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Friday, 2 December 2016

क्या लिखूं जो सही हो

क्या लिखू जो सही हो
बन्दर बाट की कहानी
या चींटी की हाथी संग शैतानी
पिछली गर्मी में सियार का बकरी ले जाना
या साइकिल सहित 200 रूपये चोरी हो जाना
प्रियंका का ससुराल न जाना
नेता का पैसा खा जाना
शादी में फिर बिका है लड़का
नयी कहानी लिखती ममता अलका

या फिर करू बड़ी बड़ी बातें
सूखा बाढ़ की कहावतें
नए राज्य का नया शासन
अमरावती और लखनऊ का उदघाटन
चाचा भतीजे का झगड़ा
माँ बेटे का पकड़म पकड़ा
केजरीवाल का सस्तानामा
दिल्ली का धुंआ धुंआ हो जाना
ये सब तो हम कह ही सकते
फिर क्या है जो
बोलू सोचूँ
क्या लिखूं जो सही है

सब की रंगत लौटी है
भारत माँ भी भगवा ओढ़ी है
है विकास का नारा ये
एक प्रचारक ने इसे संभाला है
2014 से खबर बना रहे
इंडिया टॉपम टॉप रहा
130 पे अछा बिज़नस
जैम का कारोबार रहा
जियो की रैली निकली है
काले धन की इज़्ज़त उछली है
लाइन लगता देश दिखा
जो गलत कहे वो
देश का विरोधी बना
अब जन जन सैनिक भाव जगा
लाइन में लगे हर वीर जवान
ईमानदार बना

क्या कहे हो सच हो
लगे की सच हो
सुन के सच की बात उठे
न नेता प्रेमी बन जाऊं
न देश द्रोह का अपराध चढ़े
या फिर मैं असहाय करू इंतज़ार
मीडिया मुझे पढ़ाये तब तक
इनका कारोबार चले
हम वोट दे के
अपनी किस्मत इनके हाथ करे
चल बजरंगी नाच दिखाने
खेला बड़ा मसाला है
समझ न आये
कौन जमूरा कौन नाच नचाता है
धर पकड़ बदर मार गुलाटी
उस्ताद खुद ही फस सा जाता है
पैसा तो सब दोगे ही
मज़ा भी सबको आता है
इसे किसका क्या नुक्सान हुआ
समझे तो समझ आता है
वरना ये डेमोक्रेसी का खाता है
हिसाब तो चलता जाता है


Thursday, 13 October 2016

कुछ कटु है कुछ असंयम 
मधुभाषी भी तरकश में है
कौन सा तीर चलाऊ अब मैं
सामने युद्ध में लक्ष्मण भी है
विभीषण भी है।

Sunday, 25 September 2016

शक्ल पे आयतें लिखी है क्या? जो हर शब देखना जरुरी सा लगता है, वो धुप से अपनी बंद होती आखो को खुले रखने की कोशिश करते हुए पूछी। एक हाथ से धुप को रोकने की कोशिश में थी।
वो बन्दूक उठाये खड़ा हो गया उसके बगल आ कर...धूप रोकते हुए बोला, कुछ मोहब्बत होती ही ऐसी है
उसमे एक सुकून मिलता है। जब उसे बिस्तर में बिखरा सिमटा सा देखो या माशूक की तड़प उस सरहद पे देखो, हर वक़्त में।

वो मुस्कुरा उठा। और वो उसकी परछाई में खुद को लपेट, नज़रे नीचे झुका उसकी परछाई को अपनी उंगलियो से छूने लगी।

आज वो आँखे सीधे सूरज जो घूर रही है इस आस में कही फिर से उसका बन्दूक वाला जवान वापस आ जाये छाँव बन के।


Monday, 19 September 2016

उसने चुन लिया अपना रास्ता
बस जाते वक़्त कसकर हाथ पकड़ा था
जैसे जाने न देना चाहता हो
पर वो तो जाने से पहले की ज़िन्दगी थी
मैंने ही ज़िद कर ली थी मिलने की
पूछ बैठा अब मिल के क्या होगा
जवाब न दे पायी उसे तब
कि इसी पकड़ में खुद को मसलना चाहती थी
उसकी बाहों में खुद को गिरा के
उसे संभालना चाहती थी
एक बार वो हर बार वाला डर जीना चाहती थी
कि मुझे छोड़ के चला जायेगा एक दिन
आज वो दिन जीने आयी थी
खुद को उसमे एक आखिरी बार जगाने आयी थी
ये आखिरी क्या होता है
होता भी है या नहीं
इस आखिरी रात ये सौगात लेने आयी थी
तेरा तुझसे
मेरा तुझमे
एक हिस्सा चुराने आयी थी
कुछ रिश्ते दूर रहने से
बनते है
ये समझने आयी थी
खुद को क्या समझाऊँ
ये समझने आयी थी
तू आखिरी बार
मेरी आँखों में
वो सब देख ले
जो दिखाने आयी थी
एक आखिरी बार सच
तुझे करीब से देखने आयी थी

मैं कैसे रहूँ
तुम कैसे बढ़ो
आज कल जो करती हूँ
गलत हो जाता है
एक ही ज़िन्दगी में
क्या छोड़ू क्या रखू
अपने हर क्यूँ का क्या जवाब दूँ
तेरे जाने के बाद
ये समझने अब खुद के पास आयी हूँ।


पिंक पिंक जेल


फोटो कर्टसी:गूगल इमेजेज 
ये pink तो है पर feminist नहीं है। जी हां, पिंक या गुलाबी रंग हमेशा ही लड़कियों महिलाओं से जोड़ा जाता रहा है। एक बच्ची के पैदा होते ही उसकी दुनिया में एक रंग शामिल हो जाता है उससे बिना पूछे जाने समझे, वो है पिंक। गुलाबी रंग वैसे भी बड़ा मखमली होता है। प्यारा शांत मुस्कुराता सा एकदम लड़कियों जैसा। अच्छा जब लड़कियां लिखती हूँ तो लगता है महिलाएं छूट जा रही है। महिलाएं लिखू तो लड़कियां बुरा मान जायेगी। दोनों शब्दों में फर्क भी है । उनकी स्तिथि में भी और उनके दर्द में भी और उनकी परेशानियों में भी।एक लड़की की कहानी का नाम पिंक से अच्छा क्या ही जो सकता है। पर आज ये पिंक ही जेल बन गया है। या तो ये लड़किया पिंक से बाहर जाना चाह रही या फिर ब्लू रंग का असर इनपे चढ़ रहा है कुछ तो गलत किया है इन्होंने तभी तो मुस्कुराता सा रंग जेल में तब्दील हो इनके आंसू का कारण बन गया है। पर ये फेमिनिस्ट और फेमिनिज्म के बारे में नही है मैं ये आपको यकीन के साथ कह सकती हूँ। आप जाइये और देख के आइये। मुझे उतना पता नही पर एक सिल्क की साड़ी देखी है मैंने अपनी माँ को पहने हुए और अपनी महाराष्ट्रियन दोस्त को उसमे दो रंग एक साथ दिखता है। जब साडी को एक तरफ से देखो तो एक रंग और दूसरी तरफ से या हल्का इधर उधर होने पे दूसरा रंग। उसी साडी जैसा ये पिंक भी अपनें में कई रंग पिंक ब्लू रेड ब्लैक वाइट समाये है।
इस फिल्म की प्रमोशन में भी सब किरदार निभाने वाले कलाकारों ने कहा ये फिल्म लड़कियों के ऊपर है वो भी जो दिल्ली में रहती है। पर भरोसा रखिये अगर आपको लड़कियों के फेमिनिस्ट वाले मुद्दे से थोड़ी भी परेशानी है तो मैं बता दूं ये लड़कियों पे नहीं बल्कि हम और आप पे है। बिलकुल लगेगा कि 'शब्द मेरे है बस बोल ये रहे है' अब वो निर्भर करता है कि कौन सी लाइन पे आपको ये खयाल आता है। तालियां कई बार बजी हाल में पर वो किसी के करतब पर थी या अपनी जीत पे ये जानना थोड़ा मुश्किल हो जाता है आजकल की सूडो नेचर वाली जनता में।
ऐसे मुद्दों पर कई फिल्म बन चुकी जो इन मुद्दों को उठाई और बहस छेड़ना चाही। पर वो मुह के बल गिरी क्योंकि उनमे फेमिनिस्ट भाव ज़्यादा था। एंग्री इंडियन गोडेस्सेस, माफ़ी चाहूंगी अगर नाम गलत लिख रही हूँ तो, जैसी मूवी कब आयी और कब चली गयी पता ही नही चला। सुजीत सिरकार की ये पिक्चर हिंदी सिनेमा के father figure से ही आइना दिखवा रही है। बच्चन के बोलेने पे जब पोलियो चला गया तो क्या पता यहाँ भी कुछ बात बन जाये। ये एक समन्वय मतलब सिमीट्री दिखाने का भी प्रयास है दोनों वर्गों में जो आखिरी में सहगल साहब से महिला सिपाही हाथ मिला कर डायरेक्टर साबित करते दिखे है। उसे आप कैसे भी देख सकते है पर मुझे ये पॉइंट ज़्यादा पसंद आया। वर्ना पुलिस वाली सैलूट भी कर सकती थी इज़्ज़त में।  मैं किसी फिल्म का रिव्यु नही लिख रही इसलिए मुझे कहानी किरदार की बात नही छेड़नी। बस ये कहूँगी की ये फिल्म जा के देखिये। पिक्चर हॉल में इसलियेW क्योंकि तब पता चलता है कि आये कैसे थे और पिक्चर ख़तम हो के जब जा रहे तो क्या और कैसे है? ये फील हो रहा था कि काश सब ये देखे और हम नार्मल हो के चल सके। सिम्बोलिक इष्टब्लिश्मेन्ट बेहतरीन है इस पिक्चर का। बिना किसी बहस के एक बहस में 'ना' की परिभाषा समझा दी सहगल साहब ने। ये ना का मतलब क्या हम जानते है? बिना बहस इसलिए कहा क्योंकि ऐसे लगा आखिरी में कि बहुत सी बातें बतानी है कि लड़कियां ऐसी स्तिथि में गलत नही है। क्यों उनके चरित्र पे सवाल? ऐसी ऊल जलूल बातें क्यों? ये जो समाज का स्ट्रक्चर्ड आर्गनाइज्ड संघठन है जो एक तरफ़ा लड़कियों को गलत साबित करने में लग जाता है उनसे बहुत कुछ बोलना था। इस फिल्म में मुझे मेरे घर वाले यार दोस्त सब नज़र आ गए। आपको भी आएंगे । बिना कुछ बोले बस अंदर ही उन किरदारों से रूबरू हो लीजियेगा और अपना केस भी लगे हाथ इसी बहस में निपटा लिजियेगा। ये हमारे समाज को एक तमाचा है। उस सोच पर तमाचा है। जब मैं एक बार एक लड़के से दिन में पांच बार मिल ली इत्तफाकन तो उसके दोस्त ने कहा तुम लोग live in में क्यों नही रह लेते? ऐसी सोच को तमाचा है। जब कोई मुझे कहता है कि ब्लॉग लिखो पर ज़्यादा खुल के मत लिखो लोग तुम्हे जज करेंगे उनसे सवाल है औए मुझसे भी कि उनको बोलने क्यों दिया और अगर बोल भी दिया तो सुना क्यों मैंने? एक जवाब तो दो उनको।
सहगल साहब ने गर्ल्स सेफ्टी मैनुअल्स बताये है जो शहर की लड़कियों के लिए तो फिट है पर ये ग्रुप स्पेसिफिक है। गाँव की लड़की की ये परेशानी नहीं है। पर सलूशन वही है जो आखिरी में दीपक सहगल ने बताया है। ये पूरी फिल्म आपअपने हिसाब से समझ सकते है। राय रख सकते है पर इस फिल्म का आखिरी हिस्सा, जिसकी तरफ मेरे  एक दोस्त ने मेरा ध्यान केंद्रित किया, वो सोचने लायक है। सूरज की रौशनी में घर की बालकनी में खुले आसमान के छोटे से हिस्से से ख़ुद को ढके दो गज़ ज़मीन पे अपना आशियाना सजाने का ख्वाब लिए ये तीन लड़किया (सिंबॉलिक) जो अपने नार्मल लाइफस्टाइल की वजह से आज अपनी इज़्ज़त एक कमरे में गवा के , सरे आम कोर्ट में जीत के अपनी नौकरी यारीदोस्ती प्यार गवा के क्या सोच रही होगी?  वो आज दारू पी के नाच के पार्टी नहीं कर रही? रॉक शो में नही गयी? रो नही रही? हस नही रही? शॉपिंग नही कर रही? परेशान नही है और न ही मायूस  है। फिर क्या है इस आखिरी शॉट का मतलब? और हाँ,  एक बात गौरतलब है यहाँ वो पीछे नही आगे देख रही है।

मुझे मेरे एक पाठक मित्र हमेशा कहते है आप प्रेमचंद पढिये।अभी मौका तो नही लगा पर मैं हाल ही में उनकी कहानी के एक हिस्से से दो चार हुई। वो प्रेमचंद की पीड़ा सहती हुई सर्वोच्च स्थान प्राप्त अतिगुण संपन्नं नारी और सुजीत की इन questionable character वाली बोल्ड कॉंफिडेंट और स्मार्ट लड़कियों दोनों में ही फर्क कम नज़र आता है बस तब प्रेमचंद थे अब दिलीप सहगल है। तब भी सवाल थे निर्मला के अब सवाल है मीनल के। समझना तो पड़ेगा ही। पिंक का जेल बनना ज़रूरी है तभी रिहाई की गुंजाईश बनती है उनकी भी और हमारी भी।

Monday, 12 September 2016

बेनाम से ख्याल

इनकी आँखों के तले मश्वरा न हुआ होता
रात अँधेरी न होती तो काला क्या होता
जो नारंगी गोल गोल था दिन में ऊपर
वो सूरज न होता
तो क्या चाँद दिन का सितारा होता
गैरो की महफ़िल में सजाते रहे रंग
श्रृंगार के इतने प्रकार न होते
तो हँसने हँसाने का गुज़ारा क्या होता

किसी हाफ़िज़ से तालीम लेकर आये है
वर्ना कारीनों पे पाजेबो के जुमरूओं का  इशारा क्या होता
मोहब्बत आशिक़ी गर होती
इबादत मोहब्बत गर होती
इश्क़ का मजहब औ क़ुरान के पन्नो का नज़ारा क्या होता

Monday, 1 August 2016

एक पगलिया

वो एक पागल सी लड़की थी
प्रेमी को खोजा करती थी
किसी पत्ते को उठा
कान पे लगा कर तेज़ तेज़ चिल्ला
"हेल्लो" "हेल्लो" बोला करती थी
पूछती थी....
नदियां, पेड़, पहाड़ सब कैसे है
नया शब्द सुना 'मदर नेचर'....
वो मेरी जैसी है
या मॉडर्न लेडी है
पेड़ की डाल पकडे
यहाँ वहां काले कपडे डाले
पगलिया घूमा करती है
'पगलिया' गली के बच्चे
उसे कहकर हँसते है
वो गली के पीछे
पेड़ के पास जा
रोती है
दहाड़ मार के लिपटती है
फिर गुस्से में घूरती है पलट के बेखबर दुनिया को
जो उसे देख के
सुन के
पगलिया कहती है
वो बातें करती है
कब आएगा मेरा साथी
जो नदिया को सहलायेगा
पहाड़ो को हँसाएगा
पेड़ो को संभालेगा...
खेलेगा उनके संग
संभालेगा हर ज़ज़्बात
एक पागल आया है....
बच्चे उसके पीछे पर
दूर दूर
भाग के बोल रहे थे
पगलिया हेल्लो हेल्लो चिल्लाई
लाल कपड़ो में
पागल हँसा और बोला
पेड़ के पीछे से झांक के
नदियाँ खेल रही है....
पहाड़ों से लड़ रही है...
पेड़ झूम रहे है
जब मैं निकला था सब ऐसे था
अब भी ऐसे ही है...
पर वो खेल रही है इनके नियमों पे
लड़ती है पहाड़ो से कि
वो चुप खड़े क्यों है
पेड़ झूम झूम रोता है हर दिन
पगलिया रोने लगी... क्यों गया छोड़ के
वो लाल कपडे माटी में
लहरा के बोला
मैं जाता हूँ
आऊंगा फिर से मैं....
अब हरा जामा सिलवाउंगा...
तेरे लिए भी लाऊंगा
फिर ये हमे पागल पगलिया नहीं कहेंगे
रंग देख... तुझे ये 'मदर नेचर' का अंग कहेंगे
दोनों हसते रहे....फिर रोने लगे.... 


Saturday, 23 July 2016

डायरी


मैंने तुझे क्या छोड़ा
पूरी दुनिया ही राज़दार हो गयी

पनघट पे जो राधा गयी
सारी गोपियाँ बदनाम हो गयी
कान्हा ने तो माखन चखने को
रोका था सुन्दर नैनो वाली को
पर क्या करे, जो,
कमबख्त कांकरिया ही
मटकी पे ना, कमरिया पे वार कर गयी।

तू तो सुन के समझ के
चुपचाप साथ रहती थी
जब चाहा पढ़ा
उस हर बार तू निखरती थी

तेरा दामन क्या छोड़ा
पूरी चूनर ही दागदार हो गयी।

ये राज़दार दुनिया आज खोखली बातों को भी मोहताज हो गयी।





Saturday, 4 June 2016

Cliche

When life moves
from handloom to powerloom
affected my morning to night
sorrow to delight
pocket to suitcase
time to paper weight
'Talking' to message text
mother to baby sit
father to just a man to fit
society as a bark
handloom goes out
fading muslin, higher of linen
keeping hard for 'Indians' to survive
something mechanical
absolutely equal in time and price
'Power'loom is far from
Cliche of 'hand'loom, O Lord!

Thursday, 26 May 2016

पहली जनवरी

नए साल का नया दिवस
पहली जनवरी की सुबह सुहस
एक बैरक में बंद
दो आँखे झांक रही थी
कोई मिलने आया
ये संदेसा सुनने को ताक रही थी
रात में कोड़ो की बारिश थी शायद
बगल वाले बैरक में
मुस्कराहट कराह रही थी
कहते है पांच क़त्ल किया है
अपने बाप की मौत का बदला लिया है
जेल की सलाखों से
दो आँखे मैदान झाँक रही थी।

उसने देखा कदमो की
आलसी कदम ताल
जैसे अंधेरो में
उंगलियो का तुरपाई पे हाल
उसके पैरो की हलचल
काँपना बता रही थी
आँखे पैरो से तेज़ भाग रही थी
कोई आया है
ये संदेसा सुनने तो ताक रही थी।

एक बच्ची झोला टाँगे
बाहर नीले गेट पे
जेल के बड़े गेट पे
घर के लड्डू में ज़हर
नपवा रही थी
कोई आया है
यर सुन पैरो से तेज़
अंखिया भाग रही थी
"बिटिया आई है
रोना नही है"
"पापा आएंगे
रोना नही है"
दोनों ही अंखिया
ओस में डूबी दूब सी
मुस्कुरा रही है
दिल की धक् धक्
ऊ तेज़ उड़ती चिड़िया सी
दौड़ रही है
नया साल अच्छा हो
ऐसे बोल बिटिया पापा को
इक मीठी गुझिया खिला रही है
अच्छे नंबर लाना
खाकी वर्दी
बिटिया को सीख सिख रही है।
जाते जाते फिर से पूछ पड़ा कोई
कानूनी कागज़ तो नही पर
उनकी बतियाँ
पापा को बिना मुक़दमे
कातिल बता रही है
ये जेल की सलाखें
उनको एक मुजरिम बना रही है।





Sunday, 8 May 2016

माँ क्या है न कि कौन है?

माँ... ये शब्द खुद में एक संसार समेटे हुए है। एक लड़की एक औरत बनती है उम्र में बड़े होते हुए और एक पड़ाव पर माँ बनती है। लड़की से औरत होना उसकी उम्र या उसके विवाह से जोडा जा सकता है। पर एक लड़की या औरत का माँ बनना उसके अपने बच्चे से तय होता है। एक बच्चे का इस दुनिया में आना एक पूरी तय प्रोसेस है जिससे गुजरना होता है एक औरत को माँ बन्ने के लिए। पर मातृत्व का एहसास बिना किसी प्रॉसेस के भी हासिल किया जा सकता है। इसमें भी कुछ नियम कुछ कानून है। माँ असीम प्रेम करती है अपने बच्चे से। पर ये माँ का प्यार भी समाज की जंजीरो से बंधा हुआ है। शादी विवाह कर के अपने पति के साथ स्थापित संबन्ध के परिणामस्वरूप विकसित नया जीवन औरत को माँ और एक आदमी को पिता का दर्जा देता है।
माफ़ी चाहूंगी मैं थोडा इधर उधर जा सकती हूँ बातों में पर मुद्दा यही रहेगा इसी से जुड़ा हुआ। एक बात गौर तलब है  यदि यही बच्चा बनाये नियम सलीको से न हो तो बच्चा गैर कानूनी कहलाता है, नाजायज़ कहलाता है। नियम कानून तो उन दो आदमी औरत ने नही माने  फिर बच्चे पर तोहमद क्यों? वो फिर भी माँ बाप ही रहते है। ऐसे केस में बाप भी बच जाता है। माँ बनी औरत ही ताने सुनती है। 
तरीका वही होता है पर माँ की ममता को वो स्थान नही दिया जाता। बच्चा वैसे भी पैदा हो के दुनिया में पलता बढ़ता है पर उसे नार्मल तरीके से जीने नही मिलता। जीने नही दिया जाता। उसके लिए माँ की परिभाषा कुछ अन्य विशेषण के साथ समझायी जाती है। हमारे लिए जो सामाजिक तौर पे जायज़ है माँ और बच्चे उनके लिए माँ देवी है। पर वो जो इससे बाहर है उनके लिए ये इतना सुखद अनुभव नही हो पाता शायद। 
इसे क्या कहा जाये माँ की ममता का नाप तोल उसकी अपनी ममता से केवल नही बल्कि अन्य बहुत से पक्ष को ध्यान में रख के किया जाता है। माँ तो किसी भी चीज़ की मोहताज़ नही अपने बच्चे को प्यार करने के लियें पर मैंने न जाने कितनी बार इन माँओं को और इनकी ममता को घुटते देखा है। 
इस देवी को हारते देखा है। हमने बना तो दिया एक इंसान को देवी पर उसकी शक्ति उसके हाथ नही छोड़ी। मोथेर्स डे आते ही सोशल मीडिया पे बहुतेरे वीडियो, मेसेज आने लगे। डी पी बदलने लगी रात के बारह बजे के बाद। ऑनलाइन शौपिंग वालो के ऑफर्स पिछले हफ्ते से ही मोबाइल स्क्रीन पे पॉप अप करने लगे। वर्ना मुझे पता भी न चलता की 8 तारिख को क्या है? वीडियोस बताते है कि आपने कितने दिन से अपनी माँ से बात नही की। और वो आपके दादा बन कर आपको याद दिलाते है कि अपनी माँ से प्यार कर लो।
 माँ आज जब घर से बहार निकल कर काम करने वाली महत्वाकांक्षी औरत बन गयी है तब भी क्या उसकी ममता वैसी ही बरकार है। सुरक्षित है हमारे बीच। नही। समाज ने उसे बदला। समय के साथ उसके स्वरुप को बदला। और जब भी औरत थोडा सा भी उस दायरे से बहार गयी तो उसकी मातृत्व को भी प्रश्न किया। जैसे मोदी सरकार आज कल कुछ भी बोलती है तो लोग झट से पूछने लगे है कि दो साल क्या किया है पहले वो बताओ। वैसे ही एक माँ की सफलता उसकी ममता का एक ही हिसाब है की उसके बच्चे ने क्या किया पहले ये बताओ। वो कैसे बताये भला? जब वो छोटा सा बच्चा था तब वो माँ के साये से लिपटा रहता था। जब बड़ा होने लगा तो दुनिया में बाहर निकला जहाँ उसकी माँ को ही बहुत जाने नहीं मिला। ये उसके पिता का एरिया था असल में। वो जब जब वहां बिगड़ा माँ पे इल्जाम आया। और एक समय बाद वो इतना बाहर चला गया की सोशल मीडिया को याद दिलाना पड़ता है माँ के लिए कुछ करने को। उनसे बात करने उनके साथ खाना खाने के लिए। माँ का रोल है ही क्या फिर। बस डाइपर और स्कूल तक। और अगर माँ ने समाज के नियम नही माने और अकेले ही एक बच्चे की ज़िम्मेदारी ली तो उसकी मातृत्व पे सवाल कोई क्यों उठाता है। 
उसकी ममता निश्छल है तो मत बांधो जंज़ीरों में। और नही है तो उसे देवी बना सारा बोझ उस पर मत डालो। माँ.. मैं बड़ी हुई मेरी गलती का सबब मेरी माँ को भुगतना पड़ता है और मेरी हर सफलता की गुहार लगाने का जिम्मा मेरे पापा को जाता है। मेरी माँ एक कोने में मुस्कुरा के तसल्ली ले लेती है तब। ज़रूरी नही हर माँ ऐसी हो। कही कही पापा ऐसे होते है और माँ पापा जैसी होती है। वहां किसे क्या कहा जाये। एक सिंगल मदर को क्यों कम आँका जाये। माँ की ममता क्यों ही नापी जाये। हम अक्सर नापते  है। और हर बार उसकी ममता को सवालिया नज़रो से देख जाते जाने अंजाने में। 
माँ एक एहसास है एक इंसान नही। बदलते परिवेश में थोडा हम भी अपनी माँ को बदलता हुए देखे और खुद थोडा उनसे और नरमी से पेश आये। अपने किसी को प्यार करना और उसके गुस्सा के बावजूद सिर्फ उसी का ध्यान रखना बेहद मुश्किल होता है। और इसे माँ के बारे में बताने के लिए बिशेषता के लिए कुछ वाक्यो का गुच्छा कहे तो ज़्यादा नही होगा। माँ को परिभाषित करने के बजाय अगर सिर्फ एहसास करे तो वो सच मानिये हर दिन ख़ुशी से सोयेगी और माँ होने पर फक्र करेगी। 
मैं आजकल अपने आस पास कई सारी नयी मम्मीओ को देख रही हूँ। माँ की ममता सच मानिये किसी परिभाषा से नही चलती वो बस वो औरत होती है जो अपने जनी हुई जान को ज़िंदा रखना चाहती है एक इंसान जैसा। बस इसके आगे सब सामाजिक राजनितिक आर्थिक धार्मिक है माँ की ममता बस एहसास है। 
आप सभी को जो माँ बन चुकी है और जिनमे मातृत्व की भावना हो चाहे आदमी हो या औरत सभी को इस दिन की बधाई। 

Thursday, 5 May 2016

आखिरी बार एक मुलाकात


तोड़ दो सरे बंधन
खुद से नाराज़ हो लो
सिसकियों को तिजोरी में
रख छोड़ आओ
हँसी बाँध दो पेड़ की डाल में
कहना सबकुछ छिपा दो
एक अखबार में
लपेट लो अपनी अकड़न
टांग दो कही खूंटी में
छोड़ आना वो पिछला चिल्लाना भी
सब से पहले इस फ़ोन को
बंद कर आना अलमारी में
और रख आना कही वो
भागना मुझसे भी
हो सके तो ले आना
पहली मुलाकात की मुस्कराहट
मेरा सर सहलाना
और वो मन्मार्जियां गाना भी
वो रात की एक आहट
जो दबे पाँव थी आई
बुला लेना उसे भी
भरे दिन बाजार में
कई सारे नामो को
न्योता दिया है
तुम भी बुला लेना
जो मुझको बुला लेते थे यूँ आते जाते
कइयों का पता याद नही मुझको भी
अच्छा सुनो
कुछ गुस्सा चिढ भी उठा लाना
चुपके से
पूरा आ गए तो
मैं फिर कुछ न कह पाऊँगी
ले आना वो
सुबह में मुझे एक टक देखना
उन होठो आँखों की पोटली भी ले आना तुम
हाथ पकड़ने की कोशिश
भी आ जाने दो
और क्या क्या बताऊ
क्या ले आओगे
जो मिले न मिले सब समेटे आना तुम
कल की तारीख
तुम याद रख लेना बस
और खुद भी चले आना जी
कहते है,
जाने वाले को आखिरी सलाम पेश करना कल्चर का हिस्सा है अपने।
इन सब को ले के
चले आना तुम
एक बार देख के जाना तुम
पिछली कई दफे से आँखों तक नज़रे पहुच नही पायी तुम्हारी
इस बार मेरी आँखों पे नज़रे लगा जाना तुम
एक आखिरी सलाम ले जाना तुम
वो चाभी का छल्ला
वो कमरे का कोना
मेरी वो जगह
वो बाँहों का सिरहना
न देना इन्हें अब
किसी और को
गर देना तो
धुल के मिटा देना मुझको
मेरी यादों का पसीना
बड़ा दागदार है।
कहते है,
जाने वाले को उसकी पसंद का सामान
दे देते है
उसके संग जाने देते है
तुम मुझे मेरा प्यार
मेरे सपने
हँसी
वो कंधे की तकिया मेरी
वो मालिश का हिस्सा मेरा
बिन कहे सब समझने का किस्सा तेरा
तेरा रूठना
मान जाना मेरा
रूठते रूठते आज यूँ ये जाना तेरा
हारना और हार के टूट जाना मेरा
सब छोड जाना यही
मुझ संग जाने को
मैं सबसे प्यारी मुहबत
दान करती हूँ
तुझे इस दुनिया के हवाले करती हूँ।
बस तू ये दिन याद करना
एक बार मुझे देखने
आना ज़रूर ।


Sunday, 17 April 2016

Love Shots

Women's Studies makes you think about yourself and society

Women's Studies makes you think about yourself and society: Dr. Lakshmi Lingam is the Deputy Director of the Centre for Women's Studies, School of Social Sciences, Tata Institute of Social Sciences. Dr. Lakshmi did her PhD from IIT Bombay.

There are many friends who know very little about the subject Women's Studies. I consider their prejudices and disagreements with the subject as it is about 'Women'. why do i consider? because they are not aware of working area of the subject. Here is the thing, a note by a recognized person. So, spare some time and thoda gyan badhaiye....kya kijiyega janaab aaj kal bina auraton ke kaam nhi chalna. yes, i am talking officially and taking it professionally. Enjoy!

Saturday, 16 April 2016

धरती के सौतेले













ज़मी सूखी है,
मर रहा किसान है।
पानी कम है,
भूखा गुलाम है।
पानी देते इंद्र देव बने
टैंकर वाले
कनस्तर भरता पानी से 
जेबे भरते नोटों से
दोनों ही इसी माँ की संतान है।
ये ज़िन्दगी ऐसे क्यों बेहाल है।

एक कवि कहता
आस्मां हो गया क्या बेवफा
निकली ज़मी की जान है
आग उगले जा रहा 
ऐसी भी क्या बेरुखी सवार है
सूरज जल जल इसे जलाये है
धरती गुस्से से काँप जाये है
हर दिन अब आता भूकंप भरमार है

गलती किसकी है 
सुलटा लो जल्दी भाई
तुम दो के चक्कर में
फ़सी हमारी जान है।

कवि कितना पागल है
सोचे ये झगड़ा उनका है
जो खुद मर रहे हमारे तांडव से
मांगे उनसे अपने प्राण है। 
कोई समझाए जो इसको
गर हम इतने भोले होते
पेड़ न कटे होते इतने
पानी पानी सा न बहाया होता
सब छोडो, इतना बस देखो
आज जब मरते हमारे आधे जन
फिर भी
हम IPL से कमा रहे पहचान है।
कहते हम जनतंत्र है
जिसको पानी चाहिए 
वो जाये
हम तो अभी ग्रीन पिच कवर्ड
इंडिया की शान है। 
हमको ज़िन्दगी जीने का
सेक्युलर अधिकार है।

हर घर में नल
अंदर भी बाहर भी
ऐसी इनकी मांग है
आर ओ किनले रहीश हो रहे
बस पानी मिल जाये
कुछ की इतनी सी ही डिमांड है।
कवि तू क्यों माटी और आस्मां को
घूरे जाता
वो तो अलग हुए है
क्योंकि धरती पर
उसके सौतेलो का राज़ है।




Friday, 8 April 2016

सबसे बुरी बात थी हमारे बीच की
हम हमेशा 'मैं' और 'तुम' थे..
कभी भी 'हम' नहीं बन पाये
तुम हमेशा ' मैं' चाहते थे...'हम' नहीं
और मैं 'हम' में 'मैं' और 'तुम' खोजना चाहती थी।

सच है जब जब रोइ तेरे लिए तड़प के
तुझे पाने की चाहत में,
हर बार थोड़ी सी मरती गयी
आज ज़िंदा हूँ
पर 'देसी' कब चली गयी
तुझे पता ही नही चला
'गम्मो' को तू कब भूल गया
तुझे याद ही नहीं।

भागती रही कुछ पाने को
जो था मैं सब खोती रही
हारती रही
'तू' 'वो' सब कुछ चाहते थे
मैं भी चाहती थी कुछ
तेरी चाहत पाने में मैं अपना खोती रही
किसी को पता भी नहीं चला।

वहां आसमान में मेरा कुछ नही छूटा
मैं तो यही ज़मी में दफ़न होती रही।
आज खुद से रोकर चुप होने का हुनर सीख लिया
माँ का आँचल और तेरा सीने लगा कर दुलारना
पापा की थपकी, दीदी का सम्भलना
भाई का सर पकड़ के सब समझा देना
और खुद का इंसान होना
सब याद बनते देखती रही।

शायद मैं इस दुनिया के लायक नही
ज़्यादा प्यार चाहती हूँ।
अब खुद से बात कर के सवाल पूछ
जवाब चाहती हूँ।
ये सिलसिला कब शुरू हुआ
मुझे भी पता नही चला।

Saturday, 20 February 2016

Why is housework still a mother's job?


Today one of my teachers has shared this video on whatsapp group. I havent seen this advertisement before, because i do not have television here. Ab is smart phone k zamaane me wo kami kahlti bhi nahi. But television makes you watch advertisements....when you desperately wait for next segment of your fav serial or reality show or any news. Sports channels generally dont torture like other channels. Some advertisements are very good, worth watching not because of their products...ultimatly all the products are the best in the advertisements, but bcz they are disseminating some msgs, values thru their ads. Creative team of Ariel and surf excel have always done this, many others are doing so. This ad tells something to us.

 Why is housework still a mother's job? For many of us asking such question seems like we are questioning motherhood of our mothers, isn't it? Earlier, when i shared Men's world video on my blog, i was hesitant and felt ignorant as if i hav shared some nonsense. Bcz no one talked abt it fr so many days. Later on, my max frnds told me that they hav enjoyed it and aftr watching it they followed the whole series of Men's world. Its awesome...vry articulated..were the comments. Since then i learnt that its not about comments...sometimes people prefer action rathar than reaction.

There are many things which i can request you to pay attention to and if possible...learn. I have chosen this part..not because i am one of the sufferers but i am that gudiya who think that we should realize that 'gudiya' is not made for 'it'. I am a woman and that is the biggest reason. I love my brother, bcz we both understand each other's pain. I love my dad, he undrstands me, he feels sorry and now he has started helping my mother. In fact, last time when i was at home, he prepared tea for me and maa for the first time. I would love my husband, if both of us will put same efforts  for our home and life. That gudiya is very strong, she feels sorry for you that 'you' are so pampered. Even You cant take care of yourself. Plz grow up so that she can have some time for other things too. I know many male friends of mine who cook awesome and 100 times better than i do.
Things have changed a lot now male partners are supporting their female partners. But...yeah but is there.... still the fact remains the same what this ad talks about. Well, i spoke a lot, better you react and act now. Ye abhi facebook whatsapp pe khoob chayega..humpe bhi thoda khumaar chade ab inka to kuch maza aaye.

Tuesday, 16 February 2016

The Story of Mens******* 😷😷😷

                     Courtesy: youtube

This 1946 10 minutes long animated short film was produced by Walt Disney productions. It was a part of 1945-51 series of films produced by disney for american school. A gynecologist was hired to ensure the scientific accuracy.
It was one of the first commercially sponsered films to be distributed in the high schools. A booklet was also distributed for the teachers and students called ' very personally yours' that featured advertisements of some brands to be used and some directions for the girls.

It can be considered as one of the options in India too. Video has explained menstruation in a very simple and 'politically correct' language.

This platform is not visited by the target group still very helpful for many of us. Do watch and forward it to ur younger ones. It will be helpful. Stay healthy and well informed!!

सिगरेट

कभी तुम वो सिगरेट जलाने से पहले बुझाना
शायद सपनो के राख कम मिले फिर ,
ढेर था सपनो का कमरे में
धुएं में सही से देख नही पाती अब
एक पन्ने पे लिखा था
तुम्हारी मेरी
हमारी पसंद
जल गयी वो कुछ कुछ
मेज पर पड़े पड़े

कल खिड़की खोल दी थी
बिंदी टेड़ी लग जाती थी
आइना धुंधला सा पड़ गया है कुछ
होठ गुलाबी  ही है न
देखना चाहती थी
वो तुमसे मिल के कही...

कभी उनको देखा
जिन्हे मैंने आधे पे
बुझा दिया था
वो कही गिरी
जलती बुझती मर जाती है
तुमसे छूटते ही
हमारा साथ, सपना, दिल
उस आधी जली
सिगरेट सी हो गयी है।

आज हाथ की पकड़ में
उसी की महक थी
कल भी
तुम्हरी महक भूल गयी मैं जैसे
कभी सिगरेट जलाने से पहले मिलना
 शायद तुम्हे मेरी महक मिले

कभी सिगरेट जलाने से पहले बुझाना
उन आधी सिगरेट की जगह
अपने अधूरे सपने याद आये
तू मैं एक ज़िन्दगी समझ आये
नाराज़ हो के न जा
ये झगड़ा एक डिब्बी सिगरेट का नही
मैं तो आधी बुझती जलती
जान के लिए लड़ रही
चाहे वो सिगरेट हो
या फिर हम

वो जलती है और हम मरते है
सच में, कभी सिगरेट जलाने से पहले बुझाना


Monday, 15 February 2016

आप के होने और बन्ने में कई लोगो का सहयोग होता है। हम कितनी दफे सोचते है पर उनसे कह नही पाते जो हम कहना चाहते है। वैसे तो मेरे जान पहचान के बहुत लोग इस पेज को नही पढ़े शायद, फिर भी मैं आप सबको शुक्रिया कहना चाहती हूँ। ज़्यादा बातें नहीं करुँगी। बहुत कम होता है जब मैं शांत रह कर कम शब्दों में आपसे कुछ कहू। आज उनमे से एक है। आप इसे पढ़े तो बस मुस्कुरा के मुझे याद कर लीजियेगा इससे मेरी कई बदमाशियां शैतानियाँ गलतियां माफ़ हो जायेगी। आपसे माफ़ी मांगना नही चाहती। बड़ा फक्र है कि मेरे पास आप है या कभी थे और आज नहीं है सामने।
मेरी ज़िन्दगी के हिस्से में अपनी ज़िन्दगी को जोड़ने का शुक्रिया।

अभी सुना एक ग़ज़लकार को....
 परखना मत....परखने से कोई अपना नही रहता
आईने में चेहरा हमेशा नही रहता...

Thursday, 11 February 2016


रहिशियत का पता
जेब के भारी होने से पता चलता तो
हर माँ गरीब होती
और हर इश्क़ बेजार होता।


Sunday, 7 February 2016



ये समन्दर का किनारा देख रहे हो
फलक झुक जाता है 
सारी अकड़न छोड़ के
जब इल्ज़ाम लगता है
उसपे बेवफाई का
अर्श गिरता नही फर्श पर
वो तो उस कोने पे
हाँ वही जहाँ तुम देख रहे हो
मिल जाते है कुछ यूँ जा के
ये उनका घरौंदा है शायद
दुनिया से छुप मिलते है वहां 
जहाँ कोई उन्हें छु न सके
देखने से उन्हें परहेज़ नही शायद

तुम्हे पता है,
मैं जब थक जाती हूँ
दुनियावी दिखावो से
अपना भी एक क्षितिज चाहती हूँ
जहाँ ये पता न चले
मैं उठ के तेरे पास आई
ये तू झुक के मेरे साथ चल पड़ा
मैंने पानी की बौछारे मारी
या तू थक कर उनमे डूब सा गया
जहाँ तेरे नाम से मेरा नाम नही
वजूद से मेरी पहचान जुड़ जाये
जहाँ वो पहुचना चाहे
फिर हम और दूर नज़र आये

क्या ऐसा एक क्षितिज हमारा हो सकता है?

Monday, 25 January 2016

हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे

सुबह सुबह मेनका गांधी का मेल आया एक पर्सनल ग्रीटिंग कार्ड हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे का। सहूलियत के हिसाब से हिंदी या इंग्लिश में उनका सन्देश पढ़ने का आप्शन था। आज कल लड़कियो की बात हो हरयाणा का नाम न हो ऐसा हो ही नही सकता। वैसे लड़कियो के साथ हरयाणा का नाम हमेशा से जुड़ता रहा है, कभी बबली तो कभी लाड़ली। खैर, हरयाणा ने इस बार बदनामी नहीं नाम कमाया है। सेक्स रेश्यो में बढ़ोत्तरी करके। 900/1000 से 903/1000 पहुच कर। आज के मेसेज में भी हरयाणा का ज़िक्र था। काबिल ए तारीफ़ है भी। और ऐसे ही प्रोत्साहित किया जाता है। पर एक टेक्निकल बात नही समझ आई, आपके आई हो तो ज़रूर समझाइये। 900 से 903 लडकिया 1000 लड़को में मतलब 3 लडकिया बढ़ी पिछले कुव्ह महीनो में। यही मतलब हुआ न। इंडिया में हर सेकंड बच्चे पैदा होते होंगे तभी तो हम चीन को पिछाड़ने का ख्वाब देख रहे। और हरयाणा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में लोग बच्चे पैदा करने में पीछे हटते होंगे लगता तो नहीं। जिस स्पीड में 21 साल से ही शादी कराने का सपना माँ बाप और उनसे ज़्यादा रिश्तेदार देखने लगते है उसके बाद नए जोड़े जो निपट जाते है, उनके पास क्या बचता है। बच्चे होना तो एक अहम हिस्सा होता होगा। ऐसे में सिर्फ 3 बच्चियां बढ़ी 1000 बच्चों में। मतलब अब 7 लड़को की ही शादी नही हो पायेगी। 3 लड़को का कम से कम कल्याण हुआ।
बहरहाल, आज अच्छा लग रहा था। इस इ गवर्नेंस के चक्कर में मेनका गांधी की तरफ से मुझे विश किया गया मेरे लड़की होने पे। आपको भी आया होगा आप ही तो है जिन पर बरसो से हमे बचाने का बोझ जो दिया गया है। ये दिन मनाने तो नही पर यूँ ही शाम को बाहर निकली। मुझे लगा सबको गया होगा ये मेसेज, भाई सरकार सबकी है और लड़कियां सबके लिए ज़रूरी है अपनी अपनी वजह से। और आज कल लोग ये दिन विन बड़ा मनाने लगे है। और देखिये जी, चार बार एक मोटरसाइकिल पे तीन साहबज़ादे चक्कर काट गए। इतना तो पता ही था की वो मुझे हैप्पी गर्ल चाइल्ड  डे विश करने तो नही आ रहे थे। सामने से आते वक़्त मतलब चौथे चक्कर में पूछ ही लिए, पर क्या अदब से पूछा। रहती कहा है आप? हमें भी बुला लीजिये कभी। बड़ी शालीनता से गाड़ी बगल में धीरे कर के पूछे पर रुके नही। उन्हें पता था शायद ऐसी बातें तेज़ से नही कहते। लड़की की इज़्ज़त का सवाल है। वो भी भरी बाजार में। विश नही किया तो क्या इज़्ज़त का ध्यान तो रखा। पर उनकी शालीनता का जवाब मैं प्यार से नही दी पायी। थोड़ी अभद्र  भाषा का इस्तेमाल,  भौं का सिकुड़ना और चिल्लाई भी। उसने मेरी इज़्ज़त का इतना ख्याल रखा और मैं कि भड़क गयी। खैर, उसे शायद नही जानना था वो चला गया। लोग घूरने लगे। सारा गर्ल चाइल्ड का भूत उतर गया।  ऐसे लग रहा था जैसे वैलेंटाइन डे के दिन किसी लड़की को लड़के न छेड़े। उतना बुरा लग रहा था। डे सेलिब्रेशन खत्म नही हुआ था। एक अंकल जी ने ठान लिया था की मुझे आधे रस्ते पंहुचा के ही मानेंगे। वो कम से कम दो किलोमीटर मेरे रिक्शे के आगे पीछे अपनी स्कूटी ले कर चलते रहे। कितना मुश्किल होता होगा स्कूटी को रिक्शे के हिसाब से चलाना। पर अगर लगन हो तो सब पॉसिबल है। इसे कहते है ध्यान रखना। आप घर से बाहर निकलिए एक तबका आप पर बराबर नज़र रखेगा कि आप सही से चल रही है न, सही से पहन ओढ़ रखा है न, भाई ठंठ लग सकती है। आज कल ऐसे ही सूरज खिचड़ी बाद ठंठ के मज़े दे रहे । कहते मैं कुछ दिन बाद आऊंगा। खैर, अपनी बात पे आते है। मैं बेवजह उन अंकल पे गुस्सा रही थी। एक पॉइंट पे मैंने उनसे बोल ही दिया आप दूसरा रिक्शा क्यों नही कर लेते। साथ चलने में आसानी होगी। बुरा मान गए शायद, तुरंत स्पीड बधाई और चले गए। मैं फिर अकेले ही घर तक आई।
कुछ नया नही था। हर रोज़ कइयों के साथ होता है। कुछ तो इतना हक़ समझ बैठते है कि सिर्फ घर तक छोड़ते नही है बल्कि बुखार वैगेरह भी चेक करने लगते है हाथ गला पकड़ के। क्या किया जाये। हमे नही पसंद उन लोगो का ये तरीका। क्या करते अगर वो रुक के जवाब मांगने लगता तो। बिना जाने जाता ही नही तो। क्या करते अगर वो अंकल घर तक आते और फिर कल मिल जाते। बेचारगी लग रही है मेरी बातों में। आप कहते लड़ना सीखो हम कहते है जीना सीखो। हम अक्सर अनसुना कर देते है इन्हें। पागल समझ कर। रस्ते पे घूमता हुआ पागल। पर यही पागल जब घर में मिल जाता है तो आपका अपना बन के। कितना अनसुना करे। आपसे मैंने पूछा न कि मुझे टेक्निकल बात नही समझ आती। छेड़ने को चाहिए, सजाने को चाहिए, मारने को चाहिए, पूजने को चाहिए, सँभालने को चाहिए, पुचकारने को चाहिए, दुलारने को चाहिए, फिर वो बच्ची क्यों नही चाहिए।
मैं जिन रस्ते पे घूमते पागलो की बात कर रही थी वो मेरे भाई और चाचा की उम्र के थे। उनको बताओ तो सही गर्ल चाइल्ड पे नही वैलेंटाइन डे पे भी लड़की नही छेड़ते अगर वो न चाहे तो। जैसे तुम्हारा प्ले स्टेशन कोई न छुए तुम न चाहो तो। जैसे तुम्हारे कमरे में कोई न घुसे तुम न चाहो तो तुम्हारा फ़ोन कोई न छुए तुम न चाहो तो। भइया वो तो चीज़ें है कुछ न बोलेंगी, पर ये तो लड़की है माइनॉरिटी भी। काहे छेड़ रहे हो? काट भी सकती है। क्योंकि इनको भौकने की आज़ादी नही है बस कुछ है जो आवाज़ तेज़ कर रही है।
वैसे आपको हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे! कुछ मनाने वाला हो तो बताइयेगा। इसमें क्या करते है। बेटी को कार्ड दो। अब मम्मी पापा को उनके दिन पे कार्ड दिया जाता है। इसमें न जाने क्या कल्चर है। वैसे हैप्पी बॉय चाइल्ड डे कब होता है?

Saturday, 16 January 2016

सैफल की कहानी

लखनऊ में शहर की बड़ी कहानियां है..अदब, नज़ाकत, नवाबी अंदाज़, यू पी के लोगो की आरामतलबी, कई तरह के फितूर जो सिर्फ इसी शहर में ही दिखेंगे आपको। इस बीच मुझे एक नयी कहानी मिली। सुनाती हूँ आपको।

सैफल की कहानी। हाँ जी...सैफल। ये सैफ अली खान के रिश्तेदार नही है जैसा कि नाम से जान पड़ते है। इसे तो सी एफ एल का लखनवी नाम कह लीजिये। लखनऊ का इक तबका सी एफ एल को सैफल के नाम से ही बुलाता है। जी हाँ...CFL. पर इन्हें ये  बिल्कुल सही से पता है कि इससे बिजली कम खर्च होती है। बिल भी कम आएगा फिर। बस।
सरकार का काम शायद पूरा हो गया वो यही तो बताना चाहती है कि सी एफ एल का इस्तेमाल करे और ये तभी होगा जब हर एक तबके को इसका फायदा पता होगा। यहाँ हर किसी को ये पता चल गया है कि सैफल के क्या फायदे हैं। और लोग बाग़ उसे इस्तेमाल करने लगे है। अब सैफल जी  का क्या किया जाये। यहाँ तो एक नही सब के सब इन्हें इसी नाम से बुलाते हैं। एक बार को मुझे लगा  कि मेरा सी एफ एल बोलना कही उनको चौंका न दे। खैर,
सरकार का एक काम तो पूरा हुआ पर दूसरे का क्या। क्या हम इसी में खुश हो जाये कि सी एफ एल के भरपूर इस्तेमाल से क्लाइमेट पे बेहतर असर होगा। रिजल्ट में कुछ पॉजिटिव दिखेगा पर क्वालिटी के तौर पे हम कहाँ रह जा रहे हैं। कही यही रवैया तो नही है जिसकी वजह से हम एच डी आई और ऐसी तमाम लिस्ट जो हमारे लाइफ स्टाइल को परखते है उनमे पीछे रह जा रहे है।

विशेष टिप्पणी-  सैफल जी से व्यक्तिगत तौर पे कोई परेशानी नही है। किसी तबके विशेष की भावना आहात करने का कोई इरादा नही है। कहना पड़ता है वो क्या है न आज कल लोग बहुत जज़्बाती हो गए है, खासकर हिंदूवादी लोग। ;-) 

Friday, 15 January 2016

जब वो चुप होता है
मैं और बोलने लगती हूँ
वो कहता है
मेरे पास लिखने को 'तू' है
मेरी डायरी
और उसके पास...
उसे कौन समझाए
जब वो नहीं सुनता
मैं और बोलने लगती हूँ
जब वो नही बोलता
मैं और लिखने लगती हूँ।

Sunday, 10 January 2016

बातें हमारी; हमारे बीच की 3

वजह तो बड़ी वाजिब है
इसलिए डर भी कम है
पर मामला तो वही है
किस्सा भी वही है
तुम मुझसे बात नहीं कर रहे

हाल भी वही है
फुरसत मिलते ही तुम ख़याल में होते हो
तस्वीर देख के काम चल जाता है
कुछ घंटो बाद फिर दोहरा लेती हूँ
कुछ नया नही है
पुराने में ही मुस्कुरा लेती हूँ

इस बार सोच रही हूँ
अब तुम न ही बात करो
कुछ दिनों की तो बात है
ज़रा मैं भी देखूं
इन दिनों में मुझमे से 'तुम' कितना कम होता है
और मैं तुममे कितनी घट जाती हूँ

देखूं तो तस्वीरो का सिलसिला ही चलेगा
या थककर कुछ और अपना लूँगी
बातें कब तक और कितनी याद रहेगी
और हँसी कब तक बातों पे टिकी रहेगी
तुम्हे क्या होता है
ये तो पता नही
तुम अक्सर मुझसे ऐसे ही
मिल के खो जाया करते हो
फिर संग हो जाया करते हो

इस बार डर कम है
शायद इस बार
मैं तुम्हे अपने साथ नही...
खुद को वही छोड़ आई हूँ
कही गए तो
साथ ही चल दूंगी
तुम्हारे पीछे भागने का
किस्सा ही खत्म कर आई हूँ।

Friday, 8 January 2016

इन बिखरी सी ख्वाहिशों का एक पुतला बना ले चल
सरदार पटेल सा कुछ मजबूत बना ले चल
गांधी सा झुकाव हो
शालीनता रहे
कुछ लाल बाल पाल जैसा
आतंक मचा से चल
भगत सिंह सी तेज़ी
आज़ाद से बेपर्दा ख़यालात
मौलाना सा एक नगमा बना ले चल
अम्बेडकर सी एक चिढ पैदा कर
गलत न सहने की एक आग पैदा कर
जवाहर सा कुछ कुमकुम सजा ले चल
नौरोजी की कुछ हिदायत
छिपा ले चल
टिकैत का साफा टिका के चल
बहुगुणा सा लिपट ले चल
कर्वे फुले केसब टेगोर सा
कुछ लड़ने का हुनर चुरा ले चल
कल्पना की हिम्मत
दुर्गा का गुस्सा
बेसेंट का क्षमता
राजकुमारी अमृता की तेजी
नायडू का किस्सा
चल इन देवियों का
हिस्सा चुरा ले चल
इंदिरा का डर
फिर से बना दे चल
बापू की शांति
फिर से फैला दे चल
गार्गी की इच्छा
फलित कर दे
अब बस चल
तू अपना मैं उसका
तू उसका मैं तेरा
चल सबका कुछ
मिला के
इन बिखरी सी ख्वाहिशों में
जान डाल दे चल
एक प्यारा सा
ज़िंदा...आज़ाद
तेरा मेरा हिंदुस्तान
बना ले चल।

Wednesday, 6 January 2016

नींद के पहले का मष्तिस्क भ्रमण: मेरे देश का नाम


ऐसे लगता है, देश भी जॉइंट फॅमिली में रहता था। जिसको जो पसंद आया वो नाम रख दिया। कोई हिंदुस्तान तो कोई भारत, दादा जी या परदादा जी ने शायद आर्यावर्त रखा होगा। ऐसे भारी भरकम नाम वही लोग रखते है और सोने की चिड़िया दादी नानी या बुआ ने। ऐसे प्यारे से बिगड़े नाम वही रखते है। या फिर मौसी भी। दुलार से ये सब ऐसे नाम से घर में बुलाया करते है। ये नाम खासियत पे रखे जाते है। और तब हमारे यहाँ सोना खूब होता था। कोई चाची होगी बाहर से पढ़ के आई होगी, चाचा बाहर ही कही नौकरी करते होंगे, उन्होंने देश का नाम इंडिया रख दिया होगा। कितने सारे नाम बुलाने के। लगता है भारत नाम दादा जी ने या फिर बड़के पापा ने रखा होगा तभी तो वही नाम ऑफिसियल रखा। स्कूल में और कागजो पे लिखवाने के लिए।
क्या मुसीबत है पर मज़े भी बहोत है। साथ के उसी उम्र के और देश भी है उनके तो एक या ज़्यादा से ज़्यादा दो नाम है। पाकिस्तान नेपाल ही देख लो। हो सकता है ये न्यूक्लिअर फॅमिली में रहते हो। आज कल तो सब नेट से जुड़ गए है। अब पता चलता है की कुछ कुछ देश के तो इतने मज़ाकिया नाम रख दिए है कि जब एनुअल मीटिंग में मिलते होंगे तो यार दोस्त खूब चिढ़ाते होंगे। शुक्र है अपने देश का नाम ठीक सा रखा।
पर मैं भी जॉइंट फॅमिली में रही फिर मेरा ढेर सारा नाम क्यों नही रखा मेरे घर वालो ने??😮😏

Tuesday, 5 January 2016

बिखरी सी ख्वाहिशे

क्या कोई जहान है
इस जहान के उस पार
जहाँ चल के
मैं कर सकूँ ये बातें
जो तुम्हे अजब गजब लगती है
जहाँ कोई बैर नही
जहाँ मुझे रोका न जाये
तुम्हारे रंग को देख कर
जहाँ हो बेपरवाह दिल की बातें
जहाँ सुबह आँखे न खुले आंसू लिए
जहाँ धड़कन हर बार धड़क के दिल को डराती न हो
जहाँ मैं तुमसे मिल सकूँ
बिना तुम्हारे मजहब का नाम जाने
तुम्हे तमन्ना या रुकसाना बुला के
पहचान न करू
जहाँ सरहद पे कुछ जलता न हो
जहाँ घरो में कुछ बुझता न हो
जहाँ काले का मतलब रंग से होता हो
रंग का मतलब न होता हो
जहाँ मेरे मन की इच्छा सा एक नगर बसता हो
जहाँ छोटा बड़ा
बगावत खिलाफत ही न हो
जहाँ मैं तुमसे प्रेम करू
बिना तुम्हारा कुसूर जाने
जहाँ पैसो से नहीं आँखों से मोहब्बत हो
जहाँ मैं तुम्हे सुनु ऐसे की
मन्दाकिनी में सिक्के की झमझम हो
जहाँ हर दिल में बसता
एक नादान जगता हो
जहाँ खुशिया खेलती हो
ग़म खुशियो के ताने हो
जहाँ मैं सिर्फ एक आवाज़ हूँ
बिना करतब के खाने हो
जहाँ दो गज नही
आसमान मेरा हो....

मैं कहती रही
वो हसता रहा
कि सपने प्यारे है तेरे
असल में कोई जगह ऐसी नही

तो बना दो एक जगह ऐसी
जहाँ कमसकम फिदाइन हमला न हो
जहाँ मेरे भइया के मरने का खतरा न हो
जहाँ हर दिन एक 'गम्मू' न मरती हो
जहाँ हर दिन एक आग न जलती हो
हर दिन एक तारा न बनता हो
जहाँ हर दिन 'वो' एक कारतूस न बनता हो
हर दिन वो दिल को झटक के
निकल के
कोई दिल न भेदता हो
बना दो न वो जहा
जहाँ ऐसा कुछ न होता हो
जहाँ ऐसा कुछ न होता हो


एडिटर

तुझे पढ़ लूँ 
जो तू एक किताब हो
लिखावट का क्या
हर मोड़ पे दाए बाये घूम जाती है...मनचली

इन पन्नों को फाड़ के रख लूँ
मैं काबिल जो बन जाऊं
दफ़्ती का क्या
वो तो अकड़ में तुझे दबोचे रखी है...जल्लाद सी

कहे तो तुझे काले से लाल हरा गुलाबी कर दूँ
मेरे हाथ सतरंगी चादर लगी है एक
इन रंगो का क्या
कब एक दूजे में मिल
कुछ नया कर दे...बहरूपिये ये

तुझे पढ़ लूँ
जो तू इक किताब हो
आखिरी में लिख उठूँ मैं भी
तुझे और खूबसूरत बनाने वाला
एक एडिटर...नामुराद मैं
मैं इस बीच आप सब से बिलकुल भी नही मिल पा रही। एक तो वैसे भी हम अप्रत्यक्ष रूप में एक दूसरे से मिलते है उसमे मेरी लंबे समय की अनुपस्थिति थोड़ा निराशाजनक है मेरी ओर से। अपनी पिछली गलतियों के लिए क्षमा मांगते हुए नयी गलतियों का खाका तैयार करते हुए आप सभी साथियों को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये। यह वर्ष खुशियों और नयी उचाईयों से भरा हो। देश पर चल रहे इस बुरे समय का जल्द ही नाश हो और शांति अमन पुनः स्थापित हो।
एक बार फिर से आप सभी को नव वर्ष की शुभकामना। 
 A very happy new year..Shimmi this is specially for you. I wish aap is saal me jitni achi hindi bol leti hain utna acha aap padhna bhi start kr dein.