कश्मकश

शराब की महक और
उसके बदन की खुशबू
कुछ चुरा लायी थी
वहां से आते आते
शाम को मेरी चादर से
वो महक रही थी।
मेरी सांसो में
सच, कोई किस्सा नही है ये,
महक रही थी सुबहो में।
मैंने भी गुलज़ार की नज़्मों के बाद
आज महसूस किया
जब उसके पास से वापस आयी थी।

वापस आयी थी
उससे रूस कर
उससे शिकवा किया
तो 'चली जा' कह कर
चला गया वो।
न, मै शिकायत नही कर रही।
या शायद कर रही हूं।
पर इन शिकायत से
वो मोहब्बत की जान निकाल कर
मुझे बेजान छोड़ देता है।

ना माप रही उसकी मोहब्बत
 गुस्सा आंसूं में बहा
शाम चादर से खुशबू ओढ़
यूँ ही बेकाम बितायी है मैंने।
और मान रही हूं तज़ुर्बे से,
कि उसकी मोहब्बत
नए जमाने की कामपरस्ती
और समाज की रवायतों
से डर के बना प्यार है।
जब तक बंद कमरे का है
चले जाने की बाबत
कई दफे आवाज़ उठती रहेगी।

अक्सर कश्मकश में पड़ जाती है जान
इश्क़ है तो चले जाने की बात
तैयार क्यों रहती है लफ्ज़ बन कर
उसे होठों पे
मुझे मार गिराने को
हम नासमझ है
ये मान चुपचाप हट जाएंगे रास्तों से
हमे तो शायद इमरोज़ सा आशिक़ चाहिए
पर अमृता सी हिम्मत और आबरू भी नही है।
न मिलेगा इमरोज़ न अमृता सी उदासी
न वो इश्क़ लुधियानवी
तो चलो गम्मू लिखे कुछ नई मोहब्बत
जहां तू इश्क़ भी करे
और पाप भी करे।
गलतियां भी करे
और इश्क़ भी।


Comments

Jamshed Azmi said…
बहुत ही शानदार रचना प्रस्तु्त की। इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद। पढ़ कर बहुत अच्छा लगा।