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Thursday, 17 December 2015



PAPA....just dont give your ears....give ur heart to it...Enjoy ur emotions with/for HIM. Confess your love.

Tuesday, 24 November 2015

मैंने कुछ यूँ कहा

तेरी नज़रो का कपडा पहन लिया है मैंने
अब न शर्माती हूँ
न सकुचाती हूँ
अब बालों को 
कस कर बाँध लेती हूँ
कभी खोल के यूँ ही निकल जाती हूँ
तुमने मुझसे जब से कहा
उस रोज़ सुबह मैं बिखरी थी बिस्तर पे
तुम्हे सुन्दर लगी थी

अब नही देखती 
हसीं कोई चेहरा
न देखती हूँ 
मुझे कौन देखा 
तुम अब जो हर वक़्त में कुछ पल चुरा के
देख लेते हो मुझे यूँ ही आते जाते 

आज एक बाल दिखा 
सफ़ेद हो चला है वो
उसे खूबसूरती समझ 
ज़ुल्फ़ों में सजा के चल दी मैं
कि तू मुझे रंगो में देखता है
काले उजले का भेद नहीं आता तुझको
तुझे तो बस मेरे गालो का
गुलाबी होना समझ आने लगा है अब

मेरे गालो पे पड़ते गढ्ढे
अब गहरे हो गए है
तुझे सोच के कई दफे हस लेती हूँ मैं
पड़ पड़ के उनकी गहराई 
बढ़ गयी है थोड़ी
जैसे साथ रहते रहते 
मैं थोड़ी गाढ़ी हो गयी हूँ तुझमे 

कि तेरी हँसी ओढ़ ली मैंने
तेरी नज़र पहन ली मैंने 
तेरे तरीको से नाता जोड़ा है
तेरी हरकतों से खुद को मोड़ा है
तेरी सख्शियत संभाल ली मैंने
उसमे अपना वजूद जोड़ा है
अब नहीं शर्म आती 
तेरी तबियत से अपनी हसरत बदल दी मैंने
तरी हँसी ओढ़ ली मैंने
तेरी नज़रो का एक कपडा पहन लिया मैंने।

वैसे तो ये आपकी इच्छा है इन पक्तियों को आप खुद से कैसे जोड़ते है पर आग्रह करना चाहूंगी कि इसे भौतिकता से हट कर भी देखने का प्रयास करे। शुक्रिया..!!

Sunday, 1 November 2015

ज़िन्दगी न खुश है न कभी खुश होती है
ये तो मौत है जिसके डर से  जी जाती है।

जीत प्यारी होती है अनचाही भी होती है
ये तो हारने के डर से जीत ली जाती है।





Monday, 28 September 2015

Going Home: A film by Vikas Bahl

Vaaisaw

माफ़ी माँगने में सुरुरी थी मेरी
सर झुकाना नज़ाकत थी मेरी
हस के टाल देना उनकी बातें
न जी ये आदत न थी
एक हसरत थी मेरी
कि वो जाने तो
उनकी ज़िन्दगी में आखिर आया कौन है ?

खो दिया मैंने खुद को
आज जब वो साथ नहीं
सोचती हूँ ढूँढू किसको
पहले उसको या खुद को
वो जिसके मिलने पे
मैं भी मिल जाऊ शायद
या मैं मिलने पे
क्या पता वो
इर्द गिर्द ही मिले।

ऐ खुदा, तूने क्यों बनाई ये कुदरत
और बनाई तो क्यों
मिले नही खुद से
आज तेरा ये बन्दा
ढूढ़ता तेरा करम
मिल गया जो उस काफ़िर में
बता अब किस बंदगी से
ढूंढें तुझे
सोचती हूँ पहले  ढूँढू किसको
पहले उसको या खुदा को
वो जिसके मिलने पे
खुदा मिल जाये शायद  
ये खुदा के मिलने पे
वो काफ़िर भटकता दिख जाये
दूर कही
कि पहले ढूंढ लूँ खुद को
उसके होने में जो खो चुकी हूँ
खुद को
ये तो  उसकी अमानत से गद्दारी होगी।
तेरी नियत पे एक और खराबी होगी।

मैं फ़ारसी और पर्शियन
हो जाती हूँ आये दिन
हिंदी उर्दू ज़बान
सी मिल जाती हूँ अक्सर
फर्क समझना मुश्किल है
सब कहते है
क्या से क्या हो गयी हो तुम
न गरिमा न गम्मू
न अक्खड़ न शर्मीली
बस 'देसी' रह गयी हो तुम।

इसे खुद पर इल्ज़ाम न समझे
मालिक इस दिल के
ये आप का है
इस दिल को सरेआम न समझे।

PS- vaaisaw-  halt ( in farsi)
फ़ारसी एक पर्शियन शब्द है और पर्शियन एक अंग्रेजी शब्द है।

Saturday, 12 September 2015


आज क इस दौर में, हंसी बड़ी महंगी होती जा रही है।  दुःख के कारण गिनने से भी ऊपर है। इन सब में मेरी कुछ बातें मेरे साथी से.… आपसे…

हो मग्न बड़े तुम ओ साथी
क्या मदिरा पान में ही गम था?
या भुला न पाये तुम उसको
जो तेरी परछाई में कम था
या ये मदिरा का प्याला
डूबा ले गया और भीतर
या कलियों की बगिया में
देख  लिया तुमने गुंजन
हुआ क्या अभिशापित कोई
पवित्र विचारो का बहरूपी
या संयम खोने का
आघात हुआ तुम पर
कि जिस प्याले में सब खोते है
वो बेचैन हो उठा तुझे  पाकर
तू मग्न हुआ उसे पी कर

क्या फिर से सरहद पे गोली की आवाज़ तुझे भी आई है
क्या फिर अध भूखी माँ से पेट भर हसी सुनाई है
उसका बच्चा जान सके
हसना भी  एक कुछ होता है
उसकी लाचारी में थोड़ा सा मलहम होता है
सिखा रही है वो उसको
कि कल जब मैं गिर जाउंगी
तू भी मुझको ऐसे ही हँसा के एक मौत सुला देना
जैसे मैं तुझको बीते रात
हर रोज़ सुलाया करती हूँ।

या सुन ली तूने वो पीड़ा
कैसे मरते है हम हर दिन
दुनयावी दिखावो से
भ्रष्ट पड़े समाज में रोशन उजालो से
ये तेज़ चमक ऐसी है
जो मुझे तुझे झुलसा देगी
आई थी रॉशन करने
पर ये हमे अँधा बना देगी

तेरे ये आंसू माँ की तकलीफो से तो नहीं ?
रुला रही उसको दुनिया
हम मार रहे उसको
उस पर जीते हम
हम ही मार रहे उसको
लाख जतन हो जाने पर भी
कुछ न बदल पाया अब तक.…
क्या यही तेरी उदासी है
आंसू दुःख जताने का
निकल मदिरालय से तू
कान दे सुदूर वहां
जहां हर दिन एक तबका लड़ता है
खुद थोड़ा ही सही बदलता है
तेरे ऐसे रो लेने
कुछ नहीं बदलने वाला है

चल आ थोड़ा मुस्काते है
पेट भर हसी खा कर
सो जाते है
क्या पता कब
घर छोड़ निकलंना पड़ जाये
अपनों की बेहतरी में
कब अपनों को खोना पड़  जाये

क्या पता साथी कब
उनके डर से अपना पता बदल जाये
सीरिया के हम कब हंगरी
का पता बदल जाये

चल उठ साथी
चल थोड़ी हसी बनाते है
हो गयी है ये महंगी अब
ये भी कल 'बॉन्ड' न बन जाये
खरीद के भी न मिल पाये
इससे पहले चल थोड़ी हसी
कमाते है
चल थोड़ी हसी लुटाते  है।

Tuesday, 25 August 2015

आदमी और आदमी में आदमी

हर आदमी में होते है दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना ।

निदा फ़ाज़ली साहब की ये पंक्तितयां एक किताब के पेज पे देख खुद ब खुद मुस्कान होंठो पे छा गयी। कितनी सटीक बैठती है ये हम पर। सोचा इतनी सरल और गज़ब वाली बात आपसे कहानी तो बनती है।
तो जनाब, आदमी में आदमी खोजने का कार्यक्रम शुरू करे इससे पहले एक बात कहना चाहेंगे कि अगर इन दस बीस आदमी में दस बीस बार एक बात एक सी हर वक़्त दिखे तो कुछ कायदा यह भी कहता है कि आप हमराह बन रहे है किसी के-

कि हर दिन वो कुछ अलग था
हर दिन कुछ नया
कभी उल्फत की बात थी
कभी सूरज का गम बड़ा
इन सब में जो गज़ब था
जिसपे हम मर मिटे
कि वो हर वक़्त दूर कही
कोने में, क्षितिज पास
हाथ थामे फलक बैठा था ज़मीं का ।

ज़रा इन दस बीस का पैमाना तो देखे कि हम पहचाने कैसे कि वो कैसा है कौन है मेरा है या कोई और है-

कि वो हर बार में बदलता है
कभी नौका तो कभी डूब के उबरता है
उसे हर बात में शिकायत है
कभी पानी तो आग से
खिलाफत है
वो न मंदिर है
न मस्जिद वाला
वो तो एक गली के कोने में बैठा
काहिल कोई बगावत है
जो हर दिन उचक के चिल्लाता है
जब अजान का शोर ज़ोर होता है
बंद पड़ती घंटियों संग शांत हो
ठहर जाता है
कि मलबा गिरेगा शहरो का
शामिल उसी में हो जाऊ
मेरे जीने की इस कहानी में
हीरो कभी तो बन जाऊँ।
वो एक मासूम की कवायद है
बुज़ुर्गों का मापदंड है वो 
अपनों की  कड़वाहट है 
किसी का सहारा है वो 
किसी की गभराहट है 
बड़ा मुश्किल है तुझे जानना 
ऐ आदमी 
तू किसी की ताकत 
तो 
किसी की बगावत है। 
जब एक के अंदर दस बीस बसे हो 
तो कैसे कहूँ 
कौन सा तू मेरा है 
कौन सा बनावट है। 
हर आदमी में 
निदा फ़ाज़ली मिल सकता है 
कुछ में ग़ालिब की लिखावट हैं 
कुछ में कलाम सा 
रंग छुपा 
तो कोई अपनी ही 
लिखावट है। 
तो न खेल शतरंज की बाजियां यहाँ 
शह मात में जीत हार बसी 
तू कर एक को अपना 
और सब में उसकी आदत है।
तू एक से ही कर
दस बीस में तरी ही मोहब्बत है
तेरी ही मुस्कराहट है।  


Saturday, 1 August 2015

मसान, मिसाइल मैन और मेमन

मसान, मिसाइल मैन और मेमन.... ये तीन नाम उसी क्रम में लिए गए जिस क्रम में हमारे बीच हुए है. मसान  पिछले  कुछ हफ्ते रिलीज़ हुई वरुण ग्रोवर की लिखी फिल्म है. मसान- नाम ही था शायद कि बिना ज़्यादा जाने बिना ज़्यादा पूछे ये फिल्म देखने चली गयी थी।बस एक सवाल लिए की कोई मौत से कितना रोमांस कर सकता है? मसान संस्कृत शब्द श्मसान का बिगड़ा हुआ रूप है। दूसरा था इसका बेजुबान किरदार  खुद में कई सारे राज़ समेटे दो नाम बनारस और अलाहाबाद। ना जाने कितनी कहानियाँ समेटे ये चुपचाप न जाने कितने आंसू पीता है, कितनी खुशियाँ जीता है और न जाने कितनो के राज़ दफनाए रखता है खुद में ये शहर।  दोनों ही गंगा किनारे बसा अपनी अपनी वजह से मेरे करीब है। फिल्म  देखने के बाद फिल्म खुद भी एक वजह बन गयी थी और वजह बन गए इसके गाने। इंडियन ओसियन के गाने पहले ही आकर्षित करते रहे है अपने तरीको से अपने लफ्ज़ो से। इस बार 'तू किसी रेल सी गुजराती है' और 'फिर दिल कस्तूरी जग दस्तूरी' … ये गाने सब कुछ बयान कर देते है बस ज़रूरत है तो थोड़ी देर इन संग बैठ के बातें करने की। इनके शब्दों में खुद को खोजने की। म्यूजिक के साथ खुद को झकझोर के उठानें की और फिर कही तो खो जाने की। इन सब में जो मुझमें जागती रही वो थी मौत की खूबसूरती, उसकी दहक, उसकी जलन, उसी की ठंठक। मैं इन सब के बारे में कुछ लिखना चाहती थी. आपको बताना चाहती थी कि  फिल्म क्या कहती है।  इसका अंत जो मेरे लिए  आसान था अनुमान करना वो एक शुरुआत थी ज़िन्दगी की और फिल्म की शुरुआत एक अंत था ज़िन्दगी का। कई सवालो का अंत और शायद कई सावलो की शुरुआत।  ही सबसे खूबसूरत था मेरे लिए, यही बताने का तरीका ढूंढ रही थी। क्या लिखू वो सोच रही थी कि  एक दोस्त ने खबर दी कि  हम सब के आइडियल 'मैन ऑफ़ गोल्ड' हमारे मिसाइल मैन हमारे बीच नहीं रहे।  मैं दंग थी और पछता भी रही थी। अभी हाल ही में मैंने उनके असिस्टेंट से बात की थी मुलाकात के लिए।  कलाम साहब दिल्ली आये थे उन दिनो। असिस्टेंट महोदय ने कहा कोई प्रोजेक्ट है आपके पास या कोई ख़ास वजह?  सिर्फ मेरी इच्छा है, ये काफी न था। मेरी रिसर्च कम्पलीट होने ही वाली है ये सोच मैंने तुरंत कहा हाँ, है कुछ मेरे पास, पर अभी काम बाकी है थोडा। उन्होंने कहा पूरा होते ही आप बात कीजियेगा, मुलाकात हो जाएगी। मैं नहीं मिल पायी उनसे। मैं पीछे रह गयी।मौत किसी का इंतज़ार नही करती। न ही असल ज़िन्दगी में और न ही उस फिल्म में। और किसी के जन्मदिन के दिन ही उसे मार देना, अलग कहानी।  यहाँ हम बात कर रहे है तीसरे M की …मेमोन…याकूब मेमोन। इनका परिचय देने की मुझे बिलकुल ज़रूरत नही है।  कुछ उनके पक्ष में, कुछ विपक्ष में , कुछ हमदर्दी तो कुछ तर्क, कुछ संविधान के बारे में तो कुछ इतिहास के बारे में अपने ज्ञान को बढ़ाते बताते कुछ न कुछ सब कह सुन रहे है। मैं सिर्फ ये जानती हूँ कि  एक फिल्म जिनके किरदार जिन्हे हम जैसे आम आदमी को दिखाया है वो और दूसरे हमारे देश के राष्ट्रपति  कलाम साहब और तीसरे जिसे हमारे देश के कानून ने आतंकवादी बताया, इन तीन कहानी में इनका एक हिस्सा जो इनको हमारा हिस्सा बना गया वो है इनका मसान तक का सफर।  जो इनको हमारे बीच ज़िंदा कर गया।मसान को  कहा से जोडू मुझे ये नही पता, सुबह नाश्ता करते वक़्त किसी की आवाज़ सुनाई दी कि अरे हो गयी फांसी उसको। सबेरे ७ बजे ही। कुछ 'डेमोक्रेसी' का जश्न रहे थे तो कुछ विरोध में थे।  कुछ कानून व्यवस्था की वाह वही तो कोई एक नए डर में जकड़ता दिखा। कोई हिन्दू बहुल राष्ट्र में सीना चौड़ा कर के चल रहा था तो कोई मुस्लिम होने से डर रहा था। कोई कलाम जी को अच्छा मुस्लिम तो मेमन को बुरा बता खुद को 'लिब्रल' बता रहा था और इंडिया को सेक्युलर। कही जश्न तो कही मातम था। कही २५० की मौत का बदला तो कही कुछ गलत हो गया इसकी बुदबुदाहट थी। इन सब में कुछ ठहर से गए तो कुछ दो पल रुक कर निकल गए। हमारा 'सूडो' नेचर हमसे आधा आधा सब कुछ करवा लेता है। बहुत सी बात है जो इसमें कहने सुनने वाली है इन तीनो के बारे में, खास तौर से मेरे पसंदीदा कलाम साहब के बारे में। पर वो सब मैं छोड़ती हूँ क्युकी कइयों ने बहुत उम्दा और ज़्यादा कहा है इन तीनो के बारे में। मैं इतनी समझदार कहाँ? मैं तो बस आपसे दो चार बातें करना चाहती हूँ ,दो चार आपसे सुन्ना चाहती हूँ आपकी दिल की।
खैर, ये तीन घटना दिमाग में M 3 बन कर सामने आई - मसान, मिसाइल मैन और मेमन। मेमन  कौन थे, क्या थे? मैं दो हफ्ते के पहले जानती भी नहीं थी, हमारे मिसाइल मैन इनके बारे में जो ना जनता हो मुझे उसका ख़ास पता नहीं और मसान इसके बारे में रिलीज़ होने के कुछ वक़्त पहले पता चला। हर इंसान की ज़िन्दगी का तो नही पता पर मौत के बाद वो दर्ज हो जाती है हमारी ज़िन्दगी में। एक फिल्म जब बनती है उसकी ज़िन्दगी शुरू होती है, और जब वो रिलीज़ होती है वो उसकी मौत होती है क्युकी वो अपना काम उस वक़्त कर देती है और सिनेमा घर में आते ही उसकी किस्मत्त का ताला बंद हो जाता है वैसे ही जैसे हम फिल्म के एक कांसेप्ट से इस दुनिया में आते है pre production, production post production editing सब कुछ होती है।  ज़िन्दगी भर सीखते है और खुद को 'एडिट' करते रहते है। अपने आप को बेहतर प्रेजेंट करते है जिसे अच्छी नौकरी, झोकरा झोकरी (जो चाहिए) वो मिल जाये, वो 'ऑडिशन' होता है, प्रेजेंटेशन सिनेमेटोग्राफी होती है, हमे 'अवार्ड्स' भी मिलते है, ग्रैमी मिलता है की ऑस्कर या फिर फिल्म फेयर ये हमारे कर्मो और तरीको पे निर्भर करता है उदाहरण दोनों M ( मेमन और कलाम साहब )को देख लीजिये ये असल में मिलता है ज़िन्दगी पूरी बीतने के बाद। हमे लोग याद रखेंगे या नहीं, अच्छा या बुरा कैसे ये सर्टिफिकेट मसान तक पहुचने पे ही मिलता है। ज़िंदगी तो बस उसका गुणा भाग है।  कलाम साहब हमेशा से फेमस रहे, एक राष्ट्रपति के तौर पे, एक सफल वैज्ञानिक के तौर पे, बच्चो के पसंदीदा  नेता और उनकी किताबो के ज़रिये वो हम तक पहुँचते रहे। पर जब आज वो हमारे बीच नहीं है, तो उनकी उपस्थिति ज़्यादा हो गयी हमारे बीच। खबर मिलते ही अधिकतर लोगो का स्टेटस था RIP KALAAM JI और ऐसे ही। वो वाक़ई दुखी थे या  नहीं ये वो खुद भी नही जानते। पर ये टेक्नोलॉजी भी हमें नए सामाजिक रिवाजो में बाँध चुकी है जो हम बिना समझे फॉलो करते जा रहे है। इसमें मैं शायद एकतरफा लगूं पर मैं इस 'बिहेवियर' की पक्षधर कम  हूँ। तो मैं इसे दूर रखती हूँ आज के ब्लॉग से। उनकी मौत पे जब मुझे दुःख हुआ तो मुझे लगा कि मेरे मरने पे भी सबको दुःख होना चाहिए, उसके लिए उनकी तरह छोटा बड़ा कुछ करना पड़ेगा।  इंसान दुखी तब होता है जब उसे लगता है उसका अपना कुछ खो रहा है या फिर कोई ऐसा इंसान चला गया जो उनकी बेहतरी में कुछ कर सकता था। मतलब ये कि  मुझे दुसरो के लिए कुछ करना होगा।
खैर,याकूब मेमन किसकी मदद कर रहे थे,किसी अपने की? किसी के अपनों को मारने की, ये सवाल आज भी सवाल सा ही है। लेकिन बहुत सारेऔर सवाल भी उठते है। जो हुआ ये एक उदहारण बनाने के लिए किया जा रहा है या सच है जो कहा जा रहा है।  क्या सच में एजेंसी की मदद का कोई फायदा नही हुआ। अगर अपराध बड़ा था तो सिर्फ एक को ही क्यों ये रेयर ऑफ़ rarest पनिशमेंट ? मौत का बदला मौत से न्याय होगा क्या अब?
 राजनीतिकरण के कारन हमे हमारी सभ्यता का सच भी वोट बैंक की राजनीती लगती है, हर नयी बात हिन्दुत्ववाद की नयी खोज लगती है। शायद यही कुछ मेमन के साथ भी हुआ हो या ना भी हुआ हो। लकिन दंड का हमारा उद्देश्य क्या था? दंड व्यवस्था का उद्देश्य सुधार के लिए था बदले के लिए नही। यह फ़ासी कई सवाल उठाती है बाबरी मस्जिद गिराने वालो को फसी क्यों नहीं? गोधरा कांड में फसे लोगो को फसी क्यों नहीं ? इन सवालो का जवाब या खुद को बेहतर दिखने का जवाब किसी हिन्दू अपराधी को फांसी तो नही हो सकती न? पर कुछ ऐसा करके जरूर जिसके लिए हम जाने जाते है।  इमोशन के नाम पे यहाँ इलेक्शन जीत लिए जाते है।कहते है लहर चल रही है और जिसकी लहर वही जीतेगा। ३० साल के बाद इतिहास दोहराया जा सकता है तो हम अपनी संस्कृति क्यों भूलते जा रहे है? हम उनके जैसे तो नहीं हो सकते कम से कम। मौत से बड़ा नुक्सान होता है।  चाहे वो हमारी हो या किसी और की। पर इन मौतों का क्या? कलाम साहब के शोक में राष्ट्रध्वज आधा झुका रहा ७ दिन तक। होना भी चहिए, हम उनके बहुत आभारी है। पर उन हज़ारो मौतों का क्या? जो इनकी ही तरह गुमनाम और बेजुबान है। मौत से रोमांस बहुत अच्छा है अगर वो रोमांटिसाइस करे तो।  पर मौत के पीछे का मातम भी उतना ही बुरा है जब किसी की चीख बन के उसका सब कुछ बर्बाद कर देता है।  मैं बस इतनी उम्मीद रखती हूँ की मसान के बारे में बात होती रहे, मसान में जगह बनी रहे। मसान मौत का ऐसा कोई जुमला न बन जाइए जिसे बोलने में डरने लगे हम। ज़िन्दगी के बाद मौत है ज़िन्दगी मौत नहीं है. हर आदमी कुछ ऐसा कर सके कि उसकी मौत पे पूरा हिन्दुस्तान न सही कुछ लोग तो रोये की हाँ कोई मसान गया है, कोई मसान गया है। 



Saturday, 25 July 2015

Blood and Shed

A piece of work for you from my tiny world... written in 2013.  it is short but not sweet...i guess.

This one is dedicated to my friends who complaint of their hardship in reading HINDI.  i hope you will like it..!!

Satire of Mast
desire of  Past( discussion)
mourning for devastation
Mayhem the day long!

Reticence about thoughts
presence of mask
could not believe
Mayhem the day long!

all was covered, some to show
conformity, integrity, adaptation on low
still willing for life, aah! mayhem
mayhem the day long!

bloodshed in dark,
cries a lot, unable to forget
fear of mayhem...that will be there
...life long..life  long!

Mayhem- chaos
Reticence- reserve, shyness / अल्पभाषिता
conformity- conventionality/ अनुपालन

Friday, 3 July 2015

एक गोले के दो रंग, दो नाम, दो काम

एक छोटी बच्ची माँ के साथ उसका हाथ पकडे रात में बाहर खुले में घूम रही थी। उसकी नज़र आसमान में चमकते चाँद पे गयी जो अपनी रौशनी से रात की स्याह चादर उजली कर रहा था। वो माँ के आगे पीछे छुपते चाँद से छुपम छुपाई खेल रही थी। अगली सुबह 5 बजे छत पे दिन की रोशनी आने से नींद खुलने पे उसे उस चाँद की जगह एक नारंगी रंग का गोला दिखा।उतना ही गोल बीस रंग का फरक। 
उस छोटी सी बच्ची के सवाल और जवाब..

रात के दस बजे
आसमान में एक चमकता 
चांदी रंग का गोल गोल सुन्दर सा
घूम रहा था मेरे संग
जैसे जैसे मैं घुमू 
झांके मुझे कभी 
पेड़ के पीछे से
तो कभी छत की रेलिंग में बने खानो से 
शांत था 
पर सुबह भोर में
5 बजे
था आसमान में 
एक नारंगी गोला जैसे गुस्से में लाल
मैं जाऊ जहाँ जहाँ
वही आये पीछे पीछे
दिन चढ़ते वो गुस्साए
लाल और होता जाये

क्या हुआ उसे
रात में तो शांत था
किसी का इंतजार था क्या उसको
जो उससे मिलने न आया
या फिर ये बहरूपिया रंग बदलता है
दिन होने पे लाल रंग
और साँझ में चाँद ये बनता है।

आज न पीछा छोड़े है
मैं निकली क्या बाहर
ये मुझे ही घूरे है
हवा से लड़ जाता है
वो गुस्से में झल्ला 
हमे जलाती है
इसके गुस्से से धरती भी
आग बन जाती है।

उससे बोलो बरसने को
शायद ये ठंठा पड़ जाये
पता नही क्या ज़िद है इसको
शायद होश में आ जाये
इसका कुछ छूटा है क्या
जो धरती घूरे जाता है
बोलो इसको ये मेरी है
आसमान पे हक़ क्यों न जताता है।

बादल इसका पापा है
तभी तो उसके आने पे छिप जाता है।
न हो गुस्सा 
माँ बोली तू 'सूरज' है
तो मेरे 'भैया' जैसा 
मुझपे क्यों गुर्राता है।

धरती मेरी माँ है
इसके आँचल में छुप जाउंगी
तेरे हाथ न आउंगी।
गर्मी छुट्टी है
तेरे पापा घर आये है
अब देख तू 
बादल देख आ गया
अब तेरी शामत आई है (हसते हुए) ।
लगा  शिकायत डटवाउंगी
पापा से पिटवाउंगी
नहीं मिलेगा धरती से कुछ
तुझे तेरे पपा से डटवाऊंगी।

Friday, 26 June 2015

बातें हमारी; हमारे बीच की 2

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं कहूँगी कि तुम याद आये
नहीं कहूँगी कि प्यार है तुमसे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं होगी अब ज़िद मिलने की
एक बार सीने से लगा के
प्यार करने की
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं होगी कोई ऐसी बातें
जो प्यार करने वाले करते होंगे
तुम कहते हो तो
ठीक है,
नहीं मांगती वादे तुमसे
ना कोई कस्मे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

रह सकती हूँ बिना तुमसे बोले
पर गुस्सा नही करो
चुप न हो जाओ
तुम दूर नही जाओ।

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

सच में, जीने की ज़रूरत में
नहीं मांगूगी अब बेवजह हिसाब
करुँगी पूरे काम
नहीं आउंगी तुम्हारे पास
पर तुम दूर नहीं जाओ।

अच्छा नहीं करुँगी
उँगलियों के बीच उंगलियाँ फसा के
हाथ की पकड़ से अपने प्यार की माप
नहीं करुँगी
कनखियों से तुझे देखने की कोशिश
की तभी पता चला था उस रोज़
कि तू भी देखा करता है यूं ही
नहीं मांगती तुमसे
साथ तुम्हारा
पर तुम दूर नही जाओ

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

Saturday, 13 June 2015

बातें हमारी ;हमारे बीच की

याद हैं जो तुमने पिछली बार चाभी का छल्ला मंगवाया था मुझसे
मेरे महंगे से छल्ले लाने पे
उस ढाबे के सामने चलते चलते ही डाटा था मुझे
की महंगा क्यों लायी थी मैं
उस डाट में तुमने
उसका पैसा भी नही दिया मुझको
मैं अब भी हर बार एक नया अच्छा छल्ला
तलाशती हूँ
पर मिला ही नही '
वो हम दोनों पसंद न था ज़्यादा
कुछ अच्छा पर सिंपल सा
दिखा ही नही
तसल्ली है की हर शाम जब घर आया करोगे
तो उसे देख मुझे याद करोगे
उसे मेज पे फेकने से पहले या बाद में
एक बार तो याद आएंगी मेरी
बस ऐसे ही मेज पे जगह चाहती हूँ।

आज मेरी चाभी का छल्ला खो गया है
क्या हम उस एक छल्ले में दो चाभी रख सकते है ?

एक बार रात में तुम्हे मना कर थक गयी थी
तुम्हारी मेज के कोने के पास
दरवाज़े और मेज के बाच की जगह में
मैं जा कर नीचे बैठ गयी थी
रो रही थी
कि  तुम मान ही नही रहे
अचानक एक हाथ जो बढ़ा मेरीओर
तुम बुला रहे थे
मुझे बित्तर में
टेबल लैंप की हलकी रौशनी में
सिर्फ आँखे नज़र आ रही थी दोनों की
आंसू भरे हुए
एक दूसरे को निहारती कि
कितना रुला दिया  हमने
माफ़ी मांगती एक दूसरे से  
पहली बार था शायद
मैं तुम्हरे पास बिना कुछ बोले
सो गयी थी
तुम्हरे कंधे पे सर रख के
अँधेरी रात में
वो पीली  रौशनी
पड़ रही थी दोनों पे
हल्का हल्का परछाई सा दिख रहे थे हम
बीच बीच में
आँखे खोल देख लेते थे तुम
कि  अब भी तो नही रो रही हूँ मैं
ऐसा मैंने भी कई दफे किया उस रात
प्यार होने लगा था
थोड़ा तुम्हे थोड़ा मुझे
एहसास होने लगा था।

मेज के कोने की जगह मेरी ही रहने देना। 

Sunday, 7 June 2015

मुझे रोना अच्छा लगता होगा

मुझे रोना अच्छा ही लगता होगा
तभी तो मैं हर बात पे रो देती हूँ, 
जो कड़वी होती है
जो चुभती  है
जो दिखती है कि गुस्से में निकली है
जो तकलीफ पहुचाती है
वो कहते है कि रोना कमजोरी है 
मेरे आंसूं मेरी बेवकूफी है,
मेरी कमजोरी है
फिर भी,
मैं हर बार रोती हूँ।

जब रोऊँ उनके लिए 
तो वो 'इमोशन' होता है 
जब रोऊँ उनकी बातों पे 
तो, 'इमोशनल फूल' होता है। 

मैं जब रोऊँ अपने लिए 
तो, 'बेवकूफ' हो जाती हूँ।
जब न समझ पाऊं 
उनकी चालक बातें 
तब रोने पे 
'कन्फ्यूज्ड' कहलाती हूँ। 

मैं 'लड़की' हूँ 
इसलिए 'अक्सर' रोना
'आदत' होती है मेरी। 
'फेमिनिस्ट' वाले टैग से 
अब आफत होती है मेरी। 
फिर भी, 
मैं हर बार रोती हूँ। 
शायद, 
मुझे रोना अच्छा लगता होगा। 
बुरी आदत में रहना अच्छा लगता होगा।  

'लड़की' हूँ 
इसलिए 'माफ़' है,
वरना इतने आराम से 
खुले आम
ये कह न पाती 
मुझे रोना अच्छा लगता होगा।



मैं हारना चाहती थी

मैं हारना चाहती थी।
ठोकर खा के,
थक हार कर गिरना चाहती थी।
पता था हारने का,
न जीतने का,
fail होने का,
पास न होने का रिजल्ट क्या होगा।
पर ना जाने क्या देखना चाहती थी।

ये जान भी तब पायी
जब सब मुझे हारा हुआ कहने लगे
शायद मैं उनके लिए ही हारना चाहती थी
पता था वो छोड़ के भी ना छोड़  पाएंगे मुझे
इसी टूटे जुड़े कच्चे धागो से
खुद को रेतना चाहती थी।

सब पता है
फिर भी
हर दिन
गिर रही हूँ मैं।
मैं उनके झुकने का सबब चाहती थी।
क्या हक़ मुझे
उनको रुलाने का?
मैं तो बस
अपने होने का फरक चाहती थी।
मैं हारना चाहती थी।




Wednesday, 20 May 2015

आपसे मिलने का टाइम नहीं बन प् रहा है इस बीच। एक बात बतानी है आपको .... इस काम से फुरसत ले कर होती हूँ रुबरु आपस...जल्द ही।
कुछ नए पेज मेरी डायरी के..सिर्फ आपके लिए।
खुश रहिये...मुस्कुराते रहिये।

Monday, 11 May 2015

तारा

मैं कल ट्रेन से सफ़र कर रही थी.… खिड़की से रात में बाहर नज़र दौड़ाई जब हल्का सा पर्दा हटा कर तो मुझे अचानक दौड़ते अँधेरे में जुगनू जैसे चमक जला कर भाग जा रही थी,जब घरो में जलने वाली लाइट्स दौड़ती ट्रेन से टकरा रही थी।  ये तारे से लग रहे थे। तभी ख्याल आया कि जैसे हम अपने आँगन में लेट खाट पे तारे गिन गिन बचपन बिताये है, ऐसे ही ऊपर रहने वाले भी झांकते होंगे तो उन्हें ये लाइट्स तारे लगते होंगे। जैसे हमे यहाँ से लगता है। क्या पता हम जिसे तारा समझते है उनका क्या हो? जैसे उनका तारा हमारी सच्चाई है। यही उहापोह है आपके लिए भी.....

जब वो झांकते होंगे अपने आँगन से
दीखते होंगे उनको जुगनू
हर घर आँगन में
कुछ जलते कुछ बुझते
ये जुगनू तारे है उनके
अँधेरी गलियों में टिम टिम करते सपने है ये

क्या मेरा तारा भी उनका कुछ होगा
टूटता हुआ तारा उनका भी कुछ होगा
मेरी मुरादों में क्या छुपा कोई डर होगा
क्या उनका कोई दर्द होगा

उनका तारा मेरी सच्चाई है
जलती आग की एक सलाई है
मेरा तारा उनकी क्या कोई लगाई है

कुछ ठंठा सा लगता होगा
जब चलती होगी पवन चक्की
डर जाते होंगे वो ये सोच
बदल कड़कते होंगे जब उनके घर
जब गिरते है गोले
बजती है बंदूके ISIS की

हमारे त्योहारों में वो झांक झांक देखते होंगे
उनके बच्चे भी आने को रोते होंगे
सुनामी तो उनका करतब होगा
उनके पानी वाले बादल के टक्कर का होगा
अपनी भी इज़्ज़त होगी इनके आँगन में

पर.....
ये सोच मज़ा आ जाता है
ये सोच अच्छा लग जाता है
की वो झाक झाँक देखते होंगे
अपने आँगन से
जुगनू मेंरे आँगन के
जलते बुझते जुगनू
उनके तारे मेरे आँगन में।

आज समझ पायी
 कि तारे रात में ही क्यों दिखते है हमें
ये जुगनू रात में ही क्यों टिमटिमाते है।





Sunday, 3 May 2015

मरने के बाद तलाक नहीं ले सकते उससे 
आज मेरा हिसाब का दिन आया है। 

बेवक़्त बात नहीं कर सकते उससे 
खोखली हो गयी वो 
आज मेरा बोलने का दिन आया है। 

इन्सान से गैरियत हैवानियत नहीं मांगते 
ये उसका हुनर नहीं 
आज मेरा इन्साफ करने का दिन आया है। 

मरने के बाद तलाक नहीं ले सकते उससे 
आज मेरा रोना समझ आया है। 
आज मेरा दिन आया है। 

Sunday, 12 April 2015

Kehna Chahti Hu...: माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!  

Kehna Chahti Hu...: माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!   :

 माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!
SAVE THE GIRL CHILD!


आज हलचल थी, तू कुछ घबरायी सी थी
ऐसा पहली दफा हुआ क्या,
मुझसे झूठ न बोल,
क्यों तू मुझे सुनकर कुछ शरमाई सी थी
वो भी खुश न थे,
क्या हुआ तू कुछ घबरायी सी थी,
मैं तेरा हिस्सा हूँ 
तेरे खून  से बना तेरा एक हिस्सा हूँ। 

आज उन्होंने मुझे देखा था, है ना.… 
पर क्यों उदासी छाई सी थी,
बोल ना माँ… तू क्यूँ  घबरायी सी थी,
जिसे तूने माँ कहा, वो मुझे देख खुश ना थी 
था उनके गोद में एक बच्चा 
उसे देख वो भरमाई सी थी,

वो जो तेरे साथ थे हरदम 
कल तक मुस्कुराकर  तुझे पुचकारते थे 
आज मुझे देख उन्होंने नज़रे कुछ चुराई सी थी 
वो भी खुश न थे, किस्मत से उन्हें कुछ रुसवाई सी थी।  

आज तू रो क्यूँ रही ?
अच्छा नहीं पूछती, पर सुन ना माँ,
रो ले जितना है रोना, 
मैं तेरी  खुशियाँ बन के आऊँगी, बड़ा नाम कमाऊंगी। 

फिर डाक्टरनी जी आई है.… 
माँ, बोल न तू क्यूँ रो रही ?
क्यूँ तू इतनी घबरायी सी है ?
ये हलचल कैसी है ?
माँ ये दर्द क्यूँ उठा?
ये घुटन कैसी है?
माँ ये मुझे खींच क्यूँ रहा?
तू घबरायी सी क्यूँ है?

माँ,  ऐसे कैसे तेरी दुनिया में आ जाऊ ?
अभी तो मैं कम बनायीं सी हूँ। 

इनको बोल ज़रा, मुझे दर्द  हो रहा 
मुझे छोड़, तुझे दर्द हो रहा,
बोल ना अपने घरवालो से 
ऐसे गुमसुम सी सताई क्यूँ है?
बोल कि मैं तेरा हिस्सा हूँ 
माँ दुखता है जब तू रोती है 
आज तेरी आँखे कुम्हलाई क्यूँ है ?

मैं घुट रही हूँ, रोक न इन्हें 
मैं सिर्फ तेरा हिस्सा ही नहीं,
इन जैसे विकसित का आधार हूँ मैं। 
मैं एक खून का लोथड़ा ही नहीं,
तेरी इस सृष्टि का आधार हूँ मैं। 
बार-बार दर्द की आजमाइश का, 
लोगो की बेफिक्री का, 
अँधेरे में ज्योति जलाने वाला चिराग हूँ। 

चुप न रह, बोल दे आज,
वर्ना हर दिन तू रुलाई जाएगी 
औरत हो औरत को जनने पर सताई जाएगी। 



Wednesday, 8 April 2015

मुस्काती मादा

मुस्काती कुछ शरमाती
अद्भुद रंग दिखाती
मादकता फैलाती
प्रेम प्रपंच कराती
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

कोई संग प्रयास करे
कोई डंक आघात सहे
सुविचार समाप्त करे
कामुकता फैलाती
वो मुस्काती मादा।

सुर असुर कलंकित
नर जीवन संहार करे
मंथन का परिणाम
भूल न पश्चाताप करे
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

राजनीती में अस्त्र बनी
दुर्योधन का शस्त्र बनी
कान्हा का उपचार है वो
अर्जुन का संहार है वो
वो मुस्काती मादा।

सीता का स्वरुप वही
लज्जा ममता मान वही
स्त्री रूप सिंगार वही
कोमलता अभिमान वही
वो मुस्काती मादा।

कुलटा रूप स्वरूपिणी
पूतना तड़का डायन वो
अभद्र दूषित लक्षिणी
सर्व कुल विनाशिनी
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

माँ की ममता छाव वही
यशोदा देवकी नाम वही
गोपी रास लुभावन
कृष्णा मनभावन
वो मुस्काती मादा
हर कान्हा इठलाती
वो मुस्काती मादा।

चंडी काल कपाल वही
काली दुर्गा रूद्र वही
भीषण अग्नि ज्वाल वही
सृष्टि रचयिता शक्ति वही
शंकर की सती वही
वो मुस्काती मादा।
वो अद्भुद माँ की ममता
ईश्वर की पराकाष्ठा
वो मुस्काती मादा
हर मन पावन
वो मुस्काती मादा।


क्या पहुचती है तुझ तक मेरी साँसे
साँसों में उलझी मेरी बातें
बातों में जकड़ी तेरी यादें
यादों में खोयी मैं
क्या मैं पहुची हूँ तुझ तक ।

उस रात सा क्या फिर तू आएगा
अंधरो में स्याह रंग दिखायेगा
उजली बातों के पर्दो में
हीरा मुझे बताएगा
जो तेरे होने मे वजूद मेरा खोया है
क्या वो पंहुचा है तुझ तक ।

तेरे साथ होने में जो तुझसे दुरी है
उस दूरी में दम तोड़ती मेरी खुशियाँ
क्या वो लाशे
पहुची है तुझ तक।
तुझे पाने के लिए लगाये है कई बंधन
तू और वो खेले है खेल मुझ संग
इनमे हर दिन रोती मेरी आँखे
क्या वो आँखों की थकावट
पहुची है तुझ तक।

नहीं चाहती जीना तुझ बिन
पर अब न तुझे चाहूँ
इन तड़प में मरती
मेरी हँसी
क्या वो अपराधी हँसी
पहुची है तुझ तक।

ज़िन्दगी जीने का मक़सद ढ़ुढ़ते हम दो
तय कर लिया तूने
अलग राह चलने का
मुझे छोड़ कही
क्या उस राह पे लगी चोट के पत्थर
तुझ तक पहुचे है

दे दे सुकून...सुन कर मुझ को
क्या मेरी कोई दुहाई पहुची है।
क्या मेरी मौत तुझ तक पहुची है
तेरा हो के बिना तेरे जीना
क्या वो आह तुझ तक पहुची है
क्या मेरी मौत तुझ तक पहुची है
वो हलचल बंद है
क्या बंद घडी की हलचल
तुझ तक पहुची है।

 'देसी' की मुस्कराहट में छिपी
क्या वो चीख तुझ तक पहुची है
उसकी नरम कलाई पे
तेरे हाथ के निशान
दीखते नही है अब
क्या वो तुझ तक पहुचे  है
कॉफ़ी का दाग लगा था उस दिन
वो छूट गया मुझसे
क्या वो भूरा रंग तुझ तक पंहुचा है।

इसे लिखते वक़्त
 तेरी यादों का बवंडर
घिर गयी मैं उसमे
दफ़्न होने को हूँ
क्या ये घुटन तुझ तक पहुची थी
कुछ आ के मुझे निकाल रहा
स्पर्श बताये की हाथ वो तू था
बता न क्या मैं तुझ तक पहुची हूं।
क्या सच मैं तुझ तक पहुची हूँ।
मैं उलझी सुलझी
क्या पहुची हूँ तुझ तक।

गर तू उलझे इसे सुन कर
समझ लेना मैं पहुची तुझ तक।

Friday, 3 April 2015

दस दिन की कहानी साल भर में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।
हसी खिलखिलाहट में
खिलखिलाहट गुदगुदाहट में
शर्माना आदत में
आदत शर्माने में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।

होठों से आँखों का सफर
बिस्तर की सिलवट में तब्दील हो गया
जब लड़ना और शर्माना एक साथ हो गया
ये मुलाकात जब आदतो में तब्दील हो गयी
घडी की सुइयों सा मिलना बिछड़ने में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती जब प्यार में तब्दील हो गयी।

जब यादों में साथ
साथ बातों में तब्दील हो गए
हर मोड़ का कोना
मिलने के अड्डो में तब्दील हो गए
ये कब हुआ कि
मैं कुछ तुम और तुम कुछ मैं में तब्दील हो गए
जब वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।

मेरी महक तेरी साँसों में तब्दील हो गयी
तेरी आँखे मेरी मुस्कराहट में तब्दील हो गयी
ज़िन्दगी के मक़सद में तेरी हाज़िरी
इस आरज़ू में एक काफ़िर की
बदसलूकी बंदगी में तब्दील हो गयी
जब दस दिन की दोस्ती साल भर के प्यार में तब्दील हो गयी।

आज अगले साल में फिर से दोस्ती में तब्दील हो गयी
इन तब्दीलियों में 'देसी' अपनी पहचान खोज रही
एक साल में 'देसी' 'गम्मो' में तब्दील हो गयी।


Friday, 27 March 2015

Jamoore...??? Naa Ustaad!!


Media se nahi phone pe baat karne se dar lagta hai saheb..!!
Ab tamasha dikhane wala ustaad bhi shaam ko hindi News channel dekhta hai ki kuch naya masala mil jaye to jamoore ko naye tareeke se trained kiya jaye. Rajneeti aaj kal shahrukh salmaan kareena se zyada TRP aur paisa dene lagi hai. Aur ho bhi kyu na...
Dilli sarkaar apni 5 varseeya film (49 days ke trailor k baad ki) me ekdam superheronuma entry ke sath pahle din se hi puri shiddat se film dikha rahi hai.. comedy, suspence, thrilr, romance, action, aur ab ye naya taza sting operation. film bore nhi hone de rahi.. Dilli walo ki pura vote wasool sarkaar in action. Bhai ab to serials bhi ban gaye hai party neta ke naam pe..haan naam ko thoda bigaad ke par saboot hai...Maflar. dekha to higa hi kabhi na kabhi Sab chaanel pe.

 Yahi hai rajneeti shayad. hum yuva to apne samne ek party ko paida hote aur bada hote dekh rakh rahe hai, jaan samajh rahe hai ise naya itihaas likhta dekh ki haan aisi hi hai rajneeti...
....Yogendra ji aapse ek baat puchna chahte hai..aap itne meedhe kaise rah lete hai? melody ya cadbrry ka kamaal hai ya kuch aur... ? Aapko to gussa hi nahi aata. Aap gussa control mechanism pe ek do kitaab kyu nhi likh dete. waqai, Aap diplomacy ki paribhasha ke baad ka sateek udaharan hai. Aapki kabliyat ki jitni badi prashanshak hun...apke shaant rahne ki utni badi prashndharak bhi. kabhi apni jamat me shamil karne ka dil kare to ye hum sabse bhi share kare. chaliye, kam se kam log ab wi-fi ke baare me puchna chor diye honge par haan updates k chakkar me apne phone me internet pack zarur dalwa lijiyega. Ye Umesh bhai intzaar kar rahe the kya world Cup khatam hone ka...Kal India ke haarte hi aaj inhone bhi chauka maar diya...is ball se koi out hoga ya chakka lagega ye to ane wala waqt batayega...akhir ye rajneeti hai.

Tadka lag gya hai. Ravish kumar ji Prime Time se gayab logo ko Laprek ke zariye shahar ne hona samjha rahe hai aur log samjh nhi pa rahe hai ki janades me gadbadi hui ya mausam hu kharab chal raha hai. In sab me aaj Atal ji ko Ratna milne se unk bisre geet fir se TV pe baj gaye aur Modi ji jameen adhyadesh pe fir se ad gaye. Dilli rajdhani hai aur nayi naveli party ke bharosemand neta ki uljhan me jawaan hoti dilli ki dhadkano pe pressure badh raha hai. wi-fi na sahi par phone me ye recording wale system ka to kuch kar hi dijiye CM saheb! Ab to aap bhi lapete me aa gaye.

Bhai ab to naturopathy bhi kaam nhi aa rahi... fir se kah rahe Yogendra Yadav ki spaecial classes le ke dekha jaye..bahot kaam gar hogi...kam se kam sting operation ke dank se bach hi jayenge. chala dijiye wo kya karte hai aap sab..hash tag##***:%@&@-@ twitter pe...trending ### fr kuch na kuch to jugaad ban hi jayega aur Anushka Sharma ko bhi thodi rahat mil jayegi. Aakhir, twitter hi to aaj kal sab sambhal raha hai.

Tuesday, 24 March 2015

मुस्कराहट का वज़न कम कर दिया मैंने,
हसने का हर्जाना बड़ा महंगा पड़ा दोस्तों। 

जीने में थोड़ी उदासी बढ़ा दी मैंने,
खुश हो के जीना ज़िन्दगी को महंगा पड़ा दोस्तों। 

अब तरकीब नहीं सुझाते उसे बेहतरी की,
उसका सुर्ख हो जाना मेरा मर्ज़ बना दोस्तों। 

साँसे भारी हो कर पीते है अब,
पहली नज़रो से हल्की साँसों का मिलना धड़कनो पे भारी पड़ा दोस्तों।


कि अब दरवाज़ों पे कुण्डी डाल दी मैंने,
खुली आँखों से बेपर्दा आना बड़ा महंगा पड़ा दोस्तो।
कि  वो आएंगे इस इंतज़ार में कई दफे लुटना पड़ा दोस्तों।

Monday, 16 March 2015

Use n Through Romance..!!

Use n Through pen k sath sath ab market me kai tarah ki cheezen aa gayi hai use n through wali. China ki den hai aur humari meharbani. Khair, ab use n through romance aur use n through pyaar ka chalan badh gaya hai aaj kal. shikaari shikaar dhoondte rhte hai. lamba chalne wale khatedaar hai to sambhal ke thoda. kahi use kr k fenk na uthiye market me. accha, aaj kal ye dar nahi rah gaya ki fr koi puchega nahi...use n through se usage capacity bhi badhi hai. Ab agar dubara use nahi hona chahte ho to market me chaukanne rahe. consumer court thodi nasaaz hai abhi is mamle me. isme CHINA ko dosh mat dijiyega. Waise bhi Hindustani dil hai hi ishq mizaaj, kya kariyega.

  Hum aaj kal Nawaabo k shahar me dera jamaye hue hai...LUCKNOW. shahar me ghuste hi swagat me likha milta hai "Muskuraiye aap Lucknow me hai"...aur ghuste hi raah chalte log khte hai "hasi to fasi". aise mahaul me sambhalna thoda mushkil hai. ye permanent wala tag lagi dukaan bhi ab dhokha dene lagi hai, puri gaurantee nahi de pati...haan bhai, achaa aap samjhe nahi, arrey bhai shadi-vivaah ..Aaj kal ye mamle bhi zyada kaargar sabit nahi ho pa rhe hai. mamla gambhir hota ja rha hai. hum zyada bolenge to puchna shuru ho jayega ki arrey apko bhi koi use n through ke mamle me fasa gaya kya? Aadatan, dusro se aise sawal puchne me maza jo ata hai. Arrey huzoor, market me ab brands ki kami nahi hai. apne hisaab se chunte jaiye. Sale wale me thoda sambhaliyega. used hua to fr bhi ganimat, defaulted piece nikal gaya to dikkat ho jati hai. 

 Jab baat choice ki ho rahi hai to ek baat zehan me aati hai. Hum zindagi bhar apni pasand ka dost, pyaar, sathi pane ke chakkar me na jane kitna trail kar lete hai.  Aur na milne par kuch log kitni dafe market se hi muh mod lete hai. par kya kabhi socha hai, jahan hume ye zindagi naseeb hoti hai, jinse hoti hai, aur jinke sath hoti hai, wo humari pasand ke honge ya nahi ye humse koi nhi puchta. bas hume milte hai kuch log maa baap bhai behan pariwaar k naam par aur  maze ki baat to ye ki humari zindagi ka sabse imp part bina humari pasand ke milta hai. shayad tabhi hum zindagi bhar isi khunnas me apni pasand ke liye ladte rahte hai. shukr hai, kapde aur samaan ek jaise kai sare bante hai. ye bhi insaano jaise hote to inke liye bhi rishte laye jate. Thali ke liye Katori, Chakla ke liye belan, sofa k liye table, bed ke liye bedding, AC ke liye Heater, pani ke liye Bijli....sabka standard hota. Thali bolti apni dost se katori ko dekh, haaye kitna glu molu hai. mere sath kitna jachega na ye. chota hai to kya hua main isko apne yahan adjust kr lungi. Rishta na hone par katori gussa k bolta hai, hai hi kya tu. koi curve nhi, puri flat hai. Aaj kal curve ka zamana hai, main plate ke sath ji lunga. par tujh ghamandi ke paas dubara kabhi na aaunga. ohho hhoo..boring ho gaya. pr Hum insaan bhi aise hi double triple ho jaye to thodi museebte kam ho jaye shayad. AB clones banne lage hai, kuch din me insaan bhi banne shuru ho hi jayenge.

   Waise acha hai. kuch na kuch naya hote rahna chahiye. experience ki kadr hoti hai...use n through ke chalan se kai log experienced hote ja rahe hai...Romence me...Love shove k mamle  me. 

Muskurate Rahiye, Pyaar Karte rahiye, Aate rahiye...
:-)

Sunday, 8 March 2015

कुछ लिखिए ज़रा! खुद का रेप होना कैसा लगता है?

Women's studies की स्टूडेंट होने के कारण और अपना एक ब्लॉग पेज होने के कारण कई लोगों ने  मुझसे कहा, अरे आपने आज कुछ लिखा नहीं? आप निर्भया पे कुछ क्यों नहीं लिखती? एक आम लड़की क्या सोचती है इसके बारे में? यार, कुछ लिखो  आज ? विमेंस डे है आज?और तुम वो क्या वीमेन वाला सब्जेक्ट पढ़ती हो? मेरे बताने पर, हाँ हाँ वही विमेंस स्टडीज। एक्सप्लेन करते हुए अपनी सफाई में एक जवाब तुरंत आता है,अब  इसे कोई पढ़ता नहीं ज़्यादा तो नाम भी याद नहीं रहता। फेमिनिस्ट हो, कुछ लिखो यार तडकता भडकता।मैं फेमिनिस्ट हूँ, मैं ये नहीं मानती। क्युकी अभी तो मैं फेमिनिस्ट होता है या होती है, यही जानने की कोशिश में हूँ। विमेंस स्टडीज स्टूडेंट होने के नाते बाई डिफ़ॉल्ट फेमिनिस्ट का ठप्पा लगाने में लोग बिलकुल देर नहीं करते।

 ऐसा लगा जैसे डिमांड में है आज कल लिखना और लिखा हुआ पढ़ना औरतों के बारे में।  वैसे ही BBC की नयी नवेली फेमस डॉक्यूमेंट्री ने RAPE को होली में थोडा रंगीन बना दिया BAN हो कर, वो भी आधा आधा।  YOU TUBE पे सब दीखता है। BBC ने वैसे बॉलीवुड को कॉपी कर अपनी डॉक्यूमेंट्री को उसके मुकाम तक पंहुचा दिया। जहाँ इस डॉक्यूमेंट्री पर लोग बिना इसे देखे ही इसके बारे में लिख दे रहे है।  पॉजिटिव नेगेटिव न्यूट्रल तर्क वितर्क, आलोचना, समालोचना। आप चाहते है कि आज इस "गुलाबी रंग" से रंगे इस दिन में मैं बिना किसी रंग से रंगे  आंसू का हिसाब लिखू? इस गुलाबी दिन पे मैं उसके लाल बेवजह पर अपनी वजह लिए बहते खून की माप लिखू? लिखू की मैं क्या महसूस करती हूँ जब सोचती हूँ की "उसके" साथ ऐसा कुछ हुआ होगा? या कुछ बेहतर पढ़ने के इच्छुक पाठक के लिए मैं फील करू दर्द क्या लगेगा एक लड़की को जब उसका RAPE हो रहा होगा। … और क्या कि अगर वो मैं होऊ? मुझे ऐसा लिखता पढ़ बहुत से मेरे करीबी अच्छा नही महसूस कर रहे होंगे।  माफ़ी चाहती हूँ। माहौल को अच्छा करते है। चलिए इसे उस नज़रिये से देखते है जिस नज़रिये के साथ मुझे इस विषयी पर ब्लॉग लिखने का आग्रह किया गया था।  कि मैं एक  महिला होने के नाते उन बिन्दुओ को उजागर कर बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकती हूँ, जो एक महिला ही फील कर सकती है। मुझे नेगेटिव नही होना चाहिए क्युकी मैं आपको नेगेटिव नै करना चाहती। आखिर में मैं आप मिडिल क्लास ही तो इंडिया गेट पर बैठने वाला है। जब मैं खुद के बारे में ऐसा लिखू या बोलू तो मुझे लगता है कि मेरे करीब लोगो को यह पढ़ कर अच्छा नहीं लगेगा।  तो ज़रा सोचिये 'उसे' उस दिन/रात /दोपहर में कैसा लगा होगा? बिलकुल सही, मैं कुछ नया नही पूछ रही। न कुछ नया बोल रही।  मैं बात भी किसी नए विषय पर नहीं कर रही। RAPE की न्यूज़ देख हम बस थोड़ा कम चौंकते है जितना हम आज कल  ISIS की रोज़ सर कलम करते फोटोज को देख कर होते है। यह हमारा कल्चर बनता जा रहा है।  मैं यहाँ बिलकुल नही बोलने वाली कि एक आम मामूली सी लड़की क्या सोचती है बलात्कार के बारे में। मुझे नही फर्क पड़ता कि उस डॉक्यूमेंट्री में उस आदमी ने क्या कहा? क्युकी वो तो यही कहेगा न।  इसे इतना चौकाने वाली कौन सी बात है? अगर वो दिमागी तौर पर स्वस्थ होता तो वो उस दिन ऐसी घिनौनी हरकत करता? हाँ, हैरानी इस बात की है कि  वो अपनी गलती कुबूल नही कर रहा। तो ठीक है , सजा दीजिये उन्हें। आप पुरुष वर्ग हम महिलाओं का ध्यान रख्ह्ना चाहते है। बहुत सुन्दर विचार। हम भी वही करते आ रहे है जन्मो से। पर आपसे हो नहीं पा रहा शायद।

मैं जब बाहर निकलती हूँ तो मुझे खुद पर भरोसा होता है अपना काम कर लेने का। मेरे परिवार वालो को मजबूरी में भरोसा और धीरे धीरे उगता एहसास होता है कि अभी तक कुछ न हुआ, शायद आगे भी कुछ न होगा। इस बीच में मुझे कोई इस बात से परेशान करें कि सब ठीक है पर परेशानी आपके लड़की होने में है। क्यों की कुछ लोग मानते है कि लड़की को एक तय सीमा में काम करना चाहिए। आपको बता दूँ ये LIBERAL लोगो की विचार धारा है जो अपने घर की औरतों को बाहर भेजते है। CONSERVATIVEऔर ORTHODOX तो भेजते ही नहीं है। आजकल  orthodox liberal भी आ गए है मार्किट में। मैं वैसा ही महसूस करती हूँ जैसे किसी के बैडरूम में बन्दर घुस के नाचने लगे और सारा सामान तहस नहस कर दे। जो आपको फील होगा उससे कही ज़्यादा बुरा लगता है। बहुत सी परेशानी है मुझे आपके रवैये से जिसे आप समाज के रूल बुक में शामिल कर मानने को कहते है। मुझे नहीं बात करनी की क्या हर दिन हर घर की महिला को compulsory and born to be a women वाली कैटगोरी में रख उनसे कुछ बातें नेचुरली एक्सपेक्ट की जाती है। सुबेज उठकर वे चाय बनाये। मर्द केवल वीकली बना दे तो वाह वाह जी। आप लकी है कि  ऐसा साथी मिला है। वो रोज़ खाना बनाये। क्यों? क्युकी वो औरत है। वो माँ है। वो देवी है। वो ममता का भण्डार है।सच में? खैर,वो आप रोज़ देखते है अब उसे क्वेश्चन करना शुरू करिये न कि लेख पढ़ के और लिख के खिसक लीजिये। इस के लिए हमारे पुरुष साथियो को काम करना होगा वैसे ही जैसे वो आसानी से करती है हर दिन। मैं नाराज़ हूँ क्युकी बहुत कुछ है जो औरतों को बदलना होगा खुद में। तभी कुछ बेहतर हो पायेगा।
कुछ सवाल है आपसे। क्या हक़ है आपको हमारे होने पे सवाल उठाने का? क्युकी आप के भाई बंधू  खुद पर CONTROL नही कर पाते। क्या हक़ है आपको हमे अपनी इज़्ज़त बता घर में छुपाने का? क्युकी आप अपनी प्रजाति की कमियां  छुपा सके। क्या हक़ है आपको हमे  घूरते रहने का? येही जानना है न कैसा लगता है हमे उस वक़्त? अंदर तक नफरत होती है हर लड़के से और दुःख होता है मैं ऐसे ही किसी लड़के की बहन बेटी या बीवी हूँ। फिर भी हर दिन खुद को समझहा कर हम प्यार करते है आपसे। नफरत होती है इस दो मुहे समाज से। आँखे नोचने का नही, उन पर थूक कर उनकी औकात बताने का मन करता है। क्या हक़ है आपको हमारे कपडे फाड़ने का? क्या हक़ है आपको हमे कपडे पहनाने का?  हम सक्षम है। हमे साथ चाहिए। जैसे आप अपनी महिला साथी से चाहते है।
हम RAPE नही करने लगते। हम में ये अच्छी बात है, आप भी सीख लीजिये इन्हे। न सीखने का हर्जाना हम नही भरेंगे अब। सिर्फ इसलिए कि मैं एक लड़की हूँ इसलिए मुझे जज किया जायेगा। ये कही से भी वाजिब नहीं। बहहुत गुस्सा है इन बातो को लेकर। मैं आपसे किसी से नफरत नही कर रही पर मैं धमकी भी देने की स्तिथि में नही हूँ।किसे दूँ, इस प्रजाति में कुछ अपने है, कुछ गलत नहीं है। हमारी प्रजाति में कुछ अपने नही है और कुछ गलत है। मुझे दोनों से नफरत है। मैं वादा और दावा दोनों करती हूँ कि बदलाव आ रहा है और आएगा। एक तस्वीर बनाने में चलिए मदद करे जहाँ कभी कोई लड़की गुलाबी पलकों से खून के आंसूं नहीं रोये सिर्फ इसलिए क्युकी वो एक लड़की है।

बहुत कुछ कहना है..... अगला पोस्ट जल्द ही
"मैं विमेंस स्टडीज की छात्रा हूँ"

हैप्पी वीमेन डे !!
जल्द ही वो दिन आये जब इसे मनाने का मौका न ढूढ़ना पड़े.…   

Friday, 20 February 2015

१०० रूपए का आधार कार्ड


photo courtesy: Google images


आधार कार्ड क्या है, क्यों है, किसलिए बनाना ज़रूरी है, अब ये बताने की ज़रूरत नहीं है किसी को। पर बनता कैसे है, आज भी ये सवाल है।  १०० रुपये का आधारकार्ड.... मिल रहा है।  हम खुद बनवाए है अपना अभी पिछले हफ्ते। ऐसा मेरे छोटे भाई ने मुझे ये समझाते हुए बताया की क्यों  परेशान हो रही हूँ। बाजार में एक कमरा है छोटा सा चौराहे के कोने में।  वही एक आदमी बैठता है।  १०० रुपये दो और रसीद ले लो। यहाँ मैं एक बात स्पष्ट कर दूँ कि  रसीद आधार कार्ड बन जाने की पुष्टि की एक पावती है कि फला व्यक्ति का कार्ड बन गया। और इसमें आपकी फोटो और सारी  जानकारी छपी प्राप्त होगी। यह पावती आधार कार्ड के मिलने तक उसके स्थान पर प्रयोग में लाया जाता है। और इस प्रिंटआउट में किसी प्रकार के पैसा या चार्जेज लेने का वर्णन नहीं दीखता है।   खैर, छोटा भाई आगे की रेट लिस्ट बताते हुए कहता है, बनने को तो २० में भी बन जायेगा पर वो तीन दिन बाद रसीद देता है।  थोड़ा रिस्की है दीदी।  मनो मेरी बात, चलो कल तुम्हारा आधारकार्ड तुरंत बनवा देता हूँ, वो भी अच्छी फोटो वाला।  तभी एक काका आये. अधेड़ उम्र के है। गाँव में घर से कुछ दूरी पर रहते है।  हमारी बात सुन रहे थे तो छोटे भाई की बेवकूफी भरी बातें सुन गुस्से को रोक न पाये। और हमारे पास आ गये. उसे गुस्से में लताड़ते हुए बोले, पागल वागल हो क्या? तुम लोगो को कुछ पता तो रहता नहीं है।  बस बाप माई का पैसा उड़ाओ। १०० रूपया देकर ये आधार कार्ड बनवाए है, तनिक देख लो इन्हे।  अरे बकलोल, वही गाँव के पीछे एक आदमी पचास में बनाता है। एकदम सही और रसीद भी कुछ घंटा बाद दे देता है।  मज़ाक उड़ाते हुए बोले बताओ बाप नेता है और बेटवा १०० में अधार कार्ड बनवा रहा है।  अरे तुम्हारा तो फ्री में हो जाना चाहिए।  छोटा भाई अपनी बेवकूफी और ५० रूपये के नुक्सान को समझते हुए बुझे मन से बोला, तो क्या करते ? मेरा पहले फ्री ही बना था।  सरकारी लोग जब आये थे।  पर वो आया ही नहीं।  तो दुबारा बनाने की लिया बोला हम को। चौराहे पे बना रहा था तो हम चले गए।  काका खुद की जानकारी पे मूछ ऐंठते चले गए, छोटा भाई ५० रुपये के लिए दुखी हो रहा था और मैं इन लोगो को सुन कर और देख कर shocked थी।
तब तक घर के और लोग आ गए और आस पास वाले भी।  शाम का वक़्त था, बैठक बाजी का समय. और आज टॉपिक पहले ही मिल गया था।  आधार कार्ड वो भी १०० रुपये का। ५० रुपये के नुकसान के साथ।  मैंने चौंक कर कहा भैया ये फ्री में मिलता है। इसका कोई पैसा नही लगता। ये पहचान पत्र है आपका। आपका अधिकार है। सरकार की ड्यूटी है।  इसके पैसा लेना गलत है। मेरा इतना सीधा बोलना वह बैठे सभी बड़े लोगो कई जांनकारी पे प्रश्न करना सा हो गया। बोले हम जानते है। बेवकूफ नहीं है हम सब।  पर क्या करे? कितने सारे लोगो का कार्ड आया ही नहीं। इन सब में तुम बहुत पीछे हो अभी। हर बात पे आँख- भौ सिकुड़ने लगती है। १०० रुपए देना ज़्यादा असान है।  कौन दौड़े रोज़ DM और सरकारी अफसरों के दफ्तर में? सुनते है ये सब? अपना धंधा पानी छोड़ आदमी ये करेगा तो खायेगा क्या ? कार्ड बनाना ही केवल काम नहीं है, बिटिया।  हम मानते है तुम सही कह रही हो। पर इतना सवाल करोगी तो कभी आगे नहीं बढ़ पाओगी।  इन्ही सब में रह जाओगी। पढ़ तो ली तुम पर बहुत पीछे हो भाई अभी तुम।  मैंने आखिर में इतना कहा कि कल जो आधार कार्ड का शिविर लग रहा है उसमे पैसे नहीं लिए जायेंगे। सब मेरी बात मान गए।

इस पूरी बात चीत में क्या सही, क्या गलत का फैसला करने का जिम्मा मैंने नहीं लिया।  पर हाँ, गलती कहाँ है ये जाना ज़रूरी है।  आधार कार्ड बनाने का ठेका लोकल, 18+, computer, और १२वी पढ़े हुए युवको द्वारा कराया जा रहा है।  एक अच्छा तरीका है लोकल skilled labor को utilize करने का। अब ये लोग २० रूपए लेते है जहाँ लोकल नेता थोड़ा ईमान दार है और मैक्सिमम १०० तो है ही मार्किट रेट।  जो सरासर गलत है। ठीक, हम अपना काम धंधा छोड़ कर रोज़ दफतरों के चक्कर नहीं काट सकते। पे क्या हम एक कागज़ पर लिख कर दस्तखत कर  एप्लीकेशन नहीं डाल सकते की इतना सारे लोगो का कार्ड नहीं आया है? फिर से शिविर लगवाया जाये।  या फिर पैसा नहीं दिया जाये।  और अगर हम ऐसा करते है तो सरकार को या अफसरों को बेईमान कैसे कह सकते है हम। जो हमसे पैसे ले रहे है वो हमारे बीच के ही नेवयुवक है,कोई सरकारी मुलाज़िम नहीं।  सरकार awareness  के लिए टेलीविज़न रेडियो न्यूज़ पेपर हर जगह advertisement दे रही है। फिर भी हम इन पहलुओं से अछूते है। क्या अब पहले की तरह नगाड़े पर सुचना दी जाये गाँव के हर चौराहे पे। आज मैं सरकार की नीतियों और उन के execution and implementation की कमियों से नहीं बल्कि हमारे आप में  भ्रष्टाचार के प्रति आ रही असंवेदनशीलता से दुखी हूँ।  भ्रष्टाचार हमारा culture बनता जा रहा है।

अगर इसे पीछे होना कहते है तो आपकी परिभाषा के हिसाब से मैं पीछे हूँ। पर मैं सवाल करुँगी और उसका जवाब भी खोज निकालूंगी।  जो बीमारी नयी जनरेशन को लग रही है इसके बाद सरकार से पहले खुद में संशोधन करने की ज़रूरत है। आज १०० रपये का पहचान पत्र मिल रहा है, १०,००० म डिग्र्री और २ लाख में  D लेवल की नौकरी।  ये तो है  corruption सबसे निचले स्तर पर। और उपर तो हर काम करने का अलग से खर्च लगता है।, जिसे इज़्ज़त से "service tax" कहते है सरकारी बाबू लोग। और जो इससे ऐतराज़  करे उसे सनकी  और बेवकूफ कहते है।  दिल्ली में जनतंत्र के नए उदहारण से और इस जनादेश से कम  से कम तर्क वितर्क में तो ये "सनकी" लोग औरों को चुप करने लगे है।  आगे देखिये क्या क्या होता है इन MAKE IN INDIA कल्चर में।आसार तो अच्छे नहीं है, ये कह कर कुछ नहीं होगा।  आसार बनाने होंगे। तो कछु  करियेगा भी या बस चाय पीते पीते सरकार को गरियेगा ही। politically incorrect language ज़्यादा appeal करती है आज कल लोगो को।






Wednesday, 11 February 2015

dilli voters to Tsunami hi le aaye....sab beh gye is bahaav me. Main is beech jab delhi me thi to aaye din auto wale, rikshaw wale, sabji, fal wale bhaiya logon se(didi log mili nhi) se unk vote ke baare me baat karti thi. is class ka pura rujhan jhadoo ke liye tha par BJP ki middle class me pakad aur Modi sarkar ki economic aur foreign policy ka asar is election me ek deciding factor lag rha tha. par chaliye ji, accha hi hai...janadesh ka samman karna chahiye. pichli saal isi samay se shuru hua silsila fr se ek naye aayam se shuru ho raha hai...AAP k sath ab puri picture dekhne ka tym is Valentine se shuru kr rhe hai Kejriwal... chaliye dil walon ke shahar ko pyaar k din apni daastan likhne chale apne bandhuon ko badhai aur best wishes. democracy ka ek example kahiye ya janta ki beawaaz lathi, jisme zor bahot hai...ya buzurgo ka buzurg parties ko shraap...ye batane ka kaam pahle se hi media kr rhi hai. Hum aap din bhar unki khabron aur khabron me aa rhe unk vicharon se apne vichar banate rahe hai.. aur isi baat ka dar is baar bhi tha is election me. par kya hua jo dilli ki janta har khabar ko peeche chhodte AAP ke ummeed se bhi zyada unko de gyi ek aitihasik jeet. yeh bhi tay hai ki dilli ne is baar vote apna gussa ya apesha dikhane ka liye nahi kiya hai balki 67% dilli wasiyon ne rajneetik satta ek kisi ko hata kar kisi ki aur ko saupane ke uddeshya se kiya. Yogendra yadav ji ne bataya ek channel ko ki ek do baar south aur sikkim me aisi jeet hui hai...par aaj k sameekaran me dilli me ye jeet na sirf aitihasik hai balki chaukane wali bhi hai. par ek taraf jahan votes ke counting k result bahot jhatke wale hai wahi BJP ki pichli kai jeeton pe sawal nahi khade kar pa rhi hai. ye chinta to hai par iske baad BJP apni ran niti hi badle iski naubat nahi aayi shayad. aisa 84 me bhi hau tha jb BJP ko kewal do saansad mile the..aur tab ke neta Atal ji, Advani ji ne puri strategy hi badal dali thi...aur use criticise bhi kiya gaya tha. par aaj BJP jis stithi me hai...pichle kai chinav result ko dekhte hue..usse us ran niti ki safalta ka andaaja lag jata hai. dilli ki rajneeti alag hai...dusre states se alag. jahan jaat paat..dharm..k naam pr voters polarize nahi kiya ja sakta.

ye jeet jahn BJP ke liye jhatka..Congress ke liye basant ki chutti..aur dusri party ke liye leave without payment hai. wahi AAP ke liye pareeksha ki ghanti. kai saare vaade, dusro se alag hone ka raag suna ke AAP ne apna mauka fr se pa liya aur usk liye unhe badhayi par ab ise wo kaise pura krte hai ise na sirf virodhi dekhna chahenge balki aam aadmi iska inspection tabiyat se karega. kyu ki ye Aam Aadmi(ki) Party hai jahan filhaal abhi tak sabki pahuch hai.
 Ek baat aur...Kejriwal ko Dilli ka naya CM khne k phle is baat pe gaur farmaya jaye ki Kejriwal to jaise49 din ki shadi k baad jahgda kr wapas chali gayi biwi ko mana laye ho...aur is baar to wo bhar k dahej bhi layi hai. jiski ummeed dulhe ko na thi. bas beech me kai logo ne haath pair mara pr dulhan bhi wafadaar nikli. ye baat electronic media me baithe programing heads ko click nhi hui shayad,otherwise ispe adhe ek ghante ka program to ban hi jata. shayad bana ho,mujhse miss ho gya ho. aaj kal waisw bhi log news channels me movie banane ki aadhi training le lete hai news bana kar. khair, media ki creativity se door chalte hai air apne mudde pe aate hai. Dilli ki 67%janta k janadesh ki izzat karte hue Main puri ummeed karti hun ki dilli ke hone wale  CM apne banaye hue rooprekha pr chalenge aur dilli ko naya rukh dene me safal rahenge.
 Nayi aur mazedar baat ye hai ki AAP "naya" krne ki shuruat kr chuki hai...wo 3 MLAs k sath BJP ko opposition me dekhna chahti hai. ab Lok Sabha aur Rajdhani ki Vidhan sabha ke charcha se kuch ho na ho...chai ki bikri badhne k sath sath Lok Sabha ki rating aur channels se competition krne ki stithi me to zarur aa jayegi.

Saturday, 7 February 2015

technically, AAP bhi videos aur slogans k mamle me humare desh ki buddhajiwi aur buzurg catagory me aa rhi parties se peeche nahi hai. waise to humara vote political party se narajagi jatane ka ek tareeka hai aur kisi naye se umeed janate ka aujaar. pahle se ye ki aap ummeed pe khare nahi utare to rejection aur naye ya dusre se ki aap se ummeedein hai humare bhale ki. to chaliye aapko hi mauka de kr dekhte hai.

AAP ne bhi apni party ka acronym soch ke rakha hai...itni der me hi maine na jane kitni baar 'aap' ka jikr kar diya. main Kejriwal ko jeetate dwkhna chahti hun dilli me. Kejriwal kyu? Kejriwal diili ko "Modi" lahje me ummeed dene me safal hue hai..dilli ko lagta hai ki wo aur sabse kuch alag karenge. ye bharosa ki wo alag kar sakte hai se karenge me tabdeel kiya unke 49 days ke karyakaal ne. jiske baare me unhone aadhi janta ko pahade jaisa rata diya hai baar baar bol ke. Hai kuch jo hum chahte hai aur dilli ko de sakte hai. Is baare me main kuch nahi bolungi. Media ke through aap sab tak ye baatein 24*7 pahuchti rahti hai, is bahas ke bahar ki wo kitni factually correct hoti hai aur kitni banayi jati hai apne vested interest me. 
Par main jab bhi Ravish kumar ka Blog( Nai sadak..main follow karti hun)ya Prime Time(NDTV) padhti aur dekhti hun to mere aur dilli k tammam logon ke is sir udhate vishwaas ko ek zor ka jhapad padta hai. ek vishwaas jaga hai shayad kuch accha ho, shayad kuch behtar ho. yr bharosa AAPke 49/days ke trailor se jaga hai..ab hum puri picture dekhna chahte hai.

Aapne silsila shuru kr diya hai ab dekhte hai anjaam-e-ulfat kya hoga.

policeghar

Aisa mera ghar hai
koi na hasta aata
jb bhi aaye koi sandesa
dukh khabar hi sunata

kabhi kahi kuch chuta unka
kabhi loot koi jaata
kabhi lootati kamai uski
kabhi ijjat paani ganwata
har koi rote rote aata
khota muh hi lata

aisa mera ghar hai
koi na hasta aata

na sansadiya bhasha
na vyavhaar
har kisi ki majboori
chahe katil ya munsafdaar

shakti hai milti bharmaar
nibhaye hum bhi sare daromdar
kathin parishram kiya bahot
fir bhi pat hua siyaar
waise to koi bulaye na
to kar lete nashta udhaar
aise ghar me bhi
hum haste barambaar

aise mera ghar hai
koi na aata dene hasi udhaar
takleefo me sathi unke
tyoharo me rakhwale hum
khushiyon me nazar ka teeka
kismat ke kamwale hum
kuch kamjoori humari hai
raahi ki majbiori nyaari hai
har baat ka kuch tod hai
paisa lena ab shayaf jod hai


kahte ab ghar wale
kisko le kisko de
sab majboori wale hai
de ke hum bhi aaye hai
ab hum hi lene wale hai


ghar mera hasta hai
in gunaaho k beech me
saikadon me hum do rakshak hai
in ghar walo ke beech me
aise me ghar ki takat samjho
tum bhi apna kartab samjho
hum danda nhi uthayeng
bin baat barish ki aafat samjho


aisa mera ghar hai
aisa mera ghar hai

Friday, 6 February 2015

ranjishe hi sahi dil dukhane ke liye aa....
courtesy: Youtube





Wednesday, 4 February 2015

तमन्ना की "दो मिलीमीटर वाली हसी" और उस्ताद का "दस ग्राम प्यार" बड़ा यूनीक  है यार।  तमन्ना का वो "छोटा प्रेम" और उस्ताद का "जमूरे" से प्यार बड़ा यूनिक है यार। तमन्ना का कमरे में पड़े बिस्तर के कोने में बैठ खिलखिला के हसना और उस्ताद का हर पल में हसी खोज लेना यूनिक है यार। तमन्ना "मेरी पगली" और उस्ताद की "मैं पगली"
.… ये बड़ा यूनिक है यार। 

Sunday, 1 February 2015

फिर से आया वो 'जिन्न'...

थी  कुछ उलझी
कुछ सुलझी सी 
मिलता न जवाब कुछ पूछ के 
चलने लगी थी 
यूं ही सब कुछ मान के 
करने लगी थी पूरे अपने कुछ वादे 
कुछ अनकहे 
कुछ समझे से 
फिर आ गया 'जिन्न'
मुझे तोड़ने 
बहरूपिया निकला वो 
पहले प्यार से 
फिर दुलार के 
खिला दी वो हसी 
जो गयी थी उसके जाने से 
इस डर के साथ 
कि वो है तो एक जिन्न 
अपना वादा निभाने आया है 
कौन किसे रौंदता है इस बार
ये देखने और दिखाने आया है।  

था वो मेरा जिंन्न 
मेरे टूटने से दर्द था उसे 
पर वो इस बार जीतने आया था 
मुझे हरा कर खुद हारने आया था 
क्या हुआ नही पता 
इस बार वो बिखरा सा था कुछ 
पिछली मुलाकात के साथ के कुछ निशान थे 
वो दर्द थे उसके शायद 
उसी का हिसाब चुकाने आया था 
था वो  मेरा जिन्न 
मुझे हराने और मुझसे हारने आया था 

इस बार मैं और उलझी 
अपने सुलझे अंदाज़ में 
और वो छोड़ गया 
फिर से मुझे उसके इंतज़ार में। 

यह  मेरे एक पुराने ब्लॉग से जुड़ा एक तार है ,,,,इसकी पकड़ इस लिंक से जुडी है http://kahnachahtihu.blogspot.in/2013/11/blog-post_23.html

धन्यवाद 


Friday, 30 January 2015



हूँ असहाय खड़ी शब्दों के लिए 
किससे तेरा सत्कार करूँ 
कैसे तेरा सत्कार करूँ।

इस वीडियो में कैद भाव कर्नल राय की बहादुरी की छवि दिखाते है जो किसी भी शब्द के मोहताज नहीं। ये छोटी सी बिटिया उस छवि की पराकाष्ठा है। सलाम करती हूँ इस जज़्बे को। 
और मुझे इस बात का बेहद गर्व है कि मैं ऐसे ही एक परिवार का हिस्सा हूँ। 
जय हिन्द  जय हिन्द  जय हिन्द। 


Daughter of late Col MN Rai shouts "2/9 GR ho ki hoina" at his funeral...
it is the way of GR battalions saying "ki jay" as in "2/9GR ki jay"... Literally means "Is 2/9bi GR THERE or not THERE ?" stressing on THERE... This is usually invoked 3 times followed by a"Hunu hi padcha" which means "hona hi chahiye" or "of course... We are THERE "

**Above information is given by Maj. Amit Mishra. 

Friday, 23 January 2015

"I'm selfish, impatient and a little insecure. I make mistakes, I am out of control and at times hard to handle. But if you can't handle me at my worst, then you sure as hell don't deserve me at my best."

sounds interesting..kar do taaj poshi samne wale ki apni kamiyaan gina k...aur fr pucho ulfat sahne ko taiyaar hai ya nahi. agar nahi to wo "deserve" nahi karta. ;-)
nayaab to nahi par haan baehtareen andaaz hai apni pahchaan bata ashiq ko samjhane ka ki main aur bgi behtar hun...

Tuesday, 13 January 2015

GAANTH....FIR SAANTH GAANTH


Hamla karte hai ji bhaiya
karte hai ...karwate hai
kuch bhi kah lo
hum to yahi samjh pate hai
kuch log jala gye ghar humara
kuch log ukhaad gaye jhanda wo purana
jo leke hum tahla krte bapu k peeche
gali gali kunba kunba

jalne me sirf makaan na the
sirf bejubaan aujaar na the
jinse maa ne humko pala
bapu ne humko pet bhar khilaya
sirf  bejubaan janwar hi na the
jo bandhi ghanti baja rahe the
malik ko hi bula rhe the
nasamjh ye samjh na paye
sirf jalne me makaan na the
jala tha malik 
malik sa har koi
us sa dil...sapna..asha..mamta
viswash jala...ullaas jala

wo to aise hi jalate hai bhaiya
hamla karte hai ji bhaiya

pahle kya krte the wo 
nahi pata
itihaas bahot padha
par sadha nahi
abhinay me charitra kiya
par jiya nahi
aaj jala hai mera ghar
aise hi jalate hai wo bhaiya
humara bhi dekho 
jala gye wo bhaiya

pucha kaun hai ye?
aur kaun the wo?
kitabo me bhi yahi hai
ya koi aur the wo?

subeh hui to gaadi aayi
dher samaan khane ko layi
paani ka hamla
to hawai jahaj bhi aaya
aadmi ka hamla to 
road bahot kaam aaya
tabhi to kahte hai
road to sahi se banao bhaiya

mere yahan bhi gaadi aayi
police aayi wakil bhi aaye
neta aur patkar bhi aye
sab dukhi the

hum soche..
inka bhi ghar jal gya kya bhaiya?
humare yahan ye kyu aaye hai
na pahchaan na koi mulakat
humein kyu gale se lagaye hai
kyu ye puche.." kaisa lag rha hai aapko"?
kyu ye police ki chuakasi ab bhaiya
ghar to wo jala gaye bhaiya

pata chala ye rakshak hai
der ho gayi aane me 
nahi to jalta nhi ghar apna
ye sab harjaana hai uska
khana pani aur ye rahna

hum to khush ho gye bhaiya
aise hi karte hai bhaiya
hun ro k bole
aise hi ghar jalate hai bhaiya
wo bole ab nhi jalega ghar kisi ka
nahi marega ab tum me koi
vada kar k chale gaye

hum bhi tasalli se zindagi ka 
kuch jugaad dekhenge bhaiya

wo chalte hi...sab le gaye
gadi..police..wakil...patrakar
sab to sab...khana bhi 
khair, iska choro
jiska sab jal jaye...uska duje ki bheekh me kya samaay
hum to rote rahe bhaiya
aise hi ghar jalate hai bhaiya

nayi jagah naya shahar
log naye...pahchaan nayi
is baar naya dar...usse pahchaan nayi
fir jala aaj kisi ka ghar bhaiya
fir se wahi baat 
bheed wahi
bheed ki jaat nayi
naya chehra...par baat wahi
jala naya kuch...par ehsaas wahi
gaadi samaan khaana pahalwan
aur to aur aansu pochne ka aujaar wahi
vada wahi...vada khilafi bhi wahi
nayi to bas jahah thi
aur mari hui wo lash nayi

ab to kuch na kahna hai bhaiya
wo jalate to aise hi hai
par ye bujhane aate bhi aise hi hai
wo darate aise hi hai
ye uksate bhi aise hi hai

in dono me kuch saanth gaanth hai bhaiya
pata kar lo..jarur hai bhaiya
nahi to kaun apna ghar baar baar jalwata hai
aur fr rone chala aata hai
kuch saanth gaanth to hai bhaiya