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Sunday, 17 April 2016

Love Shots

Women's Studies makes you think about yourself and society

Women's Studies makes you think about yourself and society: Dr. Lakshmi Lingam is the Deputy Director of the Centre for Women's Studies, School of Social Sciences, Tata Institute of Social Sciences. Dr. Lakshmi did her PhD from IIT Bombay.

There are many friends who know very little about the subject Women's Studies. I consider their prejudices and disagreements with the subject as it is about 'Women'. why do i consider? because they are not aware of working area of the subject. Here is the thing, a note by a recognized person. So, spare some time and thoda gyan badhaiye....kya kijiyega janaab aaj kal bina auraton ke kaam nhi chalna. yes, i am talking officially and taking it professionally. Enjoy!

Saturday, 16 April 2016

धरती के सौतेले













ज़मी सूखी है,
मर रहा किसान है।
पानी कम है,
भूखा गुलाम है।
पानी देते इंद्र देव बने
टैंकर वाले
कनस्तर भरता पानी से 
जेबे भरते नोटों से
दोनों ही इसी माँ की संतान है।
ये ज़िन्दगी ऐसे क्यों बेहाल है।

एक कवि कहता
आस्मां हो गया क्या बेवफा
निकली ज़मी की जान है
आग उगले जा रहा 
ऐसी भी क्या बेरुखी सवार है
सूरज जल जल इसे जलाये है
धरती गुस्से से काँप जाये है
हर दिन अब आता भूकंप भरमार है

गलती किसकी है 
सुलटा लो जल्दी भाई
तुम दो के चक्कर में
फ़सी हमारी जान है।

कवि कितना पागल है
सोचे ये झगड़ा उनका है
जो खुद मर रहे हमारे तांडव से
मांगे उनसे अपने प्राण है। 
कोई समझाए जो इसको
गर हम इतने भोले होते
पेड़ न कटे होते इतने
पानी पानी सा न बहाया होता
सब छोडो, इतना बस देखो
आज जब मरते हमारे आधे जन
फिर भी
हम IPL से कमा रहे पहचान है।
कहते हम जनतंत्र है
जिसको पानी चाहिए 
वो जाये
हम तो अभी ग्रीन पिच कवर्ड
इंडिया की शान है। 
हमको ज़िन्दगी जीने का
सेक्युलर अधिकार है।

हर घर में नल
अंदर भी बाहर भी
ऐसी इनकी मांग है
आर ओ किनले रहीश हो रहे
बस पानी मिल जाये
कुछ की इतनी सी ही डिमांड है।
कवि तू क्यों माटी और आस्मां को
घूरे जाता
वो तो अलग हुए है
क्योंकि धरती पर
उसके सौतेलो का राज़ है।




Friday, 8 April 2016

सबसे बुरी बात थी हमारे बीच की
हम हमेशा 'मैं' और 'तुम' थे..
कभी भी 'हम' नहीं बन पाये
तुम हमेशा ' मैं' चाहते थे...'हम' नहीं
और मैं 'हम' में 'मैं' और 'तुम' खोजना चाहती थी।

सच है जब जब रोइ तेरे लिए तड़प के
तुझे पाने की चाहत में,
हर बार थोड़ी सी मरती गयी
आज ज़िंदा हूँ
पर 'देसी' कब चली गयी
तुझे पता ही नही चला
'गम्मो' को तू कब भूल गया
तुझे याद ही नहीं।

भागती रही कुछ पाने को
जो था मैं सब खोती रही
हारती रही
'तू' 'वो' सब कुछ चाहते थे
मैं भी चाहती थी कुछ
तेरी चाहत पाने में मैं अपना खोती रही
किसी को पता भी नहीं चला।

वहां आसमान में मेरा कुछ नही छूटा
मैं तो यही ज़मी में दफ़न होती रही।
आज खुद से रोकर चुप होने का हुनर सीख लिया
माँ का आँचल और तेरा सीने लगा कर दुलारना
पापा की थपकी, दीदी का सम्भलना
भाई का सर पकड़ के सब समझा देना
और खुद का इंसान होना
सब याद बनते देखती रही।

शायद मैं इस दुनिया के लायक नही
ज़्यादा प्यार चाहती हूँ।
अब खुद से बात कर के सवाल पूछ
जवाब चाहती हूँ।
ये सिलसिला कब शुरू हुआ
मुझे भी पता नही चला।