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Monday, 25 January 2016

हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे

सुबह सुबह मेनका गांधी का मेल आया एक पर्सनल ग्रीटिंग कार्ड हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे का। सहूलियत के हिसाब से हिंदी या इंग्लिश में उनका सन्देश पढ़ने का आप्शन था। आज कल लड़कियो की बात हो हरयाणा का नाम न हो ऐसा हो ही नही सकता। वैसे लड़कियो के साथ हरयाणा का नाम हमेशा से जुड़ता रहा है, कभी बबली तो कभी लाड़ली। खैर, हरयाणा ने इस बार बदनामी नहीं नाम कमाया है। सेक्स रेश्यो में बढ़ोत्तरी करके। 900/1000 से 903/1000 पहुच कर। आज के मेसेज में भी हरयाणा का ज़िक्र था। काबिल ए तारीफ़ है भी। और ऐसे ही प्रोत्साहित किया जाता है। पर एक टेक्निकल बात नही समझ आई, आपके आई हो तो ज़रूर समझाइये। 900 से 903 लडकिया 1000 लड़को में मतलब 3 लडकिया बढ़ी पिछले कुव्ह महीनो में। यही मतलब हुआ न। इंडिया में हर सेकंड बच्चे पैदा होते होंगे तभी तो हम चीन को पिछाड़ने का ख्वाब देख रहे। और हरयाणा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में लोग बच्चे पैदा करने में पीछे हटते होंगे लगता तो नहीं। जिस स्पीड में 21 साल से ही शादी कराने का सपना माँ बाप और उनसे ज़्यादा रिश्तेदार देखने लगते है उसके बाद नए जोड़े जो निपट जाते है, उनके पास क्या बचता है। बच्चे होना तो एक अहम हिस्सा होता होगा। ऐसे में सिर्फ 3 बच्चियां बढ़ी 1000 बच्चों में। मतलब अब 7 लड़को की ही शादी नही हो पायेगी। 3 लड़को का कम से कम कल्याण हुआ।
बहरहाल, आज अच्छा लग रहा था। इस इ गवर्नेंस के चक्कर में मेनका गांधी की तरफ से मुझे विश किया गया मेरे लड़की होने पे। आपको भी आया होगा आप ही तो है जिन पर बरसो से हमे बचाने का बोझ जो दिया गया है। ये दिन मनाने तो नही पर यूँ ही शाम को बाहर निकली। मुझे लगा सबको गया होगा ये मेसेज, भाई सरकार सबकी है और लड़कियां सबके लिए ज़रूरी है अपनी अपनी वजह से। और आज कल लोग ये दिन विन बड़ा मनाने लगे है। और देखिये जी, चार बार एक मोटरसाइकिल पे तीन साहबज़ादे चक्कर काट गए। इतना तो पता ही था की वो मुझे हैप्पी गर्ल चाइल्ड  डे विश करने तो नही आ रहे थे। सामने से आते वक़्त मतलब चौथे चक्कर में पूछ ही लिए, पर क्या अदब से पूछा। रहती कहा है आप? हमें भी बुला लीजिये कभी। बड़ी शालीनता से गाड़ी बगल में धीरे कर के पूछे पर रुके नही। उन्हें पता था शायद ऐसी बातें तेज़ से नही कहते। लड़की की इज़्ज़त का सवाल है। वो भी भरी बाजार में। विश नही किया तो क्या इज़्ज़त का ध्यान तो रखा। पर उनकी शालीनता का जवाब मैं प्यार से नही दी पायी। थोड़ी अभद्र  भाषा का इस्तेमाल,  भौं का सिकुड़ना और चिल्लाई भी। उसने मेरी इज़्ज़त का इतना ख्याल रखा और मैं कि भड़क गयी। खैर, उसे शायद नही जानना था वो चला गया। लोग घूरने लगे। सारा गर्ल चाइल्ड का भूत उतर गया।  ऐसे लग रहा था जैसे वैलेंटाइन डे के दिन किसी लड़की को लड़के न छेड़े। उतना बुरा लग रहा था। डे सेलिब्रेशन खत्म नही हुआ था। एक अंकल जी ने ठान लिया था की मुझे आधे रस्ते पंहुचा के ही मानेंगे। वो कम से कम दो किलोमीटर मेरे रिक्शे के आगे पीछे अपनी स्कूटी ले कर चलते रहे। कितना मुश्किल होता होगा स्कूटी को रिक्शे के हिसाब से चलाना। पर अगर लगन हो तो सब पॉसिबल है। इसे कहते है ध्यान रखना। आप घर से बाहर निकलिए एक तबका आप पर बराबर नज़र रखेगा कि आप सही से चल रही है न, सही से पहन ओढ़ रखा है न, भाई ठंठ लग सकती है। आज कल ऐसे ही सूरज खिचड़ी बाद ठंठ के मज़े दे रहे । कहते मैं कुछ दिन बाद आऊंगा। खैर, अपनी बात पे आते है। मैं बेवजह उन अंकल पे गुस्सा रही थी। एक पॉइंट पे मैंने उनसे बोल ही दिया आप दूसरा रिक्शा क्यों नही कर लेते। साथ चलने में आसानी होगी। बुरा मान गए शायद, तुरंत स्पीड बधाई और चले गए। मैं फिर अकेले ही घर तक आई।
कुछ नया नही था। हर रोज़ कइयों के साथ होता है। कुछ तो इतना हक़ समझ बैठते है कि सिर्फ घर तक छोड़ते नही है बल्कि बुखार वैगेरह भी चेक करने लगते है हाथ गला पकड़ के। क्या किया जाये। हमे नही पसंद उन लोगो का ये तरीका। क्या करते अगर वो रुक के जवाब मांगने लगता तो। बिना जाने जाता ही नही तो। क्या करते अगर वो अंकल घर तक आते और फिर कल मिल जाते। बेचारगी लग रही है मेरी बातों में। आप कहते लड़ना सीखो हम कहते है जीना सीखो। हम अक्सर अनसुना कर देते है इन्हें। पागल समझ कर। रस्ते पे घूमता हुआ पागल। पर यही पागल जब घर में मिल जाता है तो आपका अपना बन के। कितना अनसुना करे। आपसे मैंने पूछा न कि मुझे टेक्निकल बात नही समझ आती। छेड़ने को चाहिए, सजाने को चाहिए, मारने को चाहिए, पूजने को चाहिए, सँभालने को चाहिए, पुचकारने को चाहिए, दुलारने को चाहिए, फिर वो बच्ची क्यों नही चाहिए।
मैं जिन रस्ते पे घूमते पागलो की बात कर रही थी वो मेरे भाई और चाचा की उम्र के थे। उनको बताओ तो सही गर्ल चाइल्ड पे नही वैलेंटाइन डे पे भी लड़की नही छेड़ते अगर वो न चाहे तो। जैसे तुम्हारा प्ले स्टेशन कोई न छुए तुम न चाहो तो। जैसे तुम्हारे कमरे में कोई न घुसे तुम न चाहो तो तुम्हारा फ़ोन कोई न छुए तुम न चाहो तो। भइया वो तो चीज़ें है कुछ न बोलेंगी, पर ये तो लड़की है माइनॉरिटी भी। काहे छेड़ रहे हो? काट भी सकती है। क्योंकि इनको भौकने की आज़ादी नही है बस कुछ है जो आवाज़ तेज़ कर रही है।
वैसे आपको हैप्पी गर्ल चाइल्ड डे! कुछ मनाने वाला हो तो बताइयेगा। इसमें क्या करते है। बेटी को कार्ड दो। अब मम्मी पापा को उनके दिन पे कार्ड दिया जाता है। इसमें न जाने क्या कल्चर है। वैसे हैप्पी बॉय चाइल्ड डे कब होता है?

Saturday, 16 January 2016

सैफल की कहानी

लखनऊ में शहर की बड़ी कहानियां है..अदब, नज़ाकत, नवाबी अंदाज़, यू पी के लोगो की आरामतलबी, कई तरह के फितूर जो सिर्फ इसी शहर में ही दिखेंगे आपको। इस बीच मुझे एक नयी कहानी मिली। सुनाती हूँ आपको।

सैफल की कहानी। हाँ जी...सैफल। ये सैफ अली खान के रिश्तेदार नही है जैसा कि नाम से जान पड़ते है। इसे तो सी एफ एल का लखनवी नाम कह लीजिये। लखनऊ का इक तबका सी एफ एल को सैफल के नाम से ही बुलाता है। जी हाँ...CFL. पर इन्हें ये  बिल्कुल सही से पता है कि इससे बिजली कम खर्च होती है। बिल भी कम आएगा फिर। बस।
सरकार का काम शायद पूरा हो गया वो यही तो बताना चाहती है कि सी एफ एल का इस्तेमाल करे और ये तभी होगा जब हर एक तबके को इसका फायदा पता होगा। यहाँ हर किसी को ये पता चल गया है कि सैफल के क्या फायदे हैं। और लोग बाग़ उसे इस्तेमाल करने लगे है। अब सैफल जी  का क्या किया जाये। यहाँ तो एक नही सब के सब इन्हें इसी नाम से बुलाते हैं। एक बार को मुझे लगा  कि मेरा सी एफ एल बोलना कही उनको चौंका न दे। खैर,
सरकार का एक काम तो पूरा हुआ पर दूसरे का क्या। क्या हम इसी में खुश हो जाये कि सी एफ एल के भरपूर इस्तेमाल से क्लाइमेट पे बेहतर असर होगा। रिजल्ट में कुछ पॉजिटिव दिखेगा पर क्वालिटी के तौर पे हम कहाँ रह जा रहे हैं। कही यही रवैया तो नही है जिसकी वजह से हम एच डी आई और ऐसी तमाम लिस्ट जो हमारे लाइफ स्टाइल को परखते है उनमे पीछे रह जा रहे है।

विशेष टिप्पणी-  सैफल जी से व्यक्तिगत तौर पे कोई परेशानी नही है। किसी तबके विशेष की भावना आहात करने का कोई इरादा नही है। कहना पड़ता है वो क्या है न आज कल लोग बहुत जज़्बाती हो गए है, खासकर हिंदूवादी लोग। ;-) 

Friday, 15 January 2016

जब वो चुप होता है
मैं और बोलने लगती हूँ
वो कहता है
मेरे पास लिखने को 'तू' है
मेरी डायरी
और उसके पास...
उसे कौन समझाए
जब वो नहीं सुनता
मैं और बोलने लगती हूँ
जब वो नही बोलता
मैं और लिखने लगती हूँ।

Sunday, 10 January 2016

बातें हमारी; हमारे बीच की 3

वजह तो बड़ी वाजिब है
इसलिए डर भी कम है
पर मामला तो वही है
किस्सा भी वही है
तुम मुझसे बात नहीं कर रहे

हाल भी वही है
फुरसत मिलते ही तुम ख़याल में होते हो
तस्वीर देख के काम चल जाता है
कुछ घंटो बाद फिर दोहरा लेती हूँ
कुछ नया नही है
पुराने में ही मुस्कुरा लेती हूँ

इस बार सोच रही हूँ
अब तुम न ही बात करो
कुछ दिनों की तो बात है
ज़रा मैं भी देखूं
इन दिनों में मुझमे से 'तुम' कितना कम होता है
और मैं तुममे कितनी घट जाती हूँ

देखूं तो तस्वीरो का सिलसिला ही चलेगा
या थककर कुछ और अपना लूँगी
बातें कब तक और कितनी याद रहेगी
और हँसी कब तक बातों पे टिकी रहेगी
तुम्हे क्या होता है
ये तो पता नही
तुम अक्सर मुझसे ऐसे ही
मिल के खो जाया करते हो
फिर संग हो जाया करते हो

इस बार डर कम है
शायद इस बार
मैं तुम्हे अपने साथ नही...
खुद को वही छोड़ आई हूँ
कही गए तो
साथ ही चल दूंगी
तुम्हारे पीछे भागने का
किस्सा ही खत्म कर आई हूँ।

Friday, 8 January 2016

इन बिखरी सी ख्वाहिशों का एक पुतला बना ले चल
सरदार पटेल सा कुछ मजबूत बना ले चल
गांधी सा झुकाव हो
शालीनता रहे
कुछ लाल बाल पाल जैसा
आतंक मचा से चल
भगत सिंह सी तेज़ी
आज़ाद से बेपर्दा ख़यालात
मौलाना सा एक नगमा बना ले चल
अम्बेडकर सी एक चिढ पैदा कर
गलत न सहने की एक आग पैदा कर
जवाहर सा कुछ कुमकुम सजा ले चल
नौरोजी की कुछ हिदायत
छिपा ले चल
टिकैत का साफा टिका के चल
बहुगुणा सा लिपट ले चल
कर्वे फुले केसब टेगोर सा
कुछ लड़ने का हुनर चुरा ले चल
कल्पना की हिम्मत
दुर्गा का गुस्सा
बेसेंट का क्षमता
राजकुमारी अमृता की तेजी
नायडू का किस्सा
चल इन देवियों का
हिस्सा चुरा ले चल
इंदिरा का डर
फिर से बना दे चल
बापू की शांति
फिर से फैला दे चल
गार्गी की इच्छा
फलित कर दे
अब बस चल
तू अपना मैं उसका
तू उसका मैं तेरा
चल सबका कुछ
मिला के
इन बिखरी सी ख्वाहिशों में
जान डाल दे चल
एक प्यारा सा
ज़िंदा...आज़ाद
तेरा मेरा हिंदुस्तान
बना ले चल।

Wednesday, 6 January 2016

नींद के पहले का मष्तिस्क भ्रमण: मेरे देश का नाम


ऐसे लगता है, देश भी जॉइंट फॅमिली में रहता था। जिसको जो पसंद आया वो नाम रख दिया। कोई हिंदुस्तान तो कोई भारत, दादा जी या परदादा जी ने शायद आर्यावर्त रखा होगा। ऐसे भारी भरकम नाम वही लोग रखते है और सोने की चिड़िया दादी नानी या बुआ ने। ऐसे प्यारे से बिगड़े नाम वही रखते है। या फिर मौसी भी। दुलार से ये सब ऐसे नाम से घर में बुलाया करते है। ये नाम खासियत पे रखे जाते है। और तब हमारे यहाँ सोना खूब होता था। कोई चाची होगी बाहर से पढ़ के आई होगी, चाचा बाहर ही कही नौकरी करते होंगे, उन्होंने देश का नाम इंडिया रख दिया होगा। कितने सारे नाम बुलाने के। लगता है भारत नाम दादा जी ने या फिर बड़के पापा ने रखा होगा तभी तो वही नाम ऑफिसियल रखा। स्कूल में और कागजो पे लिखवाने के लिए।
क्या मुसीबत है पर मज़े भी बहोत है। साथ के उसी उम्र के और देश भी है उनके तो एक या ज़्यादा से ज़्यादा दो नाम है। पाकिस्तान नेपाल ही देख लो। हो सकता है ये न्यूक्लिअर फॅमिली में रहते हो। आज कल तो सब नेट से जुड़ गए है। अब पता चलता है की कुछ कुछ देश के तो इतने मज़ाकिया नाम रख दिए है कि जब एनुअल मीटिंग में मिलते होंगे तो यार दोस्त खूब चिढ़ाते होंगे। शुक्र है अपने देश का नाम ठीक सा रखा।
पर मैं भी जॉइंट फॅमिली में रही फिर मेरा ढेर सारा नाम क्यों नही रखा मेरे घर वालो ने??😮😏

Tuesday, 5 January 2016

बिखरी सी ख्वाहिशे

क्या कोई जहान है
इस जहान के उस पार
जहाँ चल के
मैं कर सकूँ ये बातें
जो तुम्हे अजब गजब लगती है
जहाँ कोई बैर नही
जहाँ मुझे रोका न जाये
तुम्हारे रंग को देख कर
जहाँ हो बेपरवाह दिल की बातें
जहाँ सुबह आँखे न खुले आंसू लिए
जहाँ धड़कन हर बार धड़क के दिल को डराती न हो
जहाँ मैं तुमसे मिल सकूँ
बिना तुम्हारे मजहब का नाम जाने
तुम्हे तमन्ना या रुकसाना बुला के
पहचान न करू
जहाँ सरहद पे कुछ जलता न हो
जहाँ घरो में कुछ बुझता न हो
जहाँ काले का मतलब रंग से होता हो
रंग का मतलब न होता हो
जहाँ मेरे मन की इच्छा सा एक नगर बसता हो
जहाँ छोटा बड़ा
बगावत खिलाफत ही न हो
जहाँ मैं तुमसे प्रेम करू
बिना तुम्हारा कुसूर जाने
जहाँ पैसो से नहीं आँखों से मोहब्बत हो
जहाँ मैं तुम्हे सुनु ऐसे की
मन्दाकिनी में सिक्के की झमझम हो
जहाँ हर दिल में बसता
एक नादान जगता हो
जहाँ खुशिया खेलती हो
ग़म खुशियो के ताने हो
जहाँ मैं सिर्फ एक आवाज़ हूँ
बिना करतब के खाने हो
जहाँ दो गज नही
आसमान मेरा हो....

मैं कहती रही
वो हसता रहा
कि सपने प्यारे है तेरे
असल में कोई जगह ऐसी नही

तो बना दो एक जगह ऐसी
जहाँ कमसकम फिदाइन हमला न हो
जहाँ मेरे भइया के मरने का खतरा न हो
जहाँ हर दिन एक 'गम्मू' न मरती हो
जहाँ हर दिन एक आग न जलती हो
हर दिन एक तारा न बनता हो
जहाँ हर दिन 'वो' एक कारतूस न बनता हो
हर दिन वो दिल को झटक के
निकल के
कोई दिल न भेदता हो
बना दो न वो जहा
जहाँ ऐसा कुछ न होता हो
जहाँ ऐसा कुछ न होता हो


एडिटर

तुझे पढ़ लूँ 
जो तू एक किताब हो
लिखावट का क्या
हर मोड़ पे दाए बाये घूम जाती है...मनचली

इन पन्नों को फाड़ के रख लूँ
मैं काबिल जो बन जाऊं
दफ़्ती का क्या
वो तो अकड़ में तुझे दबोचे रखी है...जल्लाद सी

कहे तो तुझे काले से लाल हरा गुलाबी कर दूँ
मेरे हाथ सतरंगी चादर लगी है एक
इन रंगो का क्या
कब एक दूजे में मिल
कुछ नया कर दे...बहरूपिये ये

तुझे पढ़ लूँ
जो तू इक किताब हो
आखिरी में लिख उठूँ मैं भी
तुझे और खूबसूरत बनाने वाला
एक एडिटर...नामुराद मैं
मैं इस बीच आप सब से बिलकुल भी नही मिल पा रही। एक तो वैसे भी हम अप्रत्यक्ष रूप में एक दूसरे से मिलते है उसमे मेरी लंबे समय की अनुपस्थिति थोड़ा निराशाजनक है मेरी ओर से। अपनी पिछली गलतियों के लिए क्षमा मांगते हुए नयी गलतियों का खाका तैयार करते हुए आप सभी साथियों को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये। यह वर्ष खुशियों और नयी उचाईयों से भरा हो। देश पर चल रहे इस बुरे समय का जल्द ही नाश हो और शांति अमन पुनः स्थापित हो।
एक बार फिर से आप सभी को नव वर्ष की शुभकामना। 
 A very happy new year..Shimmi this is specially for you. I wish aap is saal me jitni achi hindi bol leti hain utna acha aap padhna bhi start kr dein.