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Friday, 26 June 2015

बातें हमारी; हमारे बीच की 2

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं कहूँगी कि तुम याद आये
नहीं कहूँगी कि प्यार है तुमसे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं होगी अब ज़िद मिलने की
एक बार सीने से लगा के
प्यार करने की
पर तुम दूर नहीं जाओ।

नहीं होगी कोई ऐसी बातें
जो प्यार करने वाले करते होंगे
तुम कहते हो तो
ठीक है,
नहीं मांगती वादे तुमसे
ना कोई कस्मे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

रह सकती हूँ बिना तुमसे बोले
पर गुस्सा नही करो
चुप न हो जाओ
तुम दूर नही जाओ।

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

सच में, जीने की ज़रूरत में
नहीं मांगूगी अब बेवजह हिसाब
करुँगी पूरे काम
नहीं आउंगी तुम्हारे पास
पर तुम दूर नहीं जाओ।

अच्छा नहीं करुँगी
उँगलियों के बीच उंगलियाँ फसा के
हाथ की पकड़ से अपने प्यार की माप
नहीं करुँगी
कनखियों से तुझे देखने की कोशिश
की तभी पता चला था उस रोज़
कि तू भी देखा करता है यूं ही
नहीं मांगती तुमसे
साथ तुम्हारा
पर तुम दूर नही जाओ

मैं नहीं आउंगी पास तुम्हारे
पर तुम दूर नहीं जाओ।

Saturday, 13 June 2015

बातें हमारी ;हमारे बीच की

याद हैं जो तुमने पिछली बार चाभी का छल्ला मंगवाया था मुझसे
मेरे महंगे से छल्ले लाने पे
उस ढाबे के सामने चलते चलते ही डाटा था मुझे
की महंगा क्यों लायी थी मैं
उस डाट में तुमने
उसका पैसा भी नही दिया मुझको
मैं अब भी हर बार एक नया अच्छा छल्ला
तलाशती हूँ
पर मिला ही नही '
वो हम दोनों पसंद न था ज़्यादा
कुछ अच्छा पर सिंपल सा
दिखा ही नही
तसल्ली है की हर शाम जब घर आया करोगे
तो उसे देख मुझे याद करोगे
उसे मेज पे फेकने से पहले या बाद में
एक बार तो याद आएंगी मेरी
बस ऐसे ही मेज पे जगह चाहती हूँ।

आज मेरी चाभी का छल्ला खो गया है
क्या हम उस एक छल्ले में दो चाभी रख सकते है ?

एक बार रात में तुम्हे मना कर थक गयी थी
तुम्हारी मेज के कोने के पास
दरवाज़े और मेज के बाच की जगह में
मैं जा कर नीचे बैठ गयी थी
रो रही थी
कि  तुम मान ही नही रहे
अचानक एक हाथ जो बढ़ा मेरीओर
तुम बुला रहे थे
मुझे बित्तर में
टेबल लैंप की हलकी रौशनी में
सिर्फ आँखे नज़र आ रही थी दोनों की
आंसू भरे हुए
एक दूसरे को निहारती कि
कितना रुला दिया  हमने
माफ़ी मांगती एक दूसरे से  
पहली बार था शायद
मैं तुम्हरे पास बिना कुछ बोले
सो गयी थी
तुम्हरे कंधे पे सर रख के
अँधेरी रात में
वो पीली  रौशनी
पड़ रही थी दोनों पे
हल्का हल्का परछाई सा दिख रहे थे हम
बीच बीच में
आँखे खोल देख लेते थे तुम
कि  अब भी तो नही रो रही हूँ मैं
ऐसा मैंने भी कई दफे किया उस रात
प्यार होने लगा था
थोड़ा तुम्हे थोड़ा मुझे
एहसास होने लगा था।

मेज के कोने की जगह मेरी ही रहने देना। 

Sunday, 7 June 2015

मुझे रोना अच्छा लगता होगा

मुझे रोना अच्छा ही लगता होगा
तभी तो मैं हर बात पे रो देती हूँ, 
जो कड़वी होती है
जो चुभती  है
जो दिखती है कि गुस्से में निकली है
जो तकलीफ पहुचाती है
वो कहते है कि रोना कमजोरी है 
मेरे आंसूं मेरी बेवकूफी है,
मेरी कमजोरी है
फिर भी,
मैं हर बार रोती हूँ।

जब रोऊँ उनके लिए 
तो वो 'इमोशन' होता है 
जब रोऊँ उनकी बातों पे 
तो, 'इमोशनल फूल' होता है। 

मैं जब रोऊँ अपने लिए 
तो, 'बेवकूफ' हो जाती हूँ।
जब न समझ पाऊं 
उनकी चालक बातें 
तब रोने पे 
'कन्फ्यूज्ड' कहलाती हूँ। 

मैं 'लड़की' हूँ 
इसलिए 'अक्सर' रोना
'आदत' होती है मेरी। 
'फेमिनिस्ट' वाले टैग से 
अब आफत होती है मेरी। 
फिर भी, 
मैं हर बार रोती हूँ। 
शायद, 
मुझे रोना अच्छा लगता होगा। 
बुरी आदत में रहना अच्छा लगता होगा।  

'लड़की' हूँ 
इसलिए 'माफ़' है,
वरना इतने आराम से 
खुले आम
ये कह न पाती 
मुझे रोना अच्छा लगता होगा।



मैं हारना चाहती थी

मैं हारना चाहती थी।
ठोकर खा के,
थक हार कर गिरना चाहती थी।
पता था हारने का,
न जीतने का,
fail होने का,
पास न होने का रिजल्ट क्या होगा।
पर ना जाने क्या देखना चाहती थी।

ये जान भी तब पायी
जब सब मुझे हारा हुआ कहने लगे
शायद मैं उनके लिए ही हारना चाहती थी
पता था वो छोड़ के भी ना छोड़  पाएंगे मुझे
इसी टूटे जुड़े कच्चे धागो से
खुद को रेतना चाहती थी।

सब पता है
फिर भी
हर दिन
गिर रही हूँ मैं।
मैं उनके झुकने का सबब चाहती थी।
क्या हक़ मुझे
उनको रुलाने का?
मैं तो बस
अपने होने का फरक चाहती थी।
मैं हारना चाहती थी।