होता तो. तो क्या शायद हम उन्हें वैसे ही समझते।  मसलन कानून का मतलब दाल होता और नेता का मतलब नमक. तो हम शायद बोतले, भैया कानून में नेता की मात्र ज़्यादा हो गयी है, इसका पूरा अस्तित्व ही खतरे में है, न खाने लायक न फेकने लायक। फेंके भी तो कैसे कानून और नेता दोनों ही गाढ़ी मेहनत की कमाई है। नेता का ऐसे बर्बाद होना अपने धर्म में अच्छा नही मानते। या फिर कुछ ऐसे कि लड़की को लड़का और लड़का को लड़की। तो माहौल में खबर होती कि आज लड़कियों की हरकतों की वजह से लड़को का जीना मुश्किल हो गया है. अभी हाल ही में एक लड़की कैब ड्राइवर ने MNC में काम करने वाले एक लड़के का RAPE कर दिया। अब तो ये हालत हो गयी है कि  ऐसी जगहे भी सेफ नहीं है. इन लड़कियों की वजह से लड़को का जीना दूभर हो गया है. आज जहाँ लड़के अपने पैर पर खड़े हो काबिल बन रहे है वही दूसरी ओर लड़कियों की इन हरकतों और हैवानियत की वजह से लड़के अपनी ज़िन्दगी नहीं जी पा रहे है। भला इसमें लड़को की क्या गलती? कहाँ जाये ये बेचारे लड़के। इस समाज में लड़को को बराबरी का दर्ज मिलना ही चाहिए।
          शब्दों के अर्थ के इस अदला बदली के खेल में यह भी बात गौर तलब है कि हमारी भावनाओ को एक नाम देते है ये शब्द।  मुर्दा पड़ी किसी चीज़ को एक नाम दे उसमे उससे जुडी तमाम भावनाए जोड़ देते है, जो हमने अपने अनुभव से उस शब्द के लिए इजात की हुई है।  मसलन 'माँ ' .... ये भी आलू चाकू  डिब्बा कचरा गन्दा आना जाना ऐसे ही तमाम शब्दो जैसा ही है पर इससे जुडी भावनाये इसे एक स्पेशल दर्ज देती है।  जिससे ये एक भावनात्मक, ममता, बलिदान, प्यार, कोमलता और न जाने कितने ऐसे भाव वाले शब्दों का घर बन जाता है और बन जाता है एक ऐसा शब्द कि जब किसी को गंध बोलना हो तो उसकी माँ को गली दे दो। उसको जरूर तकलीफ पहुँचेगी. यहां दिल्ली में और ऐसे बड़े शहरो में अब इन गालियों को SLANG कहते है। चलो कम से कम इनसे होने वाले झगडे कम हो गए, नहीं तो आये दिन इन लड़कियों( बदला हुआ मतलब) में इसी बात पर मार पीट हो जाया करती थी।  अब तो यार दोस्त हर बात पर एक दूसरे की माँ बहन करते रहते है. 
     शब्द जैसे क्लाइमेट, ग्रीन क्लाइमेट फण्ड, कार्बन बजटिंग और कई नवजात शब्द अपनी नयी परिभाषा के साथ लोगों से मुख़ातिब होने और अपना मक़सद समझने के लिए बैठे है।  शब्दों के इस जाल में तो मैं सुखद आश्चर्य में पड़ गयी कि  बचपन से जिस नाम से मैंने एक चीज़ को पहचानना सीखा... अ से अनार ग से गमला वो एक खोज मात्र है जिसमे संशोधन तो नही पर हाँ इस परिवार में नए मेंबर ज़रूर जुड़ते रहे है और शायद कुछ छूटते भी रहे हो.