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Wednesday, 19 July 2017

मैंने देखा है

वो पीछे वाले कस्बे में आग लगी है
मैंने आज आसमान में उठते बादल देखा है।
आज माँ को सफेद विधवा साड़ी में
लाल सिंदूर अपनी मांग भरते देखा है।
वो खनक खनक कर जाती थी जो
उस पगली को संवर के बेरंग कजरी गाते देखा है।
झूले पे झूली वो आसमाँ को ताके
उसने भी उस धुएं से बादल को उठते देखा है।
पाश को सुन के सोई 'देसी'
आखिर में थी रोई 'देसी'
मैंने कई कौतूहल को भीड़ में सन्नाटा होते देखा है।
उस सांय सांय टिक टुक झुर मुट में
एक नई सांस को टूटते देखा है।
शोर हुआ है, बातें घूम घूम कर शोर मचाये
दाएं बाएं ऊपर नीचे जगह मिलते ही घुस जाए
मैंने इस जाल बवंडर में सुबह के कपोल को
झर झर सूखे पत्ते सा बूंदों संग माटी माटी होते देखा है।
वो पगली जो झूल रही थी
जो बेरंग कजरी बोल रही थी
उसको बारिश में बचते देखा है।
उस कस्बे की आग बुझ गयी
इस खुशी में मैंने उसकी आग को कसमसाते देखा है।
पत्तो की सर सर में उसके सीने की अनगिनत साँसों को हिलते देखा है।
मैंने आज अपनी माँ को सफेद साड़ी में लाल सिंदूर लगाते देखा है।

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