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Sunday, 12 April 2015

Kehna Chahti Hu...: माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!  

Kehna Chahti Hu...: माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!   :

 माँ... मैं तेरा हिस्सा हूँ!!!
SAVE THE GIRL CHILD!


आज हलचल थी, तू कुछ घबरायी सी थी
ऐसा पहली दफा हुआ क्या,
मुझसे झूठ न बोल,
क्यों तू मुझे सुनकर कुछ शरमाई सी थी
वो भी खुश न थे,
क्या हुआ तू कुछ घबरायी सी थी,
मैं तेरा हिस्सा हूँ 
तेरे खून  से बना तेरा एक हिस्सा हूँ। 

आज उन्होंने मुझे देखा था, है ना.… 
पर क्यों उदासी छाई सी थी,
बोल ना माँ… तू क्यूँ  घबरायी सी थी,
जिसे तूने माँ कहा, वो मुझे देख खुश ना थी 
था उनके गोद में एक बच्चा 
उसे देख वो भरमाई सी थी,

वो जो तेरे साथ थे हरदम 
कल तक मुस्कुराकर  तुझे पुचकारते थे 
आज मुझे देख उन्होंने नज़रे कुछ चुराई सी थी 
वो भी खुश न थे, किस्मत से उन्हें कुछ रुसवाई सी थी।  

आज तू रो क्यूँ रही ?
अच्छा नहीं पूछती, पर सुन ना माँ,
रो ले जितना है रोना, 
मैं तेरी  खुशियाँ बन के आऊँगी, बड़ा नाम कमाऊंगी। 

फिर डाक्टरनी जी आई है.… 
माँ, बोल न तू क्यूँ रो रही ?
क्यूँ तू इतनी घबरायी सी है ?
ये हलचल कैसी है ?
माँ ये दर्द क्यूँ उठा?
ये घुटन कैसी है?
माँ ये मुझे खींच क्यूँ रहा?
तू घबरायी सी क्यूँ है?

माँ,  ऐसे कैसे तेरी दुनिया में आ जाऊ ?
अभी तो मैं कम बनायीं सी हूँ। 

इनको बोल ज़रा, मुझे दर्द  हो रहा 
मुझे छोड़, तुझे दर्द हो रहा,
बोल ना अपने घरवालो से 
ऐसे गुमसुम सी सताई क्यूँ है?
बोल कि मैं तेरा हिस्सा हूँ 
माँ दुखता है जब तू रोती है 
आज तेरी आँखे कुम्हलाई क्यूँ है ?

मैं घुट रही हूँ, रोक न इन्हें 
मैं सिर्फ तेरा हिस्सा ही नहीं,
इन जैसे विकसित का आधार हूँ मैं। 
मैं एक खून का लोथड़ा ही नहीं,
तेरी इस सृष्टि का आधार हूँ मैं। 
बार-बार दर्द की आजमाइश का, 
लोगो की बेफिक्री का, 
अँधेरे में ज्योति जलाने वाला चिराग हूँ। 

चुप न रह, बोल दे आज,
वर्ना हर दिन तू रुलाई जाएगी 
औरत हो औरत को जनने पर सताई जाएगी। 



Wednesday, 8 April 2015

मुस्काती मादा

मुस्काती कुछ शरमाती
अद्भुद रंग दिखाती
मादकता फैलाती
प्रेम प्रपंच कराती
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

कोई संग प्रयास करे
कोई डंक आघात सहे
सुविचार समाप्त करे
कामुकता फैलाती
वो मुस्काती मादा।

सुर असुर कलंकित
नर जीवन संहार करे
मंथन का परिणाम
भूल न पश्चाताप करे
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

राजनीती में अस्त्र बनी
दुर्योधन का शस्त्र बनी
कान्हा का उपचार है वो
अर्जुन का संहार है वो
वो मुस्काती मादा।

सीता का स्वरुप वही
लज्जा ममता मान वही
स्त्री रूप सिंगार वही
कोमलता अभिमान वही
वो मुस्काती मादा।

कुलटा रूप स्वरूपिणी
पूतना तड़का डायन वो
अभद्र दूषित लक्षिणी
सर्व कुल विनाशिनी
वो मुस्काती मादा
हर नर इठलाती
वो मुस्काती मादा।

माँ की ममता छाव वही
यशोदा देवकी नाम वही
गोपी रास लुभावन
कृष्णा मनभावन
वो मुस्काती मादा
हर कान्हा इठलाती
वो मुस्काती मादा।

चंडी काल कपाल वही
काली दुर्गा रूद्र वही
भीषण अग्नि ज्वाल वही
सृष्टि रचयिता शक्ति वही
शंकर की सती वही
वो मुस्काती मादा।
वो अद्भुद माँ की ममता
ईश्वर की पराकाष्ठा
वो मुस्काती मादा
हर मन पावन
वो मुस्काती मादा।


क्या पहुचती है तुझ तक मेरी साँसे
साँसों में उलझी मेरी बातें
बातों में जकड़ी तेरी यादें
यादों में खोयी मैं
क्या मैं पहुची हूँ तुझ तक ।

उस रात सा क्या फिर तू आएगा
अंधरो में स्याह रंग दिखायेगा
उजली बातों के पर्दो में
हीरा मुझे बताएगा
जो तेरे होने मे वजूद मेरा खोया है
क्या वो पंहुचा है तुझ तक ।

तेरे साथ होने में जो तुझसे दुरी है
उस दूरी में दम तोड़ती मेरी खुशियाँ
क्या वो लाशे
पहुची है तुझ तक।
तुझे पाने के लिए लगाये है कई बंधन
तू और वो खेले है खेल मुझ संग
इनमे हर दिन रोती मेरी आँखे
क्या वो आँखों की थकावट
पहुची है तुझ तक।

नहीं चाहती जीना तुझ बिन
पर अब न तुझे चाहूँ
इन तड़प में मरती
मेरी हँसी
क्या वो अपराधी हँसी
पहुची है तुझ तक।

ज़िन्दगी जीने का मक़सद ढ़ुढ़ते हम दो
तय कर लिया तूने
अलग राह चलने का
मुझे छोड़ कही
क्या उस राह पे लगी चोट के पत्थर
तुझ तक पहुचे है

दे दे सुकून...सुन कर मुझ को
क्या मेरी कोई दुहाई पहुची है।
क्या मेरी मौत तुझ तक पहुची है
तेरा हो के बिना तेरे जीना
क्या वो आह तुझ तक पहुची है
क्या मेरी मौत तुझ तक पहुची है
वो हलचल बंद है
क्या बंद घडी की हलचल
तुझ तक पहुची है।

 'देसी' की मुस्कराहट में छिपी
क्या वो चीख तुझ तक पहुची है
उसकी नरम कलाई पे
तेरे हाथ के निशान
दीखते नही है अब
क्या वो तुझ तक पहुचे  है
कॉफ़ी का दाग लगा था उस दिन
वो छूट गया मुझसे
क्या वो भूरा रंग तुझ तक पंहुचा है।

इसे लिखते वक़्त
 तेरी यादों का बवंडर
घिर गयी मैं उसमे
दफ़्न होने को हूँ
क्या ये घुटन तुझ तक पहुची थी
कुछ आ के मुझे निकाल रहा
स्पर्श बताये की हाथ वो तू था
बता न क्या मैं तुझ तक पहुची हूं।
क्या सच मैं तुझ तक पहुची हूँ।
मैं उलझी सुलझी
क्या पहुची हूँ तुझ तक।

गर तू उलझे इसे सुन कर
समझ लेना मैं पहुची तुझ तक।

Friday, 3 April 2015

दस दिन की कहानी साल भर में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।
हसी खिलखिलाहट में
खिलखिलाहट गुदगुदाहट में
शर्माना आदत में
आदत शर्माने में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।

होठों से आँखों का सफर
बिस्तर की सिलवट में तब्दील हो गया
जब लड़ना और शर्माना एक साथ हो गया
ये मुलाकात जब आदतो में तब्दील हो गयी
घडी की सुइयों सा मिलना बिछड़ने में तब्दील हो गयी
वो दोस्ती जब प्यार में तब्दील हो गयी।

जब यादों में साथ
साथ बातों में तब्दील हो गए
हर मोड़ का कोना
मिलने के अड्डो में तब्दील हो गए
ये कब हुआ कि
मैं कुछ तुम और तुम कुछ मैं में तब्दील हो गए
जब वो दोस्ती प्यार में तब्दील हो गयी।

मेरी महक तेरी साँसों में तब्दील हो गयी
तेरी आँखे मेरी मुस्कराहट में तब्दील हो गयी
ज़िन्दगी के मक़सद में तेरी हाज़िरी
इस आरज़ू में एक काफ़िर की
बदसलूकी बंदगी में तब्दील हो गयी
जब दस दिन की दोस्ती साल भर के प्यार में तब्दील हो गयी।

आज अगले साल में फिर से दोस्ती में तब्दील हो गयी
इन तब्दीलियों में 'देसी' अपनी पहचान खोज रही
एक साल में 'देसी' 'गम्मो' में तब्दील हो गयी।